मंगलवार, 21 मई 2019

मुक्तिका दोहा

मुक्तिका 
संजीव 
*
मखमली-मखमली 
संदली-संदली 
.

भोर- ऊषा-किरण
मनचली-मनचली
.
दोपहर है जवाँ
खिल गयी नव कली
.
साँझ सुन्दर सजी
साँवली-साँवली
.
चाँद-तारें चले
चन्द्रिका की गली
.
रात रानी न हो
बावली-बावली
.
राह रोके खड़ा
दुष्ट बादल छली
***
(दस मात्रिक दैशिक छन्द
रुक्न- फाइलुन फाइलुन)
दोहा सलिला 
*
चिड़िया हों या औरतें, कलरव कर लें जीत
हार मानती ही नहीं, लेतीं जीत अतीत
*
नारी नदिया नाव से, हो जाता उद्धार।
पग अपंग चलता रहे, आती मंज़िल द्वार।।
*

कोई टिप्पणी नहीं: