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मंगलवार, 23 मई 2017

muktika


मुक्तिका/हिंदी ग़ज़ल 
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किस सा किस्सा?, कहे कहानी
गल्प- गप्प हँस कर मनमानी 
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कथ्य कथा है जी भर बाँचो
सुन, कह, समझे बुद्धि सयानी
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बोध करा दे सत्य-असत का
बोध-कथा जो कहती नानी
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देते पर उपदेश, न करते
आप आचरण पंडित-ज्ञानी
.
लाल बुझक्कड़ बूझ, न बूझें
कभी पहेली, पर ज़िद ठानी
***

[ सोलह मात्रिक संस्कारी जातीय, अरिल्ल छन्द]

मुक्तिका 
*
धीरे-धीरे समय सूत को, कात रहा है बुनकर दिनकर 
साँझ सुंदरी राह हेरती कब लाएगा धोती बुनकर 
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मैया रजनी की कैयां में, चंदा खेले हुमस-किलकक
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तारे साथी धमाचौकड़ी मच रहे हैं हुलस-पुलककर
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बहिन चाँदनी सुने कहानी, धरती दादी कहे लीन हो
पता नहीं कब भोर हो गयी?, टेरे मौसी उषा लपककर
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बहकी-महकी मंद पवन सँग, क्लो मोगरे की श्वेतभित
गौरैया की चहचह सुनकर, गुटरूँगूँ कर रहा कबूतर
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सदा सुहागन रहो असीसे, बरगद बब्बा करतल ध्वनि कर
छोड़
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न कल पर काम आज का, वरो सफलता जग उठ बढ़ कर
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