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शुक्रवार, 7 मई 2021

दोहा, मुक्तक

दोहा सलिला 
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कौन अकेला जगत में, प्रभु हैं सबके साथ। 
काम करो निष्काम रह, उठा-झुकाओ माथ।। 
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मन में अब भी रह रहे, पल-पल मैया-तात।
जाने क्यों जग कह रहा, नहीं रहे बेबात।।
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कल की फिर-फिर कल्पना, कर न कलपना व्यर्थ।
मन में छवि साकार कर, अर्पित कर कुछ अर्ध्य।।
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जब तक जीवन-श्वास है, तब तक कर्म सुवास।
आस धर्म का मर्म है, करें; न तजें प्रयास।।
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मोह दुखों का हेतु है, काम करें निष्काम।
रहें नहीं बेकाम हम, चाहें रहें अ-काम।।
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खुद न करें निज कद्र गर, कद्र करेगा कौन?
खुद को कभी सराहिए, व्यर्थ न रहिए मौन.
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प्रभु ने जैसा भी गढ़ा, वही श्रेष्ठ लें मान।
जो न सराहे; वही है, खुद अपूर्ण-नादान।।
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लता कल्पना की बढ़े, खिलें सुमन अनमोल।
तूफां आ झकझोर दे, समझ न पाए मोल।।
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क्रोध न छूटे अंत तक, रखें काम से काम।
गीता में कहते किशन, मत होना बेकाम।।
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जिस पर बीते जानता, वही; बात है सत्य।
देख समझ लेता मनुज, यह भी नहीं असत्य।।
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भिन्न न सत्य-असत्य हैं, कॉइन के दो फेस।
घोड़ा और सवार हो, अलग न जीतें रेस।।
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७.५.२०१८
मुक्तक 
बात हो बेबात तो 'क्या बात' कहा जाता है। 
छू ली जो दिल को ज़ज्बात कहा जाता है।। 
घटती हैं घटनाएँ हर पल ही बहुत सी लेकिन-
गहरा हो असर तो हालात कहा जाता है
।। 
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