शुक्रवार, 3 मई 2019

लघुकथा जंगल में जनतंत्र

लघुकथा 
जंगल में जनतंत्र 
- आचार्य संजीव वर्मा "सलिल" 

जंगल में चुनाव होनेवाले थे। 
मंत्री कौए जी एक जंगी आमसभा में सरकारी अमले द्वारा जुटाई गयी भीड़ के आगे भाषण दे रहे थे- 'जंगल में मंगल के लिए आपस का दंगल बंद कर एक साथ मिलकर प्रगतिति की रह पर क़दम रखिये। सिर्फ़ अपना नहीं सबका भला सोच विचार। ' 
मंत्री जी! लाइसेंस प्राप्त करने के लिए धन्यवाद। आपके काग़ज़ घर पर दे आया हूँ। 
भाषण के बाद क्लस्टर सियार ने बताया। मंत्री जी ख़ुश हुए। 
केवल उल्लू ने आकर कहा- 'अब तो बहुत ढाँसू बोलने लगे हैं। 
हाऊसिंग सोसायटी वाले मामले को दबाने के लिए रखिए 'और एक लिफ़ाफ़ा उन्हें सबकी नज़र बचाकर दे दिया। 
विभिन्न महकमों के अफ़सरों कि अपनी-अपनी भाग मंत्री जी के निजी सचिव गीध को देते हैं कामों की जानकारी मंत्री जी को। 
समाजवादी विचार धारा के मंत्री जी मिले उपहारों और लिफ़ाफ़ों को देखते हुए सोच रहे थे - 'जंगल में जनतंत्र जिंदाबाद।'
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