कुल पेज दृश्य

शनिवार, 21 नवंबर 2020

नवगीत: वेश संत का -संजीव

नवगीत: 
संजीव 
*
वेश संत का
मन शैतान
छोड़ न पाये भोग-वासना
मोह रहे हैं काम-कामना
शांत नहीं है क्रोध-अग्नि भी
शेष अभी भी द्वेष-चाहना
खुद को बता
रहे भगवान
शेष न मन में रही विमलता
भूल चुके हैं नेह-तरलता
कर्मकांड ने भर दी जड़ता
बन बैठे हैं
ये हैवान
जोड़ रखी धन-संपद भारी
सीख-सिखाते हैं अय्यारी
बेचें भ्रम, क्रय करते निष्ठा
ईश्वर से करते गद्दारी
अनुयायी जो
है नादान
खुद को बतलाते अवतारी
मन भाती है दौलत-नारी
अनुशासन कानून न मानें
कामचोर-वाग्मी हैं भारी
पोल खोल दो
मन में ठान
***
२१-११-२०१४ 

कोई टिप्पणी नहीं: