सोमवार, 27 मई 2019

गीत

गीत 
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इतना बड़ा हमारा देश
नहीं बड़प्पन हममें शेष। 
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पैर तले से भूमि छिन गयी
हाथों में आकाश नहीं।
किसे दोष दूँ?, कौन कर रहा
मेरा सत्यानाश नहीं।
मानव-हाथ छ्ल जाकर नित
नोच रहा हूँ अपने केश।
इतना बड़ा हमारा देश
नहीं बड़प्पन हममें शेष।
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छाँह, फूल.पत्ते,लकड़ी ले
कभी नहीं आभार किया।
जड़ें खोद, मेरे जीवन का
स्वार्थ हेतु व्यापार किया।
मुझको जीने नहीं दिया, खुद
मानव भी कर सका न ऐश।
इतना बड़ा हमारा देश
नहीं बड़प्पन हममें शेष।
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मेरे आँसू की अनदेखी
करी काटकर बोटी-बोटी।
निष्ठुर-निर्मम दानव बनकर
मुझे जलाकर सेंकी रोटी।
कोेेई नहीं अदालत जिसमें
करून वृक्ष मैं, अर्जी पेश
इतना बड़ा हमारा देश
नहीं बड़प्पन हममें शेष
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