शुक्रवार, 3 मई 2019

दोहा दो दुम का

दो दुम के दोहे  
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मन में क्या किससे कहें?, कौन सुनेगा बात?
सुनकर समझेगा 'सलिल', अब न रहे हालात
कर रहे सब मनमानी
बिखरते घर नादानी 
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देख रहे हैं तमाशा, अब अपने ही लोग.
ऋण ऋण मिल ऋण ही रहें, कैसा है दुर्योग?
रो रहा लोकतंत्र है 
ठठाता कोकतंत्र है  
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जब जिसने जो कह दिया, बोला सच्ची बात
सच न कहीं है अगर तो, सच दोषी कर घात

सत्य की झूठी कसमें  
निभाते खाकर रसमें 
*
एक दूसरे को चलो, दें हम दोनों दोष.
मिल-जुल लूटें देश को,दिखला झूठा रोष.
लोग संतोष करेंगे
हमारा कोष भरेंगे

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राजनीति में नीति का, कहीं न किंचित काम.
निज प्रशस्ति कर आप मुख,  रहो बढ़ाते दाम.
लोग बिलखें या रोएँ
काँध पर तुमको ढोएँ
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