रविवार, 14 मई 2017

muktak

मुक्तक

माँ तो माँ ही होती है
सपने बच्चों में बोती है
जाकर भी कब जा पाती है?
खो जाती मगर न खोती है.
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इश्क क्यों हुस्न से हुआ करता?
इश्क को रश्क क्यों हुआ करता?
इश्क की मुश्क जरूरी क्यों है?
इश्क क्यों इश्क की दुआ करता?
१४-५-२०१७
*
मुक्तक सलिला :
संजीव
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हमसे छिपते भी नहीं, सामने आते भी नहीं 
दूर जाते भी नहीं, पास बुलाते भी नहीं 
इन हसीनों के फरेबों से खुदा भी हारा-
गले लगते भी नहीं और लगाते भी नहीं
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पीठ फेरेंगे मगर मुड़ के फिर निहारेंगे
फेर नजरें यें हसीं दिल पे दिल को वारेंगे
जीत लेने को किला दिल का हौसला देखो-
ये न हिचकेंगे 'सलिल' तुमपे दिल भी हारेंगे
*
उड़ती जुल्फों में गिरफ्तार कभी मत होना
बहकी अलकों को पुरस्कार कभी मत होना
थाह पाओगे नहीं अश्क की गहराई की-
हुस्न कातिल है, गुनाहगार कभी मत होना
*
१४-५-२०१५

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