शुक्रवार, 24 मई 2019

साक्षात्कार आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' से- ओमप्रकाश प्रजापति

साक्षात्कार के प्रश्न
 (१)    आप साहित्य की इस दुनिया में कैसे आए? कब से आए? क्या परिवार में कोई और सदस्य भी साहित्य सेवा से जुड़ा रहा है?
मैं बौद्धिक संपदा संपन्न कायस्थ परिवार में जन्मा हूँ। शैशव से ही माँ की लोरी के रूप में साहित्य मेरे व्यक्तित्व का अंश बना गया। पिताश्री स्व. राजबहादुर वर्मा, कारापाल (जेलर) के पद पर नियुक्त थे। बंगला ड्यूटी पर आनेवाले सिपाही और कैदी अलग-अलग प्रदेशों के ग्रामीण अंचल से होते थे। उनसे मुझे लोक भाषाओँ और लोक साहित्य निरंतर सुनने को मिलता था। अधिकारियों और विद्वज्जनों का आना-जाना लगा रहता था। उनसे हिंदी और अंगरेजी का शब्द ज्ञान होता गया। बचपन से तुकबंदी के रूप में काव्य सृजन आरम्भ हुआ। मेरी मातुश्री स्व. शांति देवी स्वयं भजन रचती-गाती थीं। अग्रजा आशा वर्मा हिंदी सहती की गंभीर अध्येता रहीं। उनहोंने प्राथमिक शालाओं में मेरे लिए व्याख्यान लिखे, कवितायेँ बोलना सिखाईं, जबकि वे स्वयं उच्चतर माध्यमिक विद्यालय की श्रेष्ठ वक्ता थीं। माध्यमिक शाला में मुझे अग्रजवत सुरेश उपाध्याय जी गुरु के रूप में मिले। मुझे अपने जन्म दिन का प्रथम स्मरणीय उपहार उन्हें से मिला वह था पराग, नंदन और चम्पक पत्रिका के रूप में। तब मैं सेठ नन्हेलाल घासीराम उ. मा. विद्यालय होशंगाबाद में ७ वीं का छात्र था। मुझे अपने से वरिष्ठ छात्र राधेश्याम साकल्ले ने एक पुस्तक 'हिमालय के वीर' स्वाधीनता दिवस पर व्याख्यान प्रतियोगिता में पुरस्कारवत दी। यह १९६२ के भारत-चीन युद्ध के शहीदों की जीवनियाँ हैं जिन्हें श्यामलाल 'मधुप 'ने लिखा है। इस तरह साहित्यांगन में मेरा प्रवेश हुआ।  
(२)    आपको कब महसूस हुआ कि आपके भीतर कोई रचनाकार है?
सच कहूँ तो रचनाकर्म करते समय 'रचनाकार' जैसा गुरु गंभीर शब्द ही मुझे ज्ञात नहीं था। मेरे एक बाल मित्र रहे अनिल धूपर। वे सिविल सर्जन स्व. हीरालाल धूपर के चिरंजीव थे। विद्यालय के निकट ही जिला चिकित्सालय था। हमारा दोपहर का भोजन एक साथ ही आता था और हम दोपहर को रोज साथ में भोजन करते थे। वह अंगरेजी में मेरी मदद करता था मैं गणित में उसकी। एक दिन कक्षा में किसी शरारत पर उसे एक चपत पड़ी। तब मेरे मुँह से अनायास निकला 
'सुन मेरे भाई / तूने ऊधम मचाई / तेरी हो गयी पिटाई / सुर्रू सर ने तुझे एक चपत लगाई' कर उसे एक और चपत जमाकर मैं भाग लिया। 
(३)    हर रचनाकार का कोई-न-कोई आदर्श होता है जिससे कि वह लिखने की प्रेरणा लेता है। आपका भी कोई आदर्श ज़रूर रहा होगा। आप का आदर्श कौन रहा है? और क्यों रहा है? क्या अब भी आप उसे अपना आदर्श मानते हैं या समय के बहाव के साथ आदर्श प्रतीकों में बदलाव आया है?
सुरेश उपाध्याय जी धर्मयुग में सहसंपादक होकर चले गए तो श्री सुरेंद्र कुमार मेहता ने मुझे पढ़ाया। वे भी सुकवि थे। मैं अपनी बड़ी बहिनों की हिंदी की किताबें पढ़ता रहता था। पिताजी भी साहित्य प्रेमी थे। उनके में कई सामाजिक पुस्तकें थीं, माँ के पास धार्मिक साहित्य था। हमें पाठ्यक्रम पढ़ने को कहा जाता। ये पुस्तकें हमें नहीं दी जाती थीं कि फाड़ दोगे। मैं लुक-छिपकर पढ़ा लेता था। कल्याण, धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, सारिका, दिनमान, कादम्बिनी, नवनीत, हिंदी डाइजेस्ट और माधुरी मेरी प्रिय पत्रिकाएँ थीं। इनके कई वर्षों के अंक आज भी जिल्द कराए हुए मेरे संकलन में हैं। महादेवी, सुभद्रा, निराला, माखनलाल, मैथिली शरण जी, पंत जी, बच्चन जी, दिनकर जी, गुरुदेव रवीन्द्रनाथ, बंकिम चंद्र, शरत चंद्र, बिमल मित्र, प्रेमचंद्र, शिवानी, यशपाल, अमृतलाल नागर जी, भगवतीचरण वर्मा, शिव वर्मा, वैशम्पायन, श्रीकृष्ण 'सरल', देवेंद्र सत्यार्थी, रेणु, हरिशंकर परसाई, इलाचंद्र जोशी, डॉ. रामकुमार वर्मा,  जवाहर लाल नेहरू, गाँधी जी, सरदार पटेल, लेनिन, गोर्की, पुश्किन, चेखव, सावरकर, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, विनोबा भावे, ओशो, नीरज, फैज़, साहिर, अर्श, नियाज़, डॉ. राम विलास शर्मा, डॉ. नागेंद्र, डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी, धर्मवीर भारती जी, राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी, नागार्जुन, त्रिलोचन, शंकर, अनंत गोपाल शेवडेकर, शिवाजी सावंत, अम्बिका प्रसाद दिव्य, काका हाथरसी, ओमप्रकाश शर्मा, कर्नल रंजीत, स्वेड मार्टिन, कुशवाहा कांत, गुलशन नंदा, गुरुदत्त, नरेंद्र कोहली, रामकुमार भ्रमर, चंद्रसेन विराट,  आदि आदि को कई बरसों खूब पढ़ा। आदर्श तो तब से अब तक तुलसीदास ही हैं।  
(४)    आज के रचनाकारों की पीढ़ी में आप के आदर्श कौन हैं?
 मुझे स्व. भगवती प्रसाद देवपुरा से निरंतर कर्मरत रहने की प्रेरणा मिलती रही है। डॉ. किशोर काबरा, डॉ. चित्रा चतुर्वेदी, डॉ. इला घोष, डॉ. सुमन श्रीवास्तव, पूर्णिमा बर्मन, निर्मल शुक्ल, अशोक जमनानी आदि का सृजन मन भाता है। 
(५)    लेखन को आप स्वांतः-सुखाय कृत्य मानते हैं या सामाजिक परिवर्तन का माध्यम मानते हैं?
लेखन निरुद्देश्य हो तो विलासिता के अलावा कुछ नहीं है किन्तु वैचारिक प्रतिबद्धता लेखक को गुलाम बना देती है। लेखन एक सारस्वत साधना है जो मानसिक-आत्मिक विकास का करक होती है, सामाजिक प्रभाव तो उसका उप उत्पाद है। 
(६)    जनमानस को प्रभावित करने के लिए आप साहित्य की किस विधा को ज्यादा सशक्त मानते हैं? गद्य को या पद्य को?
जनमानस विधा से नहीं कथ्य और शिल्प से प्रभावित होता है। कथा हो या कविता दोनों के पाठक और श्रोता हर काल में खूब रहे हैं। प्रवचन हों या कवि सम्मेलन दोनों में भीड़ जुटती है। बोझिल विचारपरकता को जनगण नकार देता है।  
(७)    आज जो आपकी पहचान बन रही है उसमें आप एक छांदस रचनाकार के रूप में उभर रहे हैं। गीतमुक्तकग़ज़ल आप लिख रहे हैं। क्या आपने छंदमुक्त कविताएं भी लिखी हैं? अगर नहीं तो क्यों? क्या आप इस शैली को कम प्रभावी मानते हैं? या छंदमुक्त लिखने में आप अपने को असहज महसूस करते हैं?
मैं कुछ कहने के लिए लिखता हूँ। विचार ही न हो तो क्यों लिखा जाए? कथ्य अपना माध्यम खुद चुन लेता है। गद्य हो या पद्य, छांदस हो या अछांदस, लघुकथा हो या कहानी, लेख हो या निबंध यह पूर्व निर्धारित तभी होता है जब उस विधा की रचना या उस विषय की रचना भेजना हो। मैंने मुक्त छंद की कवितायेँ खूब लिखी हैं। दो कविता संकलन लोकतंत्र का मकबरा व मीत मेरे चर्चित भी हुए हैं। एक कविता का आनंद लें-
कौन कहता है 
कि चीता मर गया है?
हिंस्र वृत्ति 
जहाँ देखो बढ़ रही है,
धूर्तता 
किस्से नए नित गढ़ रही है। 
शक्ति के नाखून पैने 
चोट असहायों पे करते,
स्वाद लेकर रक्त पीते 
मारकर औरों को जीते। 
और तुम...?
और तुम कहते हो- 
'चीता मर गया है।'
नहीं वह तो आदमी की
खाल में कर घर गया है। 
कौन कहता है कि 
चीता मर गया है।  


(९)    क्या आप भी यह मानते हैं कि गीत विदा हो रहा है और ग़ज़ल तेज़ी से आगे आ रही है? क्या इसका कारण ग़ज़ल का अधिक संप्रेषणीय होना है? या फिर कोई और कारण आप समझते हैं?
गीत अमर है। गीत के मरने की घोषणा प्रगतिवादियों ने की, घोषणा करने वाले मर गए, गीत फल-फूल रहा है। ग़ज़ल गीत का ही एक प्रकार है। भारतीयों की मानसिकता अभी ेभी  स्वतंत्र चेता नहीं हो सकी है। सिन्दूर पुता पाषाण हो, अधिकारहीन पूर्व राजा हों या कोई अल्पज्ञ पुजारी हमें पैर छूने में एक क्षण नहीं लगता, भले ही घर में माता-पिता को सम्मान न दें। उर्दू और अंग्रेजी हमारे पूर्व मालिकों की भाषाएँ रही हैं। इसलिए उनके प्रति अंध मोह हैं। ग़ज़ल के तत्वों और विधान को जाने बिना, उसमें महारत पाए बिना तथाकथित गज़लकार कागज़ काले करते रहते हैं। जानकार ऐसी ग़ज़लों को ग़ज़ल ही नहीं मानते। गीतकार गीत को समझकर लिखता है इसलिए गीत के श्रोता और पाठक न घटे हैं, न घटेंगे।   
(९)    हिंदी के रचनाकार ग़ज़ल खूब लिख रहे हैं। उर्दू के शायर ग़ज़ल खूब कह रहे हैं। क्या यह सोच और नज़रिए का फर्क़ है? क्या आप हिंदी और उर्दू ग़ज़ल को अलग-अलग देखने के हामी है? अगर हाँ तो क्यों?
संस्कृत और अपभ्रंश साहित्य से मुक्तक काव्य परंपरा हिंदी ने ग्रहण की है। मुक्तक में सभी पंक्तियाँ समान पदभार की होती है। पहली, दूसरी तथा चौथी पंक्ति का तुकांत-पदांत समान रखा जाता है जबकि तीसरी पंक्ति का भिन्न। तीसरी चौथी पंक्ति की तरह पंक्तियाँ बढ़ाने से मुक्तिका (हिंदी ग़ज़ल) की रचना हो जाती है। यह शिल्प भारत से फारस में गया और उसे ग़ज़ल नाम मिला। संस्कृत छंदों के 'गण' यत्किंचित परिवर्तन कर 'रुक्न' बन दिए गए। आदिकवि वाल्मीकि और क्रौंच वध प्रसंग में नर क्रौंच के मारे जाने पर मादा क्रौंच के आर्तनाद की करुण कथा की नकल मृग-शिशु को शिकारी के तीर से मारे जाने पर मृगी के आर्तनाद का किस्सा गढ़कर की गई। 'गज़ाला चश्म' अर्थात मृगनयना रूपसियों से प्रेम वार्ता 'गज़ल' का अर्थ है। ग़ज़ल फ़ारसी की विधा है जो उर्दू ने ग्रहण की है। ग़ज़ल के विधान और व्याकरण फ़ारसी से आते हैं। फारसी जाने बिना ग़ज़ल 'कहना' बिना नींव का भवन खड़ा करने की तरह है। उर्दू एक भाषा नहीं, कुछ भाषाओँ से  लिये गए शब्दों का संकलन मात्रा है। उर्दू शब्द कोष में कोई शब्द उर्दू का नहीं है, हर शब्द किसी दूसरी भाषा से लिया गया है।  हम जानते हैं कि भाषा और छंद का जन्म लोक में होता है। वाचिक परंपरा में गद्य और पद्य 'कहा' जाता है। मानव संस्कृति के विकास के साथ कागल, कलम और लिपि का विकास होने पर हिंदी में साहित्य गद्य हो या पद्य 'लिखा' जाने लगा। उर्दू में मौलिक चिंतन परंपरा न होने से वह अब भी 'कहने' की स्थिति में अटकी हुई है और 'जज़ल कही जा रहे है जबकि सच यही है की हर शायर कागज़-कलम से लिखता है, दुरुस्त करता है। 'लिखना' और 'कहना' किसी सोच और नज़रिए नहीं विकास और जड़ता के परिचायक हैं। 
हिंदी अपभ्रंश और संस्कृत से विरासत ग्रहण करती है, उर्दू फारसी से। फारसी स्वयं संस्कृत से ग्रहण करती है। जिस तरह एक माटी से उपजने पर भी दो भिन्न जाति के वृक्ष भिन्न होते हैं वैसे ही, एक मूल से होने के बाद भी फ़ारसी और हिंदी भिन्न-भिन्न हैं। दोनों की वर्णमाला, उच्चार व्यवस्था और व्याकरण भिन्न है। हिंदी वर्ण वर्ग की पंचम ध्वनि फ़ारसी में नहीं है। इसलिए फारसी में 'ब्राम्हण' को 'बिरहमन' लिखना-बोलना होता है जी हिंदी व्याकरण की दृष्टि से गलत है। फारसी की 'हे और 'हम्जा'  दो ध्वनियों के लिए हिंदी में एकमात्र ध्वनि 'ह' है। हिंदी का कवि 'ह' को लेकर पदांत-तुकांत बनाये तो हिंदी व्याकरण की दृष्टि से सही है पर 'हे' और 'हम्जा' होने पर उर्दूवाला गलत कहेगा। पदभार गणना पद्धति भी हिंदी और फारसी में भिन्न-भिन्न हैं। हिंदी में वर्ण के पूर्ण उच्चार के अनुसार पदभार होता है। उर्दू में लय प्रधानता के कारण मात्रा गिराने-बढ़ाने का रिवाज है जो हिंदी में नहीं है। इसलिए हिंदी ग़ज़ल या मुक्तिका उर्दू ग़ज़ल से कई मायनों में भिन्न है। उर्दू ग़ज़ल इश्किया शायरी है, हिंदी ग़ज़ल सामाजिक परिवर्तन की साक्षी है। भारतीय प्रभाव को ग्रहण कर उर्दू ग़ज़ल ने भी कथ्य को बदला है पर लिपि और व्याकरण-पिंगल के मामले में वह परिवर्तन को पचा नहीं पाती। यह भी एक सच है कि उर्दू शायरों की लोकप्रियता और आय दोनों हिंदी की डैम पर है। सिर्फ उर्दू लिपि में छपें तो दिन में तारे नज़र आ जाएँ। हिंदी के बल पर जिन्दा रहने के बाद भी हिंदी के व्याकरण के अनुसार लिखित ग़ज़ल को गलत कहने की हिमाकत गलत है। 
(१०) आज लोग लेखन से इसलिए जुड़ रहे हैं क्योंकि यह एक प्रभावी विजिटिंग कार्ड की तरह काम आ जाता है और यशपुरस्कार विदेश यात्राओं के तमाम अवसर उसे इसके जरिए सहज उपलब्ध होने लगते हैं।
आज ही नहीं आदि से लेखन और कला को तपस्या और मन-रंजन माननेवाले दो तरह के रचनाकार रहे हैं। साहित्यकार को सम्मान नहीं मिलता। विचारधारा विशेष के प्रति प्रतिबद्ध साहित्यकार अपनी वैचारिक गुलामी के लिए सम्मानित किये जाते हैं तो धनदाता साहित्यकार सम्मान खरीदता है। सम्मान के लिए आवेदन करना ही साहित्यकार को प्रार्थी बना देता है। मैं न तो सम्मान के लिए धन देने के पक्ष में हूँ, न आवेदन करने के। सम्मान के लिए संपर्क किये जाने पर मेरा पहला प्रश्न यही होता है कि सम्मान क्यों करना चाहते हैं? यदि मेरे लिखे को पढ़ने के बाद सम्मान करें तो ही स्वीकारता हूँ। जिसने मुझे पढ़ा ही नहीं, मेरे काम को जनता ही नहीं वह सम्मान के नाम पर अपमान ही है। 
आजकल साहित्यकार लेखन को समय बिताने का माध्यम मान रहा है। बच्चों को धंधा सौंप चुके या सेवानिवृत्त हो चुके लोग, घर के दायित्व से बचनेवाली या बहुओं के आ जाने से अप्रासंगिक हो चुकी महिलायें जिन्हें धनाभाव नहीं है, बड़ी संख्या में लेखन में प्रवेश कर सम्मान हेतु लालायित रहती हैं। वे पैसे देकर प्रकाशित व सम्मानित होती हैं। उनका रचा साहित्य प्राय: सतही होता है पर महिला होने के नाते मुखपोथी (फेसबुक) आदि पर खूब सराहा जाता है। यह भी सत्य है कि अनेक गंभीर श्रेष्ठ महिला रचनाकार भी हैं।
(११) कविसम्मेलनों के मंच पर तो लोग धन कमाने के लिए ही आते हैं। और वही उनकी आजन्म प्राथमिकता बनी रहती है। आज के संदर्भ में कविसम्मेलनों को आप कितना प्रासंगिक मानते हैं? और क्यों?
जब 'सादा जीवन उच्च विचार' के आदर्श को हटाकर समाज विशेषकर बच्चों, किशोरों, तरुणों हुए युवाओं के सम्मुख 'मौज. मजा और मस्ती' को आदर्श के रूप में स्थापित कर दिया जाए तो कला बिकाऊ हो ही जाएगी। कवि सम्मलेन में गलाबाजी या अदायगी का चलन पहले भी था किंतु प्रबुद्ध श्रोता देवराज दिनेश, शेरजंग गर्ग, शमशेर बहादुर सिंह आदि से गंभीर रचनाएँ भी सुनते थे। आजकल फूहड़ता हुए भौंडापन कविसम्मेलनों पर हावी है। 
कवि सम्मेलन सामाजिक परिवर्तन का बहुत प्रभावी अस्त्र है। सामाजिक समरसता, सहिष्णुता, समन्वय, सामंजस्य, शासकीय योजनाओं के प्रचार-प्रसार आदि के लिए दूरदर्शनी और अखबारी विज्ञापन के स्थान पर कविसम्मेलन का सहारा लिया जाए तो सकारात्मक परिणाम मिलेंगे।  
(१२) आज कागज़ के कवि और मंच के कवि दो अलग-अलग वर्ग में बँट गए हैं। क्या आप इस वर्गीकरण को उचित मानते हैं?
ऐसा वर्गीकरण कहा भले ही जाए किन्तु किया नहीं जा सकता। कवि सम्मेलन के आयोजक दलाल हो गए हैं। उन्हें स्तर से नहीं, कमाई से मतलब है। गुटबाजी हावी है। प्राय: कवि भाषा के व्याकरण और छंद के पिंगल से अनभिज्ञ हैं। यह समाज और साहित्य दोनों का दुर्भाग्य है कि सरस्वती पर लक्ष्मी हावी है। 
(१३) राजनैतिक दृष्टि से भी वाम और दक्षिण लेखकों-रचनाकारों के दो धड़े बन गए हैं। जिनमें कभी सहमति नहीं बनती क्या साहित्य के लिए यह उचित है?
साहित्य को उन्मुक्त और स्वतंत्र होना चाहिए। वैचारिक प्रतिबद्धता राजनीतिक पराधीनता के अलावा कुछ नहीं है। वाम और दक्षिण तो पाखण्ड और मुखौटा है। क्या किसी प्रगतिवादी साहित्यकार को मैथिलीशरण पुरस्कार लेने से मन करते देखा है? क्या कोई दक्षिणपंथी रचनाकर मुक्तिबोध पुरस्कार लेने से परहेज करता है? 
साहित्य को अपने विषय, विधा और कथ्य के साथ न्याय करना चाहिए। कोई रचनाकार घनश्यामदास बिड़ला और लेनिन, गाँधी और सुभाष, दीवाली और ईद परस्पर विरोधी विषयों पर महाकाव्य या उपन्यास क्यों न लिखे? मैंने भजन, हम्द और प्रेयर तीनों लिखे हैं। मेरे पुस्तकालय में सेठ गोविंददास, सावरकर, लोहिया और कामरेड शिवदास घोष एक साथ रहते हैं। ऐसे विभाजन अपने-अपने स्वार्थ साधने के लिए ही किये जाते हैं। 
(१४) लेखन के लिए पुरस्कार की क्या उपयोगिता है? आजकल अचीन्हें लोग गुमनाम लोगों को पुरस्कार देते रहते हैं इससे किसका भला होता है?रचनाकार का या पुरस्कार देनेवाले का? क्या यह लेखक में गलतफहमियाँ नहीं पैदा कर देता?
अर्थशास्त्र का नियम है कि बाजार माँग और पूर्ति के नियमों से संचालित होता है। अँधा बाँटे रेवड़ी चीन्ह-चीन्ह कर देय। जब तक सुधी और समझदार संस्थाएँ और लोग सही साहित्यकार और रचना का चयन कर प्रकाशित-सम्मानित नहीं करते तब तक अवसरवादी हावी रहेंगे।  
(१५) सरकारों द्वारा साहित्य के प्रकाशन और पुरस्कार दिए जाने के संबंध में आपके क्या विचार है?
सरकार जनगण के प्रतिनिधियों से बनती और जनता द्वारा कर के रूप में दिए गए धन से संचालित होती हैं। समाज में श्रेष्ठ मूल्यों का विकास और सच्चरित्र नागरिकों के लिए उपादेय साहित्य का प्रकाशन और पुरस्करण सरकार करे यह सिद्धांतत: ठीक है किन्तु  व्यवहार में सरकारें निष्पक्ष न होकर दलीय आचरण कर अपने लोगों को पुरस्कृत करती हैं। अकादमियों की भी यही दशा है।  विश्वविद्यालय तक नेताओं और अधिकारियों को पालने  का जरिया बन गए हैं। इन्हें स्वतंत्र और प्रशासनिक-राजनैतिक प्रतिबद्धता से मुक्त किया जा सके तो बेहतर परिणाम दिखेंगे। लोकतंत्र में कुछ कार्य लोक को  चाहिए। मैं और आप भी लोक हैं। हम और आप क्यों न एक साहित्य को हर साल व्यक्तिगत संसाधनों से पुरस्कृत करें? 
(१६ )आपकी अभी तक कितनी कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं? और किन-किन विधाओं में? आप अपने को मूलतः क्या मानते हैं-गीतकार या ग़ज़लकार
मेरी १० पुस्तकें प्रकाशित हैं- १. कलम के देव भक्ति गीत संग्रह, २. लोकतंत्र का मक़बरा लंबी कवितायेँ, ३. मीत मेरे छोटी कवितायेँ, ४. काल है संक्रांति का गीत-नवगीत संग्रह, ५. सड़क पर गीत-नवगीत संग्रह, ६.जंगल में जनतंत्र लघुकथाएँ, ७. दिव्य गृह काव्यनुवादित खंड काव्य, सहलेखन ८. सौरभ:, ९. कुरुक्षेत्र गाथा खंड काव्य तथा १०. भूकंप के साथ जीना सीखें -लोकोपयोगी तकनीक। ४ पुस्तकें यंत्रस्थ हैं। 
मैंने हिंदी गद्य व् पद्य की लगभग सभी प्रमुख विधाओं में लेखन किया है। नाटक, उपन्यास तथा महाकाव्य पर काम करना शेष है। 
मैं मूलत: खुद को विद्यार्थी मानता हूँ।  नित्य प्रति पढ़ता-लिखता-सीखता हूँ। 
(१७) आप अभियंता हैं। क्या अपने व्यवसाय से जुड़ा लेखन भी अपने किया है? 
हाँ, मैं विभागीय यांत्रिकी कार्य प्राक्कलन बनाना, मापन-मूल्यांकन करना आदि १९७३ से हिंदी में करता रहा हूँ और इसके लिए तिरस्कार, उपेक्षा और धनद भी भोगा है। मैंने २५ तकनीकी लेख लिखे हैं जो प्रकाशित भी हुए हैं। 'वैश्वीकरण के निकष पर भारतीय यांत्रिकी संरचनाएं' शीर्षक लेख को इंस्टीयूषन ऑफ़ इंजीनियर्स कोलकाता द्वारा २०१८ में राष्ट्रीय स्तर पर द्वितीय श्रेष्ठ आलेख का पुरस्कार महामहिम राष्ट्रपति जी के करकमलों से प्राप्त हुआ। मैंने अभियांत्रिकी विषयों को हिंदी माध्यम से पढ़ाया भी है। मैंने अभियांत्रिकी पत्रिकाओं व् स्मारिकाओं का हिंदी में संपादन भी किया है।  
(१८) आप संपादन कार्य से कब और कैसे जुड़े? संपादन के क्षेत्र में क्या-क्या कार्य किया? 
जब मैं शालेय छात्र था तभी गुरुवर सुरेश उपाध्याय जी धर्मयुग में उपसंपादक होकर गए तो यह विचार मन में पैठ गया कि संपादन एक श्रेष्ठ कार्य है। पारिवारिक दायित्वों के निर्वहन हेतु १९७२ में डिप्लोमा सिविल इंजीनियरिंग करने के बाद मैं फरवरी १९७३ में मध्य प्रदेश लोक निर्माण विभाग में उप अभियंता हो गया किन्तु आगे पढ़ने और बढ़ने का मन था। नौकरी करते हुए मैंने  १९७४ में विशारद, १९७६ में बी. ए., १९७८ में एम. ए. अर्थशास्त्र, १९८८० में विधि-स्नातक, १९८१ में स्नातकोत्तर डिप्लोमा पत्रकारिता, १९८३ में एम. ए. दर्शन शास्त्र, १९८५ में बी.ई. की परीक्षाएं उत्तीर्ण कीं। १९८० से १९९५ तक सामाजिक पत्रिका चित्रशीष,  १९८२ से १९८७ तक मुझे मध्य प्रदेश डिप्लोमा इंजीनियर्स संघ की मासिक पत्रिका, १९८६ से १९९० तक तकनीकी पत्रिका यांत्रिकी समय, १९९६ से १९९८ तक इंजीनियर्स टाइम्स, १९८८ से १९९० तक अखिल भारतीय डिप्लोमा इंजीनियर्स जर्नल तथा २००२ से २००८ तक साहित्यिक पत्रिका नर्मदा का मानद संपादन मैंने किया है। इसके अतिरिक्त १९ स्मारिकाओं, १४ साहित्यिक पुस्तकों का संपादन किया है। 
(१९) आपने सिविल इंजीनियरिंग के साथ कुछ और तकनीकी कार्य भी किया है? 
हाँ, मैंने वास्तु शास्त्र का भी अध्ययन किया है। वर्ष २००२ में जबलपुर अखिल भारतीय वास्तुशास्त्र सम्मलेन की स्मारिका 'वास्तुदीप' का संपादन किया इसका विमोचन सरसंघचालक श्री कूप. श्री सुदर्शन जी, राज्यपाल मध्य प्रदेश भाई महावीर तथा महापौर जबलपुट विश्वनाथ दुबे जी ने किया था। अभियंता दिवस स्मारिकाओं, इंडियन जिओटेक्नीकल सोसायटी जबलपुर चैप्टर की स्मारिकाओं तथा इंस्टीट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स की राष्ट्रीय तकनीकी हिंदी पत्रिका अभियंता बंधु का संपादन मैंने किया है। जटिल तकनीकी विषयों को हिंदी भाषा में सरलता पूर्वक प्रस्तुत करने के प्रति मैं सचेत रहा हूँ। 
(२०) आप अंतरजाल पर छंद लेखन की दिशा में भी सक्रिय रहे हैं। अभियंता होते हुए भी आप यह कार्य कैसे कर सके? 
वर्ष १९९४ में सड़क दुर्घटना के पश्चात् अस्थि शल्य क्रिया में डॉ. प्रमोद बाजपेई की असावधानी के कारण मुझे अपने बाएं पैर के कूल्हे का जोड़ निकलवा देना पड़ा। कई महीनों तक शैयाशायी रहने के पश्चात् चल सका। अभियंता के नाते मेरा कैरियर समापन की और था। निराशा के उस दौर में दर्शन शास्त्र की गुरु डॉ. छाया रॉय ने मनोबल बढ़ाया और मैंने कंप्यूटर एप्लिकेशन का प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम किया। अंतरजाल तब नया-नया ही था। मैंने हिन्दयुग्म दिल्ली के पटल पर लगभग ३ वर्ष तक हिंदी छंद शिक्षण किया। तत्पश्चात साहित्य शिल्पी पर २ वर्ष तक ८० से अधिक अलंकारों की लेखमाला पूर्ण हुई। साहित्य शिल्पी पर छंद शिक्षण का कार्य किया। भारत और विदेशों में सैकड़ों साहित्य प्रेमियों ने छंद लेखन सीखा। छंद शास्त्र के अध्ययन से विदित हुआ की इस दिशा में शोध और नव लेखन का काम नहीं हुआ है। हिंदी के अधिकांश शिक्षा और प्राध्यापक अंग्रेजी प्रेमी और छंद विधान से अनभिज्ञ हैं। नई पीढ़ी को छंद ज्ञान मिला ही नहीं है। तब मैंने अंतरजाल पर दिव्यनर्मदा पत्रिका, ब्लॉग, ऑरकुट, मुखपोथी (फेसबुक), वाट्स ऐप समूह 'अभियान' आदि के माध्यम से साहित्य और पिङग्ल सीखने कक्रम आगे बढ़ाया। हिंदी में आज तक छंद कोष नहीं बना है। मैं लगभग ढाई दशक से इस कार्य में जुटा हूँ। पारम्परिक रूप से २० सवैये उपलब्ध हैं. मैं १८० सवैये बना चुका हूँ। छंद प्रभाकर में भानु जी ने ७१५ छंद दिए हैं। मेरा प्रयास छंद कोष में १५०० छंद देने का है। प्रभु चित्रगुप्त जी और माँ सरस्वती की कृपा से यह महत्कार्य २०२० में पूर्ण करने की योजना है।  
(२१) आप पर्यावरण सुधार के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे हैं?
समन्वय तथा अभियान संस्था के माध्यम से हमने जबलपुर नगर में पौधारोपण, बाल शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, महिला शिक्षा, कचरा निस्तारण, व्यर्थ पदार्थों के पुनरुपयोग, नर्मदा नदी शुद्धिकरण, जल संरक्षण आदि क्षेत्रों में यथासंभव योगदान किया है।  
(२२) आप अभियंता हैं। क्या आपका तकनीकी ज्ञान कभी समाज सेवा का माध्यम बना ?
शासकीय सेवा में रहते हुए लगभग ४ दशकों तक मैंने भवन, सड़क, सेतु आदि के निर्माण व् संधारण में योगदान किया है। जबलपुर में भूकंप आने पर पद्मश्री आनंद स्वरुप आर्य में मार्गदर्शन में भूकंपरोधी भवन निर्माण तथा क्षतिग्रस्त भवन की मरम्मत के कार्य में योगदान किया। निकट के गाँवों में जा-जाकर अपने संसाधनों से मैंने कच्चे मकानों और झोपड़ियों को लोहा-सीमेंट के बिना भूकंप से सुरक्षित बनाने की तकनीकी जानकारी ग्रामवासियों को दी। 'भूकंप  जीना सींखें' पुस्तिका की १००० प्रतियाँ गाँवों में निशुल्क वितरित की। मिस्त्री, बढ़ई आदि को मरम्मत की प्रविधियाँ समझाईं। नर्मदा घाट पर स्नानोपरांत महिलाओं के वस्त्र बदलने के लिए स्नानागार बनवाने, गरीब जनों को वनों और गाँवों में प्राप्त सामग्री का प्रयोग कर सुरक्षित मकान बनाने की तकनीक दी। झोपड़ी-झुग्गी वासियों को पॉलिथीन की खाली थैलियों और पुरानी साड़ियों, चादरों आदि को काटकर उसके पट्टियों को ऊन की तरह बुनकर उससे आसन, दरी, चटाई, परदा आदि बनाने की कला सीखने, गाजर घास और बेशरम जैसे खरपतवार को नष्ट कर चर्म रोगों से बचने का तरीक सीखने, तेरहीं भोज की कुप्रथा समाप्त करने, दहेज़ रहित आदर्श सामूहिक विवाह करने, पुस्तक मेला का आयोजन करने आदि-आदि अनेक कार्य मैंने समय-समय पर करता रहा हूँ।   
(२३)लेखन संबंधी आपकी भविष्य की क्या योजनाएं हैं?
हम विविध संस्थाओं के माध्यम से तकनीकी शिक्षा का माध्यम हिंदी बनवाने के लिए सक्रिय रहे हैं। इसमें कुछ सफलता मिली है, कुछ कार्य शेष है। इंस्टीट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स प्रति वर्ष एक पत्रिका तकनीकी विषयों पर हिंदी में राष्ट्रीय स्टार पर निकाल रहा है। परीक्षा का मध्यान हिंदी भी हो गया है। शासकीय पॉलीटेक्निक में इंजीयरिंग का डिप्लोमा पाठ्यक्रम हिंदी में पढ़ाया जाने लगा है। बी.ई. तथा एम.बी.बी.एस. की पढ़ाई हिंदी में कराने का प्रयास है। इसमें आप का सहयोग भी चाहिए। हिंदी को विश्ववाणी बनाने की दिशा में यह कदम आवश्यक है। 
मैं अगले वर्ष दोहा, लघुकथा, हाइकू, मुक्तक, मुक्तिका, तहा गीत-नवगीत के संकलन प्रकाशित करने के विचार में हूँ। 
(२४)आज हिंदी भाषा बाजारवाद की चुनौतियों को झेल रही है। उसका रूप भी बदल रहा है। आप इसे विकृति मानते हैं या समय की जरूरत?
वसुधैव कुटुम्बकम और वैश्विक नीड़म की सनातन भारतीय मान्यता अब ग्लोबलाइजेशन हो गयी है। इसके दो पहलू हैं। हमें जिस देश में व्यापार करना है उसकी भाषा सीखनी होगी और जिस देश को भारत का बाजार चाहिए उसे हिंदी सीखना होगी। विदेशों में प्रति वर्ष २-३ विश्वविद्यालयों में हिंदी शिक्षण विभाग खुल रहे हैं। हमें अपने उन युवाओं को विदेश जाना चाहते हैं उनकी स्नातक शिक्षा के साथ उस देश की भाषा सिखाने की व्यवस्था करना चाहिए। इसी तरह जो विद्यार्थी विदेश से भारत में आते हैं उन्हें पहले हिंदी सिखाना चाहिए। 
(२५) समकालीन रचनाकारों में आप किन्हें महत्वपूर्ण मानते हैं?
हर रचनाकार जो समाज से जुड़कर समाज के लिए लिखता है, महत्वपूर्ण होता है। अगंभीर किस्म के जो रचनाकार हर विधा में टूटा-फूटा लिखकर, ले-देकर सम्मानित हो रहे हैं, वे ही भाषा और साहित्य की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार हैं। हालत यह है कि लिखने वाले कुकुरमुत्ते की तरह बढ़ रहे हैं, पढ़नेवालों का अकाल हो रहा है। 
(२६) पत्रकारिता और साहित्य में कभी घनिष्ठ संबंध रहा करता था। अच्छा साहित्यकार ही संपादक होता था। आज जो संपादक होता है लोग उसका नाम तक नहीं जानते। यह स्थिति क्यों आई?
पत्रकारिता अब सेवा या साधन नहीं पेशा हो गयी है। अब गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी, रघुवीर सहाय, बांकेबिहारी भटनागर, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, कमलेश्वर, धर्मवीर भारती जैसे पत्रकार कहाँ हैं? अति व्यावसायिकता, राजनीति का अत्यधिक हस्तक्षेप तथा पत्रकारों में येन-केन-प्रकारेण धनार्जन की लालसा ही पत्रकारों की दुर्दशा का कारण है। अंतर्जालीय पत्रकारिता सनसनी और टीआरपी को सर्वस्व समझ रही है, पता-दर्शक का उसके लिए कोई महत्व नहीं है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की यह दुर्दशा चिंतानीय है। जब तक समाज और देश की सेवा की भावना को लेकर कुछ छोटे-छोटे समूह पत्रकारिता को पवित्रता के साथ नहीं करेंगे सुधार नहीं होगा।   
(२७) लेखन के माध्यम से आप समाज को क्या संदेश देना चाहते हैं?
वर्तमान परिवेश में सबसे अधिक आवश्यक कार्य ईमानदारी और श्रम की प्रतिष्ठा करना है। सरकारें और पत्रकारिता अपनी विश्वसनीयता गँवा चुकी हैं। न्यायालय पर भी छींटे पड़े हैं। धार्मिक-सामाजिक क्षेत्र में या तो अंध विश्वास है या अविश्वास। सेना ही एकमात्र प्रतिष्ठान है जो अपेक्षाकृत रूप से कम संदेह में है। लेखन का एक ही उद्देश्य है समाज में विश्वास का दीपक जलाये रखना। 'अप्प दीपो भव' और 'तत्तु समन्वयात' के बुद्ध सूत्र  हम सबके लिए आवश्यक हैं। मेरे लेखन का यही सन्देश और उद्देश्य है 'जागते रहो' 
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