गुरुवार, 9 मई 2019

दोहा दुनिया

दोहा दुनिया
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पत्नी ने तन-मन लुटा, किया तुझे स्वीकार.
तू भी क्या उस पर कभी सब कुछ पाया वार?
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अगर नहीं तो यह बता, किसका कितना दोष.
प्यार न क्यों दे-ले सका, अब मत हो मदहोश..
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बने-बनाया कुछ नहीं, खुद जाते हम टूट.
दोष दे रहे और को, बोल रहे हैं झूठ.
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वह क्यों तोड़ेगा कभी, वह है रचनाकार.
चल मिलकर कुछ रचें हम, शून्य गहे आकार..
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अमर नाथ वह मर्त्य हम, व्यर्थ बनते मूर्ति
पूज रहे बस इसलिए, करे स्वार्थ की पूर्ति
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विचारणीय : अगर न होता काश तो.......
संजीव 'सलिल'
नहीं बरसता 'सलिल' तो, ना होता अवकाश.
कहिये क्यों हम देखते, झट सिर पर आकाश?.
रवि शशि दीपक बल्ब भी, हो जाते बेकार-
गहन तिमिर में किस तरह, मिलता कहें प्रकाश?.
धरना देता अतिथि जब, अनचाहा चढ़ शीश.
मन ही मन कर जोड़कर, कहते अब जा काश..
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