शुक्रवार, 5 मई 2017

मुक्तिका

छंद बहर का मूल है १२
मुक्तिका
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वार्णिक छंद: अथाष्टि जातीय छंद 
मात्रिक छंद: यौगिक जातीय विधाता छंद 
१२२२ १२२२ १२२२ १२२२  
मुफ़ाईलुन,मुफ़ाईलुन, मुफ़ाईलुन,मुफ़ाईलुन।
बहरे हज़ज मुसम्मन सालिम।।
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दियों में तेल या बाती नहीं हो तो करोगे क्या?
लिखोगे प्रेम में पाती नहीं भी तो मरोगे क्या?
बुलाता देश है, आओ! भुला दो दूरियाँ सारी 
बिना गंगा बहाए खून की, बोलो तरोगे क्या? 
पसीना ही न जो बोया, रुकेगी रेत ये कैसे?
न होगा घाट तो बोलो नदी सूखी रखोगे क्या?
परों को ही न फैलाया, नपेगा आसमां कैसे?
न हाथों से करोगे काम, ख्वाबों को चरोगे क्या?
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न ज़िंदा कौम को भाती कभी भी भीख की बोटी 
न पौधे रोप पाए तो कहीं फूलो-फलोगे क्या? 
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५-५-२०१७
इस बह्र में कुछ प्रचलित गीत
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१. मुहब्बत हो गई जिनको वो परवाने कहां जाएं
२. मुझे तेरी मुहब्बत का सहारा मिल गया होता 
३. चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाए हम दोनों 
४. खुदा भी आसमाँ से जब जमीं पर देखता होगा 
५. सुहानी रात ढल चुकी न जाने तुम कब आओगेे 
६. कभी तन्हाइयों में भी हमारी याद आएगी
७. है अपना दिल तो अावारा न जाने किस प आएगा 
८. तेरी दुनिया में आकर के ये दीवाने कहां जाएं
९. बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है
१०. सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है

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