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शुक्रवार, 13 मार्च 2020

बुंदेली रचनाएँ - सलिल २०२०

बुंदेली रचनाएँ - सलिल

लेख:


बुन्देली लोकरंग की साक्षी : ईसुरी की फागें

संजीव
.
बुंदेलखंड के महानतम लोककवि ईसुरी के काव्य में लोकजीवन के सांस्कृतिक, साहित्यिक, सामाजिक पक्ष पूरी जीवन्तता और रचनात्मकता के साथ उद्घाटित हुए हैं. ईसुरी का वैशिष्ट्य यह है कि वे तथाकथित संभ्रांतता या पांडित्य से कथ्य, भाषा, शैली आदि उधार नहीं लेते. वे देशज ग्रामीण लोक मूल्यों और परम्पराओं को इतनी स्वाभाविकता, प्रगाढ़ता और अपनत्व से अंकित करते हैं कि उसके सम्मुख शिष्टता-शालीनता ओढ़ति सर्जनधारा विपन्न प्रतीत होने लगती है. उनका साहित्य पुस्तकाकार रूप में नहीं श्रुति परंपरा में सुन-गाकर सदियों तक जीवित रखा गया. बुंदेलखंड के जन-मन सम्राट महान लोककवि ईसुरी की फागें गेय परंपरा के कारण लोक-स्मृति और लोक-मुख में जीवित रहीं. संकलनकर्ता कुंवर श्री दुर्ग सिंह ने १९३१ से १९४१ के मध्य इनका संकलन किया. श्री इलाशंकर गुहा ने धौर्रा ग्राम (जहाँ ईसुरी लम्बे समय रहे थे) निवासियों से सुनकर फागों का संकलन किया.   अपेक्षाकृत कम प्रचलित निम्न फागों में ईसुरी के नैसर्गिक कारयित्री प्रतिभा के साथ-साथ बुन्देली लोक परंपरा, हास्य एवं श्रृंगारप्रियता के भी दर्शन होते हैं: 

कृष्ण-भक्त ईसुरी वृन्दावन की माटी का महात्म्य कहते हुए उसे देवताओं के लिए भी दुर्लभ बताते हैं:
अपनी कृस्न जीभ सें चाटी, वृन्दावन की माटी
दुरलभ भई मिली ना उनखों, देई देवतन डाटी
मिल ना सकी अनेकन हारे, पावे की परिपाटी
पायो स्वाग काहू ने नइयाँ, मीठी है की खाटी
बाही रज बृजबासिन ‘ईसुर’, हिसदारी में बाटी

कदम कुञ्ज में खड़े कन्हैया राहगीरों को रास्ता भुला देते हैं, इसलिए पथिक जमुना की राह ही भूल गये हैं अर्थात जमुना से नहीं जाते. किसी को भुला कर मजा लेने की लोकरीत को ईसुरी अच्छा नहीं मानते और कृष्ण को सलाह देते हैं कि किसी से अधिक हँसी अच्छी नहीं होती:
आली! मनमोहन के मारें, जमुना गेल बिसारें
जब देखो जब खडो कुञ्ज में, गहें कदम की डारें
जो कोउ भूल जात है रस्ता, बरबस आन बिगारें
जादा हँसी नहीं काऊ सें, जा ना रीत हमारें
‘ईसुर’ कौन चाल अब चलिए, जे तौ पूरी पारें

रात भर घर से बाहर रहे कृष्ण को अपनी सफाई में कुछ कहने का अवसर मिले बिना ‘छलिया’ का खिताब देना ईसुरी के ही बस की बात है:
ओइ घर जाब मुरलियाबारे!, जहाँ रात रये प्यारे
हेरें बाट मुनइयां बैठीं, करें नैन रतनारे
अब तौ कौनऊँ काम तुमारो, नइयाँ भवन हमारे
‘ईसुर’ कृष्ण नंद के छौना, तुम छलिया बृजबारे

फगुआ हो और राधा न खेलें, यह कैसे हो सकता है? कृष्ण सेर हैं तो राधा सवा सेर. दोनों की लीलाओं का सजीव वर्णन करते हैं ईसुरी मानो साक्षात् देख रहे हों. राधा ने कृष की लकुटी-कमरिया छीन ली तो कृष्ण ने राधा के सिर से सारी खींच ली. इतना ही हो तो गनीमत... होली की मस्ती चरम पर हुई तो राधा नटनागर बन गयी और कृष्ण को नारी बना दिया:
खेलें फाग राधिका प्यारी, बृज खोरन गिरधारी
इन भर बाहू बाँस को टारो, उन मारो पिचकारी
इननें छीनीं लकुटि मुरलिया, उन छीनी सिर सारी
बे तो आंय नंद के लाला, जे बृषभान दुलारी
अपुन बनी नटनागर ‘ईसुर’, उनें बनाओ नारी

अटारी के सीढ़ी चढ़ते घुंघरू निशब्द हो गए. फूलों की सेज पर बनवारी की नींद लग गयी, राधा के आते ही यशोदा के अनाड़ी बेटे की बीन (बांसुरी) चोरी हो गयी. कैसी सहज-सरस कल्पना है:   
चोरी गइ बीन बिहारी की, जसुदा के लाल अनारी की
जामिन अमल जुगल के भीतर, आवन भइ राधा प्यारी की
नूपुर सबद सनाके खिंच रये, छिड़िया चड़त अटारी की
बड़ी गुलाम सेज फूलन की लग गइ नींद मुरारी की
कात ‘ईसुरी’ घोरा पै सें, उठा लई बनवारी की

कृष्ण राधा और गोपियों के चंगुल में फँस गये हैं. गोपियों ने अपने मनभावन कृष्ण को पकड़कर स्त्री बनाए का उपक्रम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. कृष्ण की बनमाला और मुरली छीनकर सिर पर साड़ी उढ़ा दी गयी. राधा ने उन्हें सभी आभूषणों से सजाकर कमर में लंहगा पहना दिया और सखियों के संग फागुन मनाने में लीन हो गयी हैं. श्रृंगार और हास्य का ऐसा जीवंत शब्द चित्र ईसुरी ही खींच सकते हैं:  
पकरे गोपिन के मनभावन, लागी नार बनावन
छीन लई बनमाल मुरलिया, सारी सीस उड़ावन
सकल अभूषन सजे राधिका, कटि लंहगा पहरावन
नारी भेस बना के ‘ईसुर’, फगुआ लगी मगावन

ईसुरी प्रेमिका से निवेदन करा रहे हैं कि वह अपने तीखे नयनों का वार न करे, जिरह-बख्तर कुछ न कर सकेंगे और देखे ही देखते नयन-बाण दिल के पार हो जायेगा. किसी गुणी वैद्य की औषधि भी काम नहीं आएगी, ईसुरी के दवाई तो प्रियतमा का दर्शन ही है. प्रणय की ऐसी प्रगाढ़ रससिक्त अभिव्यक्ति अपनी मिसाल आप है:
नैना ना मारो लग जैहें, मरम पार हो जैहें
बखतर झिलम कहा का लैहें, ढाल पार कर जैहें
औषद मूर एक ना लगहै, बैद गुनी का कैहें
कात ‘ईसुरी’ सुन लो प्यारी, दरस दबाई दैहें

निम्न फाग में ईसुरी नयनों की कथा कहते हैं जो परदेशी से लगकर बिगड़ गये, बर्बाद हो गये हैं. ये नयना अंधे सिपाही हैं जो कभी लड़कर नहीं हारे, इनको बहुत नाज़ से काजल की रेखा भर-भरकर पाला है किन्तु ये खो गए और इनसे बहते आंसुओं से नयी की नयी सारी भीग गयी है. कैसी मार्मिक अभिव्यक्ति है:    
नैना परदेसी सें लग कें, भये बरबाद बिगरकें
नैना मोरे सूर सिपाही, कबऊँ ना हारे लरकें
जे नैना बारे सें पाले, काजर रेखें भरकें
‘ईसुर’ भींज गई नई सारी, खोवन अँसुआ ढरकें

श्रृंगार के विरह पक्ष का प्रतिनिधित्व करती यह फाग ईसुरी और उनकी प्रेमिका रजऊ के बिछड़ने की व्यथा-कथा कहती है:
बिछुरी सारस कैसी जोरी, रजो हमारी तोरी
संगे-सँग रहे निसि-बासर, गरें लिपटती सोरी
सो हो गई सपने की बातें, अन हँस बोले कोरी
कछू दिनन को तिया अबादो, हमें बता दो गोरी
जबलो लागी रहै ‘ईसुरी’, आसा जी की मोरी


ईसुरी की ये फागें श्रृंगार के मिलन-विरह पक्षों का चित्रण करने के साथ-साथ hasya के उदात्त पक्ष को भी सामने लाती हैं. इनमें हँसी-मजाक, हँसाना-बोलना सभी कुछ है किन्तु मर्यादित, कहीं भी अश्लीलता का लेश मात्र भी नहीं है. ईसुरी की ये फागें २८ मात्री नरेन्द्र छंद में रचित हैं. इनमें १६-१२ पर यति का ईसुरी ने पूरी तरह पालन किया है. सम चरणान्त में गुरु की अधिकता है किन्तु २ लघु भी प्राप्य है. इक फाग में ४, ५ या ६ तक पंक्तियाँ मिलती हैं. एक फाग की सभी पंक्तियों में सम चरणान्त सम्मन है जबकि विषम चरणान्त में लघु-गुरु का कोई बंधन नहीं है.
*
-समन्वयम २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१.

शोध लेख:
बुन्देली भाषा और लघुकथाएँ
*
बुंदेलखंड में लोक द्वारा व्यवहृत भाषा को बुन्देली कहा जाता है। यह अवधी से मिलती-जुलती है। महाकवि तुलसीदास रचित कालजयी कृति 'रामचरित मानस' को बुन्देली जन बुन्देली भाषा का महाकाव्य और अवधी जन अवधी का महाकाव्य इसी कारण कहते हैं। बुंदेलखंड क्षेत्र की सीमा के संबंध में एक दोहा कहा जाता है- 
इत जमुना उत बेतवा, इत नर्मद उत टौंस / छत्रसाल से लड़न की, रही न काहू हौंस 
मध्य प्रदेश के जबलपुर, नरसिंहपुर, सिवनी, बालाघाट, होशंगाबाद, दमोह, सागर, ग्वालियर, दतिया, टीकमगढ़, छतरपुर, कटनी आदि जिले तथा उत्तर प्रदेश के झाँसी, जालौन, हमीरपुर, ललितपुर आदि जिले बुंदेली भाषी हैं। बुन्देली की सीमाओं को पूर्वी हिंदी, पश्चिमी हिंदी, राजस्थानी, मराठी, छतीसगढ़ी, बघेली, अवधी, ब्रज तथा भोजपुरी के क्षेत्र स्पर्श करते हैं। बुन्देली का विकास शौरसेनी अपभ्रंश के दक्षिणी रूप से होना मान्य है। मध्यकाल में बुन्देली में अनेक महत्वपूर्ण साहित्यिक कृतियों की रचना की गयी। महाकवि जगनिक कृत कालजयी लोककाव्य / महाकाव्य 'आल्हखंड' तथा 'छत्र प्रकाश' बुन्देली के अमर ग्रन्थ हैं। ईसुरी और गंगाधर जैसे लोक कवियों ने बुन्देली के लोक काव्य को गगनचुम्बी ऊँचाई दी। ईसुरी की फागें तथा उनकी नायिका 'रजऊ' में बुन्देली लोक मानस के प्राण बसते हैं। ओरछा निवासी महाकवि केशव ने बुन्देली को अपने काव्य-कर्म के माध्यम से विद्वद्वर्ग में प्रतिष्ठित कर हिंदी-वांग्मय को समृद्ध किया। 
उपबोलियाँ-
बुन्देली की प्रमुख उप बोलियाँ खटोला, पवारी, भदावरी, सहेरिया, किनार, तिरहाटी, राघोवंशी, राठौरी, लोधान्ती, बनाफरी और पचेली आदि हैं। 
वैशिष्ट्य- 
बुन्देली में 'ऐ' तथा 'औ' मूल रूप से अपवाद स्वरुप ही व्यवहृत होते हैं। सामान्यत: इनका प्रयोग संयुक्त स्वर के रूप में होता है। 'ऐ' का 'इ' तथा 'औ' का 'उ' ह्रस्व हो जाता है। अकारांत शब्द ओकारांत हो जाते हैं। जैसे गया - गयो। कहीं 'र' 'ड़' हो जाता है, कहीं 'ड़' 'र'।  जैसे नौकर - नौकड़। परसर्ग (कारक)के अंतर्गत कर्ता- नैं, ने तथा न्हैं, कर्म-  कों, खों, खा, खें तथा कुं, संबंध- की, के, कों, खी, खे, खैं, खो तथा खों के रूप में प्रयोग किए जाते हैं। स्त्रीलिंग बनाने के लिए न, नि, इन, आनि, ई प्रत्ययों का प्रयोग किया जाता है। जैसे- काछिन, ऊंटनी, सुनारिन, जेठानी, काकी आदि। सर्वनामों के अंतर्गत संबंध में एकवचन में 'मैं' का रूप मोरो, मोको, मोरे, मोये, मोए आदि तथा बहुवचन में हमारो, हमे, हमाओ आदि रूप मिलते हैं। वर्तमानकालिक कृदंत का 'तु' से अंत होता है। जैसे- करतु हसत। भूतकालिक कृदंत का अंत 'ओ' से तथा पूर्वकालिक कृदंत का 'के', 'कैं', 'को'. 'कों' से अंत होता है।  
बुन्देली में विगत ७०० वर्षों सेपर्याप्त साहित्य सृजन हुआ है। बुन्देली काव्य से विभिन्न सप्रदयों, पूजा-पद्धतियों, जातियों और राजाओं आदि का परिचय भी मिलता है। विविध प्रवृत्तियों और आन्दोलनों के आधार पर बुन्देली काव्य के सात युग माने जा सकते हैं, जिन्हें अध्ययन के सुविधा से निम्न नामों से अभिहित किया गया है।
१. भाषा काव्य आन्दोलन - नवीं शती विक्रमी से तेरहवीं शती तक २. कथा काव्य काल - तेरहवीं से सोलहवीं शदी विक्रमी तक ३. रीति भक्ति काव्य काल - सत्रहवीं शदी से सत्रहवीं शती विक्रमी तक। ४. सांस्कृतिक उन्मेष काल - सत्रहवीं शती से अट्ठाहरवीं शती विक्रमी तक। ५. श्रृंगार काव्य काल - अट्ठारहवीं शती से उन्नीस सौ पचास विक्रमी तक। ६. स्वतन्त्रता पूर्व आधुनिक - सम्वत् १९५० से २००० विक्रमी तक। ७. अत्याधुनिक काल - सम्वत् २००० से अब तक।
भाषा काव्यान्दोलन काल (९वीं शती विक्रमी से १३वीं शती विक्रमी तक)
छान्दस का प्राकृत, संस्कृत और अपभ्रंश के माध्यम से लोक भाषा में विकसित होना समय की आवश्यकता रही। छठी शताब्दी में अपभ्रंश का प्रयोग भाषा के रूप में मिलता है। १२वीं शताब्दी तक वह साहित्यिक भाषा रही पर जनपदीय बोलियों से यह भी मुक्त नहीं रही। नव्य भारतीय आर्य भाषा का विकास मध्य देशीय शौरसेनी से है। अपभ्रंश के विकासोन्मुख रूप ग्रहण करते समय 'अवह' (अपभ्रंश) में जैन, बौद्ध तथा नाथ पंथियों की अनेक महत्वपूर्ण रचनाएँ  हुईं। सिद्धों ने लोक भाषा का प्रयोग किया।  हिंदी का प्रारंभिक नाम भाषा ही है। भाषा में परिवर्तन और सृजन सामानांतर होता रहा। वाचिक (मौखिक) परम्परा से भी काव्य सृजन लोक काव्य तक सीमित रहा। लिखित काव्यों में कथा काव्यों की भरमार रही जिनमें विष्णुदास लिखित रामायण कथा, महाभारत कथा, रुक्मिणी मंगल, स्वर्गारोहण कथा आदि से भाषा काव्य की परम्परा प्रमाणित होती है। भाषा काव्य के प्रारम्भिक चरण में प्रस्तुत कृतियाँ स्थानीयता के प्रभावों से मुक्त, बोली के प्रारम्भिक रूप से मेल खाती, व्यापक भाषा का स्वरुप प्रस्तुत करती हैं।
मौखिक परम्परा के महाकाव्य 'आल्हखण्ड' का वैशिष्ट्य बुन्देली का अपना है। वाचिक परंपरा से प्राप्त जगनिक रचित आल्हा बुन्देली भूमि की संस्कृति और बोली का प्रथम महाकाव्य ही नहीं भाषा काव्य का उत्तम महाकाव्य भी है। आल्हखंड की भाषा काव्यकाल में लिखित कोई प्रति उपलब्ध नहीं है।महोवा जिसकी चर्चा इस प्रबन्ध काव्य में है १२वीं शती तक कला केन्द्र रहा है । इसकी प्रामाणिकता के लिए न तो अन्तःसाक्ष्य ही उपादेय है, न बर्हिसाक्ष्य। इतिहास में परमर्दिदेव की कथा भिन्न रूप में है। आल्हखण्ड के वैभवशाली राजा परमाल के पराक्रमी सामंत हैं आल्हा और ऊदल। यह प्रबन्ध काव्य समस्त कमजोरियों के बावजूद बुन्देली समाज की मान्यताओं, नीति और कर्तव्य का परिचायक है। बुन्देलखण्ड के गाँवों में आज भी वर्षा काल में आल्हा गायन और आल्हा गायन की स्पर्धाएँ होती हैं।
भरी दुपहरी सरवन गाइये, सोरठ गाइये आधी रात। आल्हा पवाड़ा वादिन गाइये, जा दिन झड़ी लगे दिन रात।।

कथा काव्य काल (१३वीं शती विक्रमी से १६वीं शती विक्रमी तक)-
'कथा काव्य' प्रबन्ध काव्य का ही एक भेद है जिसमें महाकाव्य के विधान का हर तत्व होता है किंतु कथा सहज प्रवाह युक्त जीवन दर्शन बिना होती है। बुन्देलखण्ड में जगनिक के बाद विष्णुदास ही ऐसे कवि हैं जिन्होंने १४वीं शती में दो कथा काव्य महाभारत कथा और रामायण कथा लिखी। इन दोनों कथाओं का आधार कृष्ण कथा और रामकथा है पर उनके निर्वाह की शैली में संस्कृत कथा काव्यों और हिन्दी कथा काव्यों से भिन्नता है। यह बुन्देली के प्रथम ग्रन्थ हैं। बुन्देली को लम्बे समय तक ब्रज की सहोदरा तब तक कहा गया जब तक उसकी बुन्देली अस्मिता बृज से आक्रान्त हो, क्षत न होने लगी। बुन्देली कवि विष्णुदास की रचनाएं बुंदेली पीठ सागर के प्रकाश में आने पर उनमें बुन्देली का मार्दव, ओज, लालित्य एवं संस्कृति मूर्तिमान दिखे। कवि ने युग-चेतना को दोनों कथाओं के माध्यम से व्यक्त कर तत्कालीन परिस्थितियों पर प्रकाश डाला है। महाभारत की रचना का समय १४३५ ई. और रामायण कथा की रचना १४४३ ई. सिद्ध है। भाषा की दृष्टि से विष्णुदास का काव्य अत्यन्त महत्वपूर्ण है। बुन्देली कवियों ने जन भाषा में कथा काव्य शैली में दोहा, सोरठा, चौपाई और छन्दों का प्रयोग अधिक किया जो कालांतर में भक्ति काव्य की आधारभूमि का कार्य करते हैं।
रीति / भक्ति काव्य काल १६वीं शती विक्रमी से १७वीं विक्रमी तक
समाज में व्याप्त जड़ता उदासी और अकर्मण्यता के स्थान पर भक्ति की ओर प्रवृत्ति मिलती है। बुन्देलखण्ड में भक्ति की उस पावन धार के दर्शन नहीं होते जो बृज प्रदेश में प्रवाहित हुए। यहां सभी प्रकार की उपासनाओं का जोर रहा। गोस्वामी तुलसीदास भी इसी भू-भाग से जुड़े हुये थे। प्रसिद्ध कवि रहीम भी बुन्देलखण्ड की संस्कृति के प्रति श्रद्धावान थेा जो उनकी उक्ति
चित्रकूट में रम रहे रहिमन अवध नरेश। जा पर विपदा पड़त है सो आवत इहि देश।।
महाकवि बलभद्र मिश्र अत्यन्त प्रतिभाशाली कवि हैं। इनके प्रमुख ग्रन्थों में सिखनख, भाषा-भाष्य, बलभद्री व्याकरण, हनुमानाष्टक टीका, गोवर्द्धन सतसई अधिक चर्चित है। इनके समय तक ओरछा, पन्ना, छतरपुर, झांसी, टीकमगढ़, दतिया और सागर केन्द्र के रूप में उभरकर सामने आने लगे। महाकवि केशव के पूर्व महाराज मधुकर शाह, पंडित हरिराम व्यास आदि कवियों ने बुन्देली काव्यधारा में महत्वपूर्ण योगदान किया है। मधुकर शाह "टिकैत' बुन्देलखण्ड की रक्षा में ही प्रसिद्ध हुए। कवि देशभक्त और धर्म प्रवर के रूप में उनका स्मरण अब तक किया जाता है। पंडित हरिराम व्यास मधुकर शाह को दीक्षा देने वाले गुरु, एक संगीतज्ञ, भक्त और साधक के रूप में विख्यात हुए। उनकी रचनाओं में राग माली, व्यास वाणी, राग पर्यायाची आदि में बुन्देली और तथा रीति सावेत का अद्भुत समन्वय मिलता है।
केशवदास (सम्वत १६१२) इस काल के अन्यतम् कवि हैं। इनकी समस्त कवियों का आधार संस्कृत के ग्रंथ हैं पर कवि प्रिया, रसिक प्रिया, रामचन्द्रिका, वीरसिंहदेव चरित्र, विज्ञान गीता, रतन वादनी और जहाँगीर रसचन्द्रिका में कवि की व्यापक काव्य भाषा प्रयोगशीलता एवं बुन्देल भूमि की संस्कृति रीति रिवाज भाषागत प्रयोगों से केशव बुन्देली के ही प्रमुख कवि हैं। रीति और भक्ति का समन्वित रूप केशव काव्य में आद्योपान्त है। रीतिवादी कवि ने कविप्रिया, रसिकप्रिया में रीति तत्व तथा विज्ञान गीता एवं रामचन्द्रिका में भक्ति तत्व को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप में प्रस्तुत किया है। आचार्य कवि केशवदास ने बुन्देली गारी (लोकगीत) को प्रमुखता से अपने काव्य में स्थान दिया और सवैया में इसी गारी'गीता को परिष्कृत रूप में रखा है। रामचन्द्रिका के सारे सम्वाद सवैयों में है ऐसी सम्बाद योजना दुर्लभ है। रामलीलाओं में केशव के संवादों का प्रयोग शताब्दियों से हो रहा है।
प्रवीण राय महाराज इन्द्रजीत सिंह के दरबार में थी। महाराज इन्द्रजीत स्वयं "धीरज नरेन्द्र" उपनाम से कविता करते थे। पं॰ गौरीशंकर द्विवेदी ने इनका समय सं. १६२० विक्रमी माना है। इन्हीं के समय में कल्याण मिश्र (विक्रमी सं.) १६३५ कवित्त लेखन में श्रेष्ठ माने गये हैं। ऐसे ही नाम बालकृष्ण मिश्र तथा गदाधर भ के माने गये हैं। बुन्देली के अनेक मुहावरों का प्रयोग बिहारी सतसई में मिलता है। बलभद्र मिश्र के पौत्र श्री शिवलाल मिश्र (सं. १६६०) ने ठेठ बुन्देली के क्रिया पदों का प्रयोग किया है। इसी प्रकार स्वामी अग्रदास की कुण्डलियों में शत-प्रतिशत बुन्देली लोकोक्तियों को आधार बनाकर लोक संदेश दिया है। इसी काव्यधारा में सुन्दर दास का "सुन्दर श्रृंगार' परगणित किया जाता है। रीतिभक्ति काव्य में खेमदास रसिक सुवंश कायस्थ, पोहनदास मिश्र तथा ओरछा के अनेक कवियों का योगदान है। भक्ति काव्य बुन्देलखण्ड में पूरी समग्रता के साथ में आया। यहाँ के राजाओं ने उसे प्रोत्साहन दिया। अनेक रचनाएं आश्रयदाता की इच्छा के अनुसार मिलती है। रीति भक्ति काव्यकाल में प्रस्तुत की गयी प्रतियों में बुन्देली संस्कृति, भाषा और रीति तत्व की अभिव्यक्ति विशेष है। इसी काल के उपरान्त बुन्देली की रचनाओं में ठेठ स्थानीयता का प्रभाव दिखने लगता है।
सांस्कृतिक उन्मेष काल १७वीं विक्रमी से १८वीं विक्रमी
बुन्देलखण्ड में चम्पतराय के बाद छत्रसाल ने स्वातन्त्रता की मशाल जलाई। औरंगजेब ने छत्रसाल को जितना दबाया उतना ही वे अधिक उभरते गए। स्वतन्त्र सत्ता स्थापित करने में छत्रसाल ने मुगल अधिकार के सभी शहरों, राज्यों को लूटा। अपनी धाक जमाते हुए एकछत्र राज्य बनाने के उपक्रम में छत्रसाल ने विकट संघर्ष किया। लालकृत 'छत्रप्रकाश' इसी प्रकार के बुन्देलखण्ड राजा का काव्य इतिहास है। लाल कवि और "भूषण' दोनों का लक्ष्य एक ही है। पूरी शताब्दी में सांस्कृतिक क्षेत्रों में जागरुकता का परिचय मिलता है। रीतिभक्ति की मिश्रित काव्य धारा प्रच्छन्न रूप में प्रवाहित होती रही पर छत्रसाल, अक्षय अनन्य, गोरे "लाल लाल' बख्शी हंसराज, हरिसेवक मिश्र आदि कवियों की रचनाओं का समाज पर अनुकल प्रभाव पड़ा। एक दृष्टि से समाज का चतुर्दिक विकास इस काल में हुआ है। लाल और छत्रसाल जहां हिन्दुत्व और स्वाधीन बुन्देलखण्ड का समर्थन करते हैं तथा पृथक अस्तित्व बनाते हैं। अक्षर अनन्य भक्ति और उपासना के क्षेत्र में निर्गुण काव्य-धारा का समर्थन कबीर की भाँति करते हैं। प्रेममार्गी काव्यधारा में हरिसेवक मिश्र तथा सगुण कृष्ण भक्ति काव्य में बख्शी हंसराज के द्वारा मधुराभक्ति का प्रतिपादन हुआ। राम काव्यधारा में केशव के उपरान्त अनेक कवियों ने काव्य रचना की, पर केशव की तुलना में वे कम ही प्रभाव डाल सकें। इस प्रकार बुन्देलखण्ड के कबीर (अक्षर अनन्य) सूर (बख्शी हंसराज), जायसी (हरिसेवक मिश्र), राष्ट्रीय कवि "लाल' आदि ने चतुर्दिक उन्मेष का संदेश दिया।
कवियों का प्रदेय इस प्रकार है कि बख्तबली महाचार्य ने चम्पतराय के युद्धों का वर्णन किया तो उनके पुत्र भानुभ (१७०१ वि.) ने भी छत्रसाल के युद्धों का वर्णन और राष्ट्रीयता की भावना का प्रसार किया। इन्हीं के दूसरे पुत्र गुलाब भी इसी धारा के कवि थे। "लाल' का प्रदेय इस काल में इसलिए अधिक है कि उन्होंने छत्रसाल को नायक बनाकर उकने समस्त घटनाओं का यथार्थ चित्रण किया है लाल की पंक्तियों को तत्कालीन राजाओं ने धर्मवाक्य के रूप में लिया है। छत्रप्रकाश में युद्धों का धारावाहिक चित्रण करने वाले लाल ने लिखा-
धनि चम्पत के औतरो पंचम श्री छत्रसाल। जिनकी आज्ञा शीषधरि करि कहानी लाल।।
छत्रसाल स्वयं एक कवि भी रहे हैं। युद्ध कला और काव्यकला का अद्भुत मेल उनमें मिलता है। बुन्देलखण्ड के चरित-नायक बनकर वे महान कार्य में लगे रहे। इनके बाद सं. १७१२ वि. में देवीदास, अक्षर अनन्य (१७०० वि.) के नाम महत्वपूर्ण है। अक्षर अनन्य ने व्यापक काव्यभाषा को अपनाया पर बुन्देली रीतिरिवाज, संस्कृति, उक्तियों और मुहावरों को अपनाकर भक्ति, ज्ञान और वैराग्य की त्रिवेणी प्रवाहित की। उन्होंने कबीर की भाँति मानवधर्म का प्रतिपादन किया और समाज की बुराइयों को दूर करने में योगदान दिया। इसी प्रकार हरिसेवक मिश्र सं. १७२० ने प्रेममार्गी काव्यधारा में "कामरुप कथा' के माधक से एकनिष्ठ प्रेम का संदेश दिया। देशी रियासतों में महाराज उदोतसिंह के आश्रय में कोविदमिश्र ने भाषा में हितोपदेश, रामभूषण मुहूर्त दपंण, नायिका भेद आदि ग्रंथ लिखे। सागर के सुवेश कायस्थ ने हितोपदेश और मित्रमिलाप लिखे। बुन्देली मुहावरों और कविताओं का उत्तम प्रयोग कवि ने अपने ग्रन्थों में किया है। इस समय के शासकों में महाराज उदीतसिंह स्वयं एक कवि रहे हैं।
काल्पी के श्रीपति दतिया के जागीरदार, पृथ्वीसिंह रसनिधि, दतिया के रोहुँड़ा ग्राम के हरिकेश आदि कवियों ने अपने काव्य से जनसमाज को अमूल्य कृतियाँ दी। हरिकेश की ""जगतसिंह दिग्विजय बुन्देलखण्ड के इतिहास की महत्वपूर्ण कृति है।
बख्शी हंसराज की तीन रचनाओं-मेहराज चरिॠ सनेहसागर और विरह'विलास में अंतिम दो ऐसी रचनाएँ हैं जिनमें सूर के समान वात्सल्य, विरहवर्णन, मधुराभक्ति और बुन्देली संस्कृति का दर्शन होता है। इसी काल में पद्माकर कवि के पिता मोहनभट्ट, कृष्णकवि सना ओरछा, गोपकवि --रसनिधि के दरबारी कवि-- रुपनारायण मिश्र, खण्डन कायस्थ दतिया, कवीन्द्र ज्ञानी जू, गुमानमिश्र --कविताकाल,-- बोधा कवि का कृतित्व बुन्देली काव्य के इतिहास में अमूल्य मणि टाकता है।
सांस्कृतिक उन्मेष काव्यकाल बुन्देलखण्ड की चतुर्दिक प्रतिभाओं से परिचय ही नहीं करता बल्कि बुन्देलखण्ड के विकास में योग देता है। इसके उपरान्त बुन्देलखण्ड में श्रृंगार काव्य काल आता है।
श्रृंगार काव्य काल १८वीं विक्रमी से १९५० वि. तक
भक्तिकाल की समृद्धि बृजभूमि मानी जाती है तो रीति या श्रृंगार काव्य का पूर्ण उन्मेष बुन्देलभूमि में ही हुआ है। आचार्य कवि केशवदास रीतिकाल के श्रेष्ठतम कवि माने जाते हैं। उनके बाद श्रृंगार की धारा में पद्माकर—सं. १८१०—खुमानकवि, ठाकुर, दामोदर देव, मंचित, नवलसिंह कायस्थ झाँसी, प्रताप साहि चरखारी, पजनेस पन्ना, गदाधर भट्ट, सरदारकवि ललितपुर, भगवंत कवि पन्ना, ईसुरी, गंगाधरव्यास छतरपुर, ख्यालीराम चरखारी, भगवंत कवि पन्ना, ईसुरी, गंगाधरव्यास छतरपुर, ख्यालीराम चरखारी, आदि कवियों ने बुन्देली की श्रृंगार माधुरी को अनेक प्रकार से संवर्किद्धत किया है।
पद्माकर के आते-आते- बुन्देलखण्ड के वे सौ वर्ष बीत गये जिनसे इस भू-भाग में सांस्कृतिक उन्मेष का प्रवाह आया। छत्रसाल की मृत्यु के बाद समग्र बुन्देलखण्ड छोटी-छोटी इकाइयों में बँट गया। इन सबसे में एक होड़ अवश्य थी पर वह श्रृंगार तक ही सीमित रही। अनेक राजाओं के आश्रय से प्रभावित उनकी समस्त कृतियों में रीतिबद्ध श्रृंगार क्रमशः लोकतत्व से जुड़ता गया। कदाचित् पद्माकर के द्वारा ही श्रृंगार का पिष्टपेषण भी बहुत हो चुका था, अतः वे रचनायें अधिक सुन्दर बन पड़ीं जिनमें लोक जीवन रहा है। इसलिए फाग साहित्य अथवा ॠतुकाव्य अधिक आकर्षक बन पड़े हैं। पद्माकर ने बुन्देली संस्कृति, भाषा और जीवनदर्शन को श्रृंगार रस से समन्वित करके प्रस्तुत किया है। जगत् विनोद, पद्माभरण, प्रबोधपचासा और गंगालहरी कृतियों में उनकी प्रतिभा के दर्शन होते हैं। विरुदावली में वे उतने नहीं जमे जितने लोकतत्व समन्वित काव्य में फाग का एक नमूना पर्याप्त है-
फाग की भौरें अभीरैं लै गहि गोविन्द भीतर गोरी। आई करी मन की पद्माकर ऊपर नाई अबीर की झोरी।। छीन पीताम्बर कम्म्र तैं सु बिदा दई मीड़ कपोलन रोरी। नैन नचाई कहौ मुस्काई, आइयो लला फिर खेलन होरी।।
इसी प्रकार गंगालहरी में "सुधर सो हो तो माँग लेतो और दूजो कहूँ/जातो बन खेती करि, खातो एक हर की' में बुन्देली की अद्भुत छटा है। पद्माकर का अभिधामूलक चित्रण कभी-कभी इतना सतही हो गया है कि वह अश्लीलता के स्तर पर पहुँच जाता है। फाग से पद्माकर ने भी एकाध स्थान पर ऐसा अभिधात्मक प्रयोग कर दिया है। पद्माकर के बाद श्रृंगार काल के कवियों में काव्यादेश देने की क्षमता नहीं रही थी। रूप साहि, दामोदर देव, मंचित ने अलंकार और नायिका भेद को महत्व दिया है तो नवलसिंह कायस्थ के कृतित्व ""रास पंचाध्यायी, आल्हा रामायण, रामचन्द्र विलास, रुपक रामायण में कवि और चित्रकार दोनों का समन्वय हुआ है। प्रताप साहि चरखारी, रतनेस वंदीजन के पुत्र माने जाते हैं। नायक-नायिकाओं और व्यंग्य चित्रण में ये पद्माकर के समान प्रतिभाशाली हैं। इनके विम्ब चित्रण के आधार पर इन्हें दूसरा पद्माकर भी कहा जाता है। नरेस, ओरछा नरेश तेजसिंह और सुजानसिंह के आश्रय में रहे हैं। इन्होंने झाँसी की रानी को पूरे इतिहास के साथ चित्रित करने की चेष्टा की है। पजनेरा का कृतित्व एवं व्यक्तित्व उनका "पजनेस प्रकाश' है। ये पूर्णतः बुन्देली के कवि हैं पर ब्रज और फारसी के शब्दों का प्रयोग यथास्थान करते हैं।
पद्माकर के प्रपौत्र गदाधर भट्ट, सरदार कवि, भगवंत कवि, बुन्देलखण्ड के ऐसे कवि हैं जिन्होंने छिटपुट रचनाओं में ही अपनी प्रतिभा दिखाई है।
श्रृंगार काव्य काल के प्रदेय के संबंध में यह कहना अभीष्ट होगा कि मुगलकाल के शासकों के विरोध में छोटे-छोटे देशी राज्य उठ खड़े हुए। रीतिकालीन कवि ने इनके आश्रित रहकर एक शताब्दी तक जीविका कमाई और बहूमूल्य कृतियाँ दी। सांस्कृतिक उन्मेष का सारा कार्य छत्रसाल के मंच से हटते ही प्राय- समाप्त हो गया। श्रृंगार काव्य की चरम सीमा धोर श्रंगार'या यों कहें कि अभिधात्मक काव्य में हुई। कुछ कवियों ने अलबत्ता लक्षण ग्रन्थों का निर्माण किया। पद्माकर, प्रतापसिंह, नवलसिंह, कायस्थ आदि के काव्य में स्वस्थ श्रृंगार सामने आया। समस्त काल का प्रमुख रस श्रृंगार ही रहा पर वीर और शान्त रस को भी अभिव्यक्ति मिली। देश की राजनैतिक स्थिति और अर्थव्यवस्था ने बुन्देलखण्ड के लोगों को भाग्यवादी सामन्ताश्रित अधिक बनाया। भाषा की दृष्टि से निश्चित ही अच्छे प्रयोग हुए। बुन्देली अध्येताओं के लिए अठारहवीं-उन्नीसवीं विक्रमी विशेष महत्व की है क्योंकि इस समय के कवियों का स्थानीय भाषा में ही अपनी अभिव्यक्ति प्रस्तुत करनी पड़ी है।
आधुनिक काल (वि॰सं॰ १९५० से २००० वि. तक)
श्रृंगार काव्य की प्रवृत्तियाँ प्रारंभिक दशकों तक ही सीमित रही है। इसी समय सन् १८५७ की गदर की भूमिका बनी स्वतंत्रता के लिए उत्तरभारत और बुन्देलखंड के वीरों ने अनेक बलिदान दिए। ये बलिदान व्यक्तिगत भूमिका पर होते-होते राष्ट्रीय महत्व के हो गए। झांसी की रानी, नाना साहब, तात्या टोपे, नवाब बांदा आदि ने एक झंडे तले खड़े होकर क्रांति का बाना पहना। उनके अनुयायियों में बख्तबली, मर्दनसिंह जैसे क्रांतिवीरों के नाम लिये जाते हैं। अंग्रेजी शासन धीमे-धीमे स्थापित होता गया और नए प्रांत बने। बुंदेलखण्ड उत्तरप्रदेश और मध्यप्रांत में विभाजित हो गया। संवत् १९०० से १९५ विक्रमी की कृतियों का पूरा लेखा-जोखा तक नहीं मिल पाया क्योंकि क्रांति दबाने के प्रयास में ये कृतियां काल के गर्त में दब गई। कुछ का पता चला जो अब शनै:-शनै: सामने आ रही है।
आधुनिक काल में चार प्रकार के कवि मिलते हैं। प्रथम वर्ग में कवि आते हैं जिन्होंने अतीत के चरित्रों को आधार बनाकर तथा संस्कृति, धर्म, देशभक्तिपरक रचनायें की। द्वितीय वर्ग के कवियों ने आधुनिक चेतना एवं स्वातंत्रयोन्मुख विचारधारा को ठेठ बुन्देली में प्रस्तुत किया। तृतीय वर्ग के कवियों ने स्फुट छंदों में काव्य रचनायें प्रस्तुत की। समस्यापूर्ति इन्हें श्रृंगारकाल से विरासत में मिली। चतुर्थ वर्ग में लोककाव्य शैली अपनाने वाले कवियों ने ग्रामीण जीवन को प्रस्तुत किया।
प्रथम वर्ग के कवियों ने ब्रज और बुन्देली के साथ खड़ी बोली के शब्दों का प्रयोग किया। इन्होंने भले ही मिश्रित भाषा में काव्य लिखा पर उच्चारण से वे कृतियों को बुन्देली में ही पढ़ते हैं।
दूसरे वर्ग के कवियों ने भाषा, लोक संस्कृति, लोक जीवन, लोक विश्वास आदि सभी में बुन्देलखंड की भाषा को जीवित रखा है। तीसरे वर्ग के कवियों में मूलतः खड़ी बोली और ब्रज का प्रयोग अधिक मिलता है। इनमें बुन्देली के शब्द अनायास आ गये हैं। ये बुन्देली संस्कृति और माटी से दूर नहीं जा पाये हैं। चौथे वर्ग के कवियों की रचनायें लोककाव्य की प्राण हैं। इन कवियों ने अधिकांश में दीवारी, फागें, भजन और श्रृंगारिक गीत अधिक लिखे हैं। समस्त कवियों का संक्षिप्त परिचय उनकी प्रवृतियों के आधार पर इस प्रकार है। मदन मोहन द्विवेदी "मदनेशद' रासो-काव्य परम्परा में ""लक्ष्मीबाई रासो जैसी अमूल्य कृति प्रस्तुत करते हैं जो डॉ॰ भगवानदास माहौर के सानिध्य से प्रकाश में आई। हरनाथ ने व्यापक काव्य भाषा अपनाई, बुन्देली चरित्र देशभक्ति, नीति, श्रृंगार आदि को काव्य का विषय बनाया। डॉक्टर भवानी प्रसाद ने बुन्देली कहावतों, मुहावरों को काव्य में विषय बनाकर अपने विचार दिए। ऐनानन्द ने सिद्धांत सार नामक ग्रन्थ लिखा। सुखराम चौबे गुणाकर, गौरीशंकर शर्मा, गौरीशंकर सुधा जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी, पं॰ जानकी प्रसाद द्विवेदी, शिवसहाय चतुर्वेदी, रामचंद्र भार्गव, घासीराम व्यास आदि अनेक कवियों की कृतियों में बुंदेलखंड की सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक स्थितियों का परिचय मिलता है।
लोक संस्कृति के चित्रकारों में श्रृंगार काव्य काल के अवसान पर ईसुरी, ख्यालीराम और गंगाधर के नाम सामने आये जिन्होंने फाग साहित्य को अत्यधिक समृद्ध बना दिया। उनके बाद रामचरण हयारण मित्र, हरिप्रसाद "हरि', गौरी शंकर द्विवेदी "शंकर', द्वारिकेश, संत बृजेश सुधाकर शुक्ल शास्री, पं॰ ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी, शंभुदयाल श्रीवास्तव "बृजेश', भैयालाल व्यास, लक्ष्मीनारायण पथिक, चतुर्भुज दीक्षित, रघुनाथ प्रसाद गुरु, रामदयाल श्रीवास्तव आदि अनेक कवियों ने नए विषय, नीति ओर संस्कारों के साथ'साथ बुन्देली माटी और देश का गान किया। ये कवि देश की स्वतंत्रता धारा से पूर्णतः सिक्त एवं अनुप्रमाणित हैं। बुन्देलखंड के प्रदेशों में बंट जाने के बाद बुन्देली संस्कृति, जनजीवन और काव्य धारा में पर्याप्त विलम्ब से योगदान हुआ।
अत्याधुनिक काल (सं. २००० वि. से अब तक)
विक्रम की २० वीं शताब्दी में बुंदेलखंड में बुन्देली और अन्य प्रदेशों में स्थानीय बोलियों के साहित्य की विपुल राशि दृष्टिगत होती है। सागर वि.वि. बुन्देलीपीठ से डॉ॰ बलभद्र तिवारी ने बुन्देली काव्य परम्परा के तीन ग्रंथ प्रकाशित किए जो प्राचीन और नवीन काव्य धारा में श्रृंखला का कार्य करते हैं। आधुनिक काव्य-धारा का परिचय बुन्देली काव्य परम्परा भाग २ --आधुनिक काव्य-- में मिलता है। बुन्देली के उन कवियों को इस कृति में स्थान दिया गया है जो सन् १९०० के बाद बुन्देली जनजीवन को ही चित्रित नहीं करते बल्कि राष्ट्रीय एवं सामाजिक परिवेश के प्रति जागरुक हैं। हिंदी साहित्य में द्विवेदी युग की अवसान बेला में पं॰ रामनरेश त्रिपाठी और विदेशी भाषाविदों ने प्रदेशिक भाषा, संस्कृति और साहित्य पर विशेष ध्यान दिया है।
छायावाद युग के साथ राष्ट्र प्रेम की कविताओं का विशेष उफान आता है। बुन्देलखण्ड के मुन्शी रामाधीन खरे, नरोत्तम दास पाण्डे "मधु' इस भावधारा की रचनायें प्रस्तुत करते हैं। सन् १९२० में जलियांवाला बाग का काण्ड घटित हुआ। अंग्रेज सरकार की नीति के विरोध में घासीराम व्यास, रामनाथ त्रिवेदी, रामनाथ, राव ठाकुरदास, नाथूराम चतुरेश परासर, नन्दराम शर्मा आदि कवियों ने अनेक कविताएँ लिखी है। एक अन्य धारा में गौरीशंकर शर्मा, जानकी प्रसाद द्विवेदी, सुखराम चौबे गुणाकर, रामचन्द्र भार्गव, शिवसहाय चतुर्वेदी, लोकनाथ सिलाकारी, सुधाकर शुक्ल शास्री, ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी जैसे कवि आते हैं जो समाज और संस्कृति के विभिन्न पक्षों पर विचार तो करते ही हैं साथ ही राष्ट्रीय उद्बोधन के गीत भी गाते हैं। अतीत के भारत को वैज्ञानिक दृष्टि से संपन्न करने की चेष्टा में वे खड़ी बोली और बुन्देली दोनों में रचनाएँ प्रस्तुत करते हैं।
इसी समय का लोक साहित्य फाग से अनुप्राणित होकर सामने आता है। इंसुरी, ख्यालीराम, गंगाधर व्यास के सिवा अनेक स्फुट छंद लिखने वाले कवियों ने समसामयिक आंदोलन को अपनी कविताओं में प्रोत्साहित किया है।
एक अन्य वर्ग व्यापक काव्य भाषा अपनाकर भी बुंदेली के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाता है। इसमें डॉ॰ लक्ष्मी प्रसाद "रमा', गौरीशंकर द्विवेदी "शंकर', हरगोविंद गुप्ता, बालमुकुन्द कन्हैया, रामलाल बरानिया "द्विजदीन', गौरीशंकर पंडा, सैय्यद मीर अमीर अली "मीर', नाथूराम प्रेमी एवं उनके सहयोगी के नाम विशेष है। सारतः बुन्देली काव्य के आधुनिक काल में चार प्रकार के कवि मिलते हैं।
१. अतीत के चरित्रों को आधार बनाकर रचनायें लिखने वाले संस्कृति-धर्मी और देशभक्त कवि। २. आधुनिक चेतना के बुन्देली में लिखने वाले कवि। ३. छिटपुट विषयों पर अल्प कृतित्व वाले कवि। ४. लोक काव्य शैली के रचयिता कवि।
समस्त कवियों में आधुनिक काल के पूर्वार्द्ध में जानकी प्रसाद द्विवेदी, शिवसहाय चतुर्वेदी, रामचंद्र भार्गव, हरिप्रसाद हरि, लोकनाथ द्विवेदी सिलाकारी, सन्त ब्रजेश, रामचरण हयारण मित्र, सुधाकर शुक्ल शास्री और ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी प्रमुख है। इनकी रचनायें समस्यापूर्ति शैली से प्रारंभ होकर आधुनिक युग की समस्याओं तक केन्द्रित हैं। ये बुन्देलखंड के जन-जीवन का खड़ी बोली और बुन्देली दोनों में चित्रण करते हैं। विशुद्ध बुन्देली में काव्य रचना करने वालों में सन्तोषसिंह, अवधेश, बाबूलाल खरे, माधव शुक्ल, दुर्गेश, गुणसागर, लक्ष्मी प्रसाद गुप्त, नीरज जैन आदि हैं। इनके काव्य में ग्राम्य जीवन, प्राकृतिक सुषमा और देहात की समस्याओं के चित्र आते हैं।
बुंदेली के नये काव्य का प्रतिनिधित्व भैयालाल व्यास "विन्ध्य कोकिल', चतुर्भुज चतुरेश, शर्मनलाल जैन "पथिक', रतिभानु तिवारी तेज 'कंज', भगवान सिंह गौड़, शंभुदयाल श्रीवास्तव "ब्रजेश', रामकृष्ण पांडे, गोरेलाल साहू, महेश कुमार मिश्र "मधुकर', जीजा बुन्देलखंडी, कैलाश मड़वैया, प्रकाश मड़वैया, प्रकाश सक्सेना, लोकेंद्र सिंह "नागर' संतोष सिंह बुन्देला, अयोध्या प्रसाद चौबे, द्वारिका प्रसाद अग्रवाल, केदारनाथ अग्रवाल आदि करते हैं। इन कवियों में समकालीन समाज, संस्कृति और राजनीति के प्रति जागरुकता है। ये जमीन से जुड़े हुए कवि हैं। समकालीन जीवन बोध से संपृक्त जीवन दृष्टि के कारण बुन्देली काव्य में आज नये प्रयोग भी हो रहे हैं।
कुल मिला कर बुन्देली काव्य की एक निश्चित परम्परा है जो पिछले सात सौ वर्षों तक फैली हुई है। हिन्दी की समर्थ बोली का साहित्य इसमें मिलता है। अतः यह कहने में हमें कोई संकोच नहीं कि इसे भाषा का गौरव दिया जा सकता है।
बाल्मीकि तुलसी केशव ने कविता रच दी प्यारी।। इतै फूल रही आदि काल से काव्य कला की क्यारी।। राष्ट्रकवि को सुघर लेखनी भाषै रूप निखारै। वीर भूमि बुन्देलखण्ड खों सगरो देश निहारे।। चन्द्रसखी भूषण, पद्माकर भाषा के उजियारे।। लोक रागिनी प्रान ईसुरी बुन्देली के तारे।। राय प्रवीन वीन कविता की प्यारे बोल उचारे।। -रतिभान सिंह "कंज'
प्रेम व्यास, रसिकेन्द्र, गुणाकर, लाल विनीत मीर से कविवर। काव्य कला कमनीय दिवाकर अमर कर गये नाम।। प्रांत यह है गुणियों का धाम, कोविद कृष्णदास, कविकारे, दिग्गज रतनलाल परम नारे। अम्बुज, काली, नन्द कुमार, नवल सिंह, पजनेश हुए थे मंचित, द्विज, अवधेश।
३. बुन्देलखण्ड में कवि इसलिए अधिक होते हैं कि यहां का प्रकृति सौन्दर्य अद्वितीय है। -कृष्ण कान्त मालवीय
वामदेव, सनकादि आदि महाॠषियों की तप स्थली है, यहीं महाकवि वाल्मीकि, तुलसी की कलम चली है।। ज्ञानी, वेदव्यास कृष्ण द्वेैपायन कवि कुल केशव, यहीं बिहारी, पदमाकर, भूषण का बीता वैभव। जगनिक की वाणी में आल्हा ऊदल का शौर्य समर जागा, भौभूति कलाधर, वेदव्यास संस्कृत का काव्य भ्रमण जागा।
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बुंदेलखंड की भौगोलिक, सांस्कृतिक और भाषिक इकाइयों में अद्भुत समानता है । भूगोलवेत्ताओं का मत है कि बुंदेलखंड की सीमाएँ स्पष्ट हैं, और भौतिक तथा सांस्कृतिक रुप में निश्चित हैं। वह भारत का एक ऐसा भौगोलिक क्षेत्र है, जिसमें न केवल संरचनात्मक एकता, भौम्याकार की समानता और जलवायु की समता है, वरन् उसके इतिहास, अर्थव्यवस्था और सामाजिकता का आधार भी एक ही है। वास्तव में समस्त बुंदेलखंड में सच्ची सामाजिक, आर्थिक और भावनात्मक एकता है ।
बुंदेलखंड के उत्तर में यमुना नदी है और इस सीमारेखा को भूगोलविदों, इतिहासकारों, भाषाविदों आदि सभी ने स्वीकार किया है । पश्चिमी सीमा-चम्बल नदी को भी अधिकांश वीद्वानों ने माना है, परंतु ऊपरी चम्बल इस प्रदेश से बहुत दूर हो जाती है और निचली चम्बल इसके निकट पड़ती है । वस्तुत: मध्य और निचली चम्बल के दक्षिण में स्थित मध्यप्रदेश के मुरैना और भिण्ड जिलों में बुंदेली संस्कृति और भाषा का मानक रुप समाप्त-सा हो जाता है । चम्बल के उस पार इटावा, मैनपुरी, आगरा जिलों के दक्षणी भागों का कोई प्रश्न ही नहीं उठता । भाषा और संस्कृति की दृष्टि से ग्वालियर और शिवपुरी का पूर्वी भाग बुंदेलखंड में आता है और साथ ही उत्तर प्रदेश के जालौन जिले से लगा हुआ भिण्ड का पूर्वी हिस्सा (लहर तहसील का दक्षिणी भाग) भी, जिसे भूगोलविदों ने बुंदेलखंड क्षेत्र में सम्मिलित किया है । अतएव इस प्रदेश की उत्तर-पशचिम सीमा में मुरैना और शिवपुरी के पठार तथा चम्बल-सिंध जलविभाजक, जोकि उच्च साभूमि है, आते हैं । वास्तव में, यह सीमा सिंध के निचले बेसिन तक जाती है और वह स्थायी अवरोधक नहीं है । ऐसा प्रतीत होता है कि चम्बल और कुमारी नदियों के खारों और बीहड़ों तथा दुर्गम भागों के कारण एवं मुरैना और शिवपुरी के घने जगलों के होने से बुंदेली भाषा और संस्कृति का प्रसार उस पार नहीं जा सका । बुंदेलखंड का पश्चिमी सीमा पर ऊपरी बेतवा और ऊपरी सिंध नदियाँ तथा सीहोर से उत्तर में गुना और शिवपुरी तक फैला मध्यभारत का पठार है । मध्यभारत के पठार के समानांतर विध्यश्रेणियाँ भोपाल से लेकर गुना तथा शिवपुरी के कुछ भाग तक फैली हुई हैं और अवरोधक का कार्य करती हैं ।-२१ इस प्रकार पश्चिम में रायसेन जिले की रायसेन और गौहरगंज तहसीलों के पूर्वी भाग, विदिशा जिले की विदिशा, बासौदा और सिरोंज तहसीलों के पूर्वी भाग; जिनकी सीमा बेतवा बनाती है; गुना जिले की अशोकनगर (पिछोर) और मुंगावली तथा शिवपुरी की पिछोर और करैरा तहसीलें, जिनकी सीमा अपर सिंध बनाती है, बुंदेलखंड के पश्चिमी सीमावर्ती क्षेत्र हैं । इनमें विदिशा और पद्मावती (पवायाँ) के क्षेत्र इतिहासप्रसिद्ध रहे हैं । विदिशा दशार्णी संस्कृति का प्रमुख केन्द्र रहा है । वैदिश और पद्मावती कै नागों की संस्कृति बुंदेलखंड के एक बड़े भू-भाग में प्रसरित रही है । चंदेलों के समय वे इस जनपद के अंग रहे हैं । सिद्ध है कि इन क्षेत्रों की संस्कृति और भाषा जितनी इस जनपद से मेल खाती है, उतना ही उनका प्राकृतिक परिवेश और वातावरण ।
भौतिक भूगोल में बुंदेलखंड की दक्षिणी सीमा विंध्यपहाड़ी श्रेणियाँ बताई गयी हैं, जो नर्मदा नदी के उत्तर में फैली हुई हैं ।-२२ लेकिन संस्कृति और भाषा की दृष्टि से यह उपयुक्त नहीं है, क्येंकि सागर प्लेटो के दक्षिण-पूर्व से जनपदीय संस्कृति और भाषा का प्रसार विंध्य-श्रेणियों के दक्षिण में हुआ है । इतिहासकारों ने नर्मदा नदी को दक्षिणी सीमा मान लिया है, संभवत: छत्रसाल बुंदेला की राज्य-सीमा को केन्द्र में रखकर; लेकिन जनपदीय संस्कृति और भाषा विंध्य-श्रेणियों और नर्मदा नदी से प्राकृतिक अवरोधक पार कर होशंगाबाद और नरसिंहपुर जिलों तक पहुँच गई है । भूगोलवेत्ता सर थामस होल्डिच के अनुसार सभी प्राकृतिक तत्त्वों में एक निश्चित जलविभाजक रेखा, जो एक विशिष्ट पर्वतश्रेणी द्वारा निर्धारित होती है, अधिक स्थायी और सही होती है ।-२३ अतएव प्रदेश की दक्षिणी सीमा महादेव पर्वतश्रेणी (गोंडवाना हिल्स) और दक्षिण-पूर्व में मैकल पर्वतश्रेणी उचित ठहरती है । इस आधार पर होशंगाबाद जिले की होशंगाबाद और सोहागपुर तहसीलें तथा नरसिंहपुर का पूरा जिला बुंदेलखंड के अंतर्गत आता है । कुछ भाषाविदों ने इन क्षेत्रों के दक्षिण में बैतूल, छिंदवाड़ा, सिवनी, बालाघाट और मंडला जिलों अथवा उनके कुछ भागों को भी सम्मिलित कर लिया है, पर उनकी भाषा शुद्ध बुंदेली नहीं है, और न ही उनकी संस्कृति बुंदेलखंड से मेल खाती है । इतना अवश्य है कि बुंदेली संस्कृति और भाषा का यत्किचिंत प्रभाव उन पर पड़ा है । ऊँचाई पर श्थित होने से कारण वे पृथक् हो गये हैं । महादेव-मैकल पर्वतश्रेणियाँ उन्हें कई स्थलों पर अलग करती हैं और अवरोधक सिद्ध हुई हैं ।
दक्षिणी सीमा के संबंध में एक प्रश्न उठाया जा सकता है कि विंधयश्रेणियों और नर्मदा नदी को पार कर बुंदेली संस्कृति और भाषा यहाँ कैसे आई ? इस समस्या का उत्तरह इतिहास में खोजा जा सकता है । इतिहासकार डॉ. काशी प्रसाद जायसवाल का मत है कि भारशिवों (नवनागों) और वाकगटकों के इस क्षेत्र में बसने से कारण दक्षिण के इस भाग का संबंध बुंदेलखंड से इतना घनिष्ट हो गया था कि दोनों मिलकर एक हो गये थे और उस समय इन दोनों प्रदेशों में जो एकता स्थापित हुई थी, वह आज तक बराबर चली आ रही है । साठ वर्षीं तक नागों के यहाँ रहने के इतिहास के यह परिणाम निकला है कि यहाँ के निवासी भाषा और संस्कृति के विचार से पूरे उत्तरी हो गये हैं ।-२४ गुप्तों के समय वाकाटक भी यहाँ रहे। कुछ विद्वान् झाँसी जिले के बागाट या बाघाट को, जो बिजौर या बीजौर के पास है, वाकाटकों का आदिस्थान सिद्ध करते हैं, जबकि कुछ इतिहासकार पुराणों में कथित किलकिला प्रदेश का समीकरण पन्ना प्रदेश से करते हुए उसे वाकाटकों की आदि भूमि मानते हैं । वाकाटकों के बाद जेजाभुक्ति के चंदेलों और त्रिपुरी के कलचुरियों के राज्यकाल में भी यह क्षेत्र बुंदेलखंड से जुड़ा रहा । इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि बुंदेलखंड की दक्षिणी सीमा महादेव पर्वतश्रेणी की गोंडवाना हिल्स है, जो जबलपुर के पूर्व में मैकल पर्वतश्रेणी से मिल जाती है ।
बुंदेलखंड के पूर्व में मैकल पर्वतश्रेणियाँ, भानरेर श्रेणियाँ, कैमूर श्रेणियाँ और निचली केन नदी है । दक्षिण-पूर्व में मैकल पर्वत है, इस कारण नरसिंहपुर जिले के पूर्व में स्थित जबलपुर जिले के दक्षिण-पश्चिमी समतल भाग अर्थात् पाटन और जबलपुर तहसीलों का दक्षिण-पश्चिमी भाग बुंदेलखंड के अंतर्गत आ गया है । उनकी भाषा और संस्कृति बुंदेली के अधिक निकट है, किंतु दमोह पठार के दक्षिण-पूर्व में स्थित भानरेर रेंज पाटन और जबलपुर तहसीलों के उत्तरी और उत्तरपूर्वी भागों को बुंदेलखंड से विलग कर देती है । भानरेर श्रेणियों के उत्तर-पूर्व में कैमूर श्रेणियाँ स्थित हैं, जिनके पश्चिम में स्थित पन्ना बुंदेलखंड में है और पूर्व में बघेलखंड है । पन्ना जिले की तहसीलों पवई और पन्ना के पूर्व सँकरी पट्टी में बुंदेली भाषा और संस्कृति का प्रसार है । टोंस और सोन नदियों के उद्गम का भूभाग दक्षिण-पश्चिम की उस संस्कृति से अधिक प्रभावित है, -२५ जो कि बुंदेलखंड से मिलती-जुलती है । पन्ना जिले के उत्तर में पन्ना-अजयगढ़ की पहाड़ियों का सिलसिला चित्रकूट तक चला गया है । इसलिए बाँदा जिले का वह भाग जो छतरपुर जिले के उत्तर-पूर्वी कोने और पन्ना जिले के उत्तरी कोने से बिलकुल सटा हुआ है, जो उत्तर में गौरिहार (जिला-छतरपुर) से लेकर चित्रकूट (जिला-बाँदा) तक पहाड़ी क्षेत्र की एक सीमा-रेखा बनाता है और जिसके उत्तर में बाँदा का मैदानी भाग प्रारम्भ हो जाता है, बुंदेलखंड के अंतर्गत आता है । बाँदा जिले का शेष मैदानी भाग उससे बाहर पड़ जाता है । इस तरह बुंदेलखंड की उत्तर-पूर्वी सीमा निचली केन बनाती है ।
भू-संरचना और राजनीति की दृष्टि से बाँदा जिला बुंदेलखंड का एक भाग माना गया है, पर उसके अधिकांश भाग की भाषा बुंदेली नहीं है और उसकी संस्कृति बुंदेली संस्कृति से कुछ बातों में भिन्न है । प्राचीन काल में बाँदा चेदि में सम्मिलित नहीं था, भारशिवों और नवनागों के साम्राज्य से बाहर था और वाकाटकों की संस्कृति यहाँ तक पहुँच नहीं पाई; किंतु उसका कालिंजर से लेकर चित्रकूट तक का भाग बहुत प्राचीन समय से ही इस संस्कृति का अंग रहा है । बाँदा के उत्तर-पूर्व में चिल्ला नामक ग्राम में आल्हा-ऊदल का निवास खोजा गया है ।-२६ विंध्यवासिनी देवी का मंदिर बुंदेलों का तीर्थस्थल रहा है । चंदेलों के समय बाँदा का अधिकांश भाग बुंदेली प्रभाव में रहा और बुंदेलों ने भी टोंस नदी तक अपना शासन फैलाया । संभवत: इसी कारण बाँदा जिले से उत्तर-पश्चिमी भाग में भी बुंदेली भाषा और संस्कृति की पैठ है । इस प्रकार बुंदेलखंड के उत्तर-पूर्व में निचली केन नदी की तटीय पट्टी का क्षेत्र, बाँदा जिले से नरैनी और करबी तहसीलों का क्रमश: दक्षिणी और दक्षिण-पश्चिमी भाग, सम्मिलित है। पूर्व में पन्ना और दमोह जिले तथा दक्षिण-पूर्व में जबलपुर जिले की पाटन और जबलपुर तहसीलों का क्रमश: दक्षिणी और दक्षिण-पश्चिमी भाग, जो मैकल श्रेणियों तक चला गया है, बुंदेलखंड में आता है । इसके अतिरिक्त सोन और टोंस की उद्गम घाटी, जो नर्मदा की तरफ दक्षिण की ओर खुलती है और जिसमें पाटन, जबलपुर, सिहोरा और मुड़वारा तहसीलों की लंबी-सी पट्टी का क्षेत्र है, बुंदेलखंड के अंतर्गत आता है ।
उपर्युक्त आधार पर बुंदेलखंड प्रदेश में निम्नलिखित जिले और उनके भाग आते हैं और उनसे इस प्रदेश की एक भौगोलिक, भाषिक एवं सांस्कृतिक इकाई बनती है ।
(१) उत्तर प्रदेश के जालौन, झाँसी, ललितपुर, हमीरपुर जिले और बाँदा जिले की नरैनी एवं करबी तहसीलों का दक्षिणी और दक्षिण-पश्चिमी भाग ।
(२) मध्यप्रदेश के पन्ना, छतरपुर, टीकमगढ़, दतिया, सागर, दमोह, नरसिंहपुर जिलेतथा जबलपुर जिले की जबलपुर एवं पाटन तहसीलों का दक्षिणी और दक्षिण-पश्चिमी भाग; होशंगाबाद जिले की होशंगाबाद और सोहागपुर तहसीलें; रायसेन जिले की उदयपुर, सिलवानी, गौरतगंज, बेगमगंज, बरेली तहसीलें एवं रायसेन, गौहरगंज तहसीलों का पूर्वी भाग; विदिशा जिले की कुरवई तहसील और विदिशा, बासौदा, सिरोंज तहसीलों के पुर्वी भाग; गुना जिले की अशोकनगर (पिछोर) और मुंगावली तहसीलों; शिवपुरी जिले की पिछोर और करैरा तहसीलें, ग्वालियर की पिछोर, भांडेर तहसीलों और ग्वालियर गिर्द का उत्तर-पूर्वी भाग; किंभड जिले की लहर तहसील का दक्षिणी भाग ।
उपर्युक्त भूभाग कै अतिरिक्त उसके चारों ओर की पेटी मिश्रित भाषा और संस्कृति की है, अतएव उसे किसी इकाई के साथ रखना ही होगा । इस कारण जो जिले (जिनके भूभाग विशुद्ध इकाई में सम्मिलित हैं) अपने को बुंदेलखंड का अंग मानते हैं, उन्हें बुंदेलखंड में सम्मिलित किया जा सकता है । ऐसे जिलों में बाँदा, जबलपुर और गुना तो आते हैं, पर अन्य के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता । मैंने तो हाण विशुद्ध इकाई को ही महत्त्व दिया है ।
 इनमें से  शुद्ध बुन्देली जिले टीकमगढ़, जालौन जिल का अधिकांश भाग, हमीरपुर, ग्वालियर क्षत्र के चन्दरी एवं मुंगावली इलाक, भोपाल व विदिशा जिल का आधा पश्चिमी भाग एवं दतिया की सीमा के भाग है। शेष बुन्देली भाषी जिले छतरपुर, पन्ना, दमोह, नरसिंहपुर, होशंगाबाद, सिवनी, बालाघाट, छिन्दवाड़ा तथा दुर्ग के कुछ भाग है। ऐतिहासिक परम्पराएं, सांस्कृतिक एकता, सामाजिक समानताएं, भौगोलिक सुगमता और विकास की अनुकूलता किसी भी आदर्श राज्य के गुण माने जाते है। बुन्देलखंड राज्य के स्वरूप में य सभी गुण विघमान है। बुन्देलखण्ड का आकार प्रकार स्थापित करने में अनक विद्वानों के जो विभिन्न मत है, उनमें अन्तर बहुत कम है। इन सभी का जो एक सामान्य निष्कर्ष निकलता है उसक अनुसार बुन्देलखंड राज्य के अन्तर्गत 32 जिले आते हैं। व इस प्रकार हैं-
हमीरपुर, झांसी, बांदा, ललितपुर, टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, दमोह, सागर, नरसिंहपुर, भिंड, दतिया, ग्वालियर, शिवपुरी, मुरैना, गुना, विदिशा, सीहोर, भोपाल, रायसन, होशंगाबाद, हरदा, बैतुल, छिंदवाड़ा, सिवनी, मण्डला, बालाघाट, कटनी और जबलपुर।
बुन्देली की व्याकरणगत विशेषताएं
 बुन्देली भाषा का बुनियादी शब्द भंडार और व्याकरण अपने जन समाज की भाषा संबंधी हर आवश्यकता पूरी करने योग्य है। यह भाषा समाज के हर प्रकार के विकास के लिए महान अस्त्र है और उसक ऐतिहासिक विकास की महान सफलता भी है।
बुन्देली ध्वनि में 10 स्वर 27 व्यंजन हैं। देवनागरी के शेष 16 अक्षर इसमें नही हैं। इन दस स्वरों में से उच्चारण हिन्दी साहित्य से भिन्न हैं।बुनियादी 750 शब्दों में से मुश्किल से 50 शब्द दोनों भाषाआं में समान होगं। इतने ही और शब्दों को खींच तान कर समानता ढूंढी जा सकती है। बाकी बुनियादी तौर पर प्रथक हैं
​ क्रि्याओं के विभिन्न काल बनाने के प्रत्ययों में सब एक दूसर से भिन्न  है, और कोई समानता नही है। धातुओं में विकार भी भिन्न प्रकार से होता है।
क्रि्याओं में जुड़ने वाल सब प्रत्ययों का हिन्दी में अभाव है। हिन्दी प्रत्यय संस्कृत से लेती है। जो बुंदेली से बिल्कुल नही मिलते हैं।
बुन्देली संज्ञा शब्दां की भी हिन्दी से भिन्नता है ।यह भिन्नता भाव वाचक और व्यक्ति वाचक नामों में तो बहुत है ही जाति वाचक नाम भी काफी भिन्न प्रकार के हैं। कारक के चिन्हों में से केवल 4 चिन्ह समान हैं शेष 10 भिन्न हैं। कारण सम्बन्धी विकार भी हिन्दी से भिन्न होता है।
बुन्देली सर्वनाम 33 हैं ।10 मूल और 23 रूपंातर क। इनमें केवल 7 एक मूल और 6 रूपांतरों के हिन्दी से समानता रखते हैं ,शेष 26 भिन्न हैं।
विशेषण, क्रियाविशेषण, सम्बन्ध बोधक, समुच्चय बोधक और विस्मयाधि बोधक शब्द अधिकतर हिन्दी से भिन्न है।
भाषा में प्रयत्न लाधव के नियम बुंदेली भाषा हिन्दी से बहुत आग निकल गई है। उसक संज्ञा, सर्वनाम, क्रियाओं आदि सब शब्द अति संक्षिप्त होते हैं। स्वरों का भारी उपयोग होता है। अधिकांश मूल शब्द एक दो अक्षरों के ही रह गए हैं। तीन अक्षरों से अधिक वाल शब्द केवल सात हैं। चार से ज्यादा तो बिरल ही होते है। इसक मुकाबल हिन्दी के शब्द अधिकतर भारी भरकम होते हैं।
संस्कृत उपसंर्गो का बुंदेली में कोई स्थान नही है।
बुन्देली की व्याकरणगत विशेषताएं :
बुंदेली की ज्ञात 750 मूल क्रियायं, जिसकी धातुएं 2550 से अधिक हैं। एक – एक क्रि्रया से बंुदली भाषा के लिंग -पुरूष वाच्य और काल भेद से 288 रूप या शब्द बनते हैं। और य रूप 2550 धातुओं के सात लाख से अधिक होते हैं।
वकाल वाचक रूपोंं या शब्दों के अलावा इन्हीं धातु मात्र से दो हजार से अधिक भाव वाचक संज्ञाएं बनती है। सामान्य भूत और सामान्य वर्तमान काल वाचक शब्दों के 1530 विशेषण होते हैं।
वधातु में ने प्रत्यय जोड़ने से तत्संबंधी विशेष ढंग बताने वाल 600 से अधिक शब्द बनते हैं।
इसी प्रकार एक दो अक्षर वाल प्रत्यय जोड़ने से इनक विभिन्न कर्ता वाचक, कर्म वाचक, करण वाचक, विश्ाष क्रिया विशेषण, विशेष आदत वाल, विशेष स्वभाव वाल ,विशेष काम वाल ,पूर्व कालिक क्रिया, सामान्य सिलसिला, सिलसिल का प्रारम्भ, निश्चितता, अभ्यास तथा विशेष अवसर वाची शब्द नियमित रूप से बनते हैं। य सब शब्द शक्ति प्रकरण के अनुसार 15000 से अधिक होते हैं।
इसी प्रकार यह भाषा संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण,क्रिया विशेषण, सम्बंध वाचक, समुच्यवाचक विस्मयादि बोधक आदि बुंदेली शब्दों से भरपूर हैं। प्रत्यक संज्ञा शब्द से उस सम्बन्धी विशेषण और क्रिया शब्द अलग होते है। इसी प्रकार विशेषण शब्द की भाव वाचक संज्ञायं और क्रिया शब्द होते है जिनकी संख्या लाखों में पंहुचती है।
बुंदेली भाषा जीवंत वैज्ञानिक भाषा है जबकि हिन्दी किसी भी क्षत्र की मातृभाषा नही हैं। यह खड़ी बोली संस्कृत, अंग्रजी की खिचड़ी भाषा हैं ।सच्ची ठोस एकता जनभाषाओं के द्वारा स्वाभाविक रूप से विकसित होती है।
बुंदेली का बुनियादी शब्द भंडार और व्याकरण का सांगोंपांग ढांचा शीघ्र प्रकाश में लाने से बंदली गद्य का विकास हो सकगा। इसस एक जीवन्त क्रियाशीलता का विकास होगा। इसस बुंदेली साहित्य की कमी पूरी हो सकगी।
बुन्देल खंडी और हिन्दी भाषा
बुँदलखण्डी में दस स्वर और सत्ताइस व्यंजन हैं । हिन्दी के 16 अक्षर इसमें नहीं हैं। इसक 10 स्वरों में भी 8 स्वरों का उच्चारण बिल्कुल अलग है। इस मुख्य भेद को दखकर हमें चौंकना ने चाहिय क्योंकि 2500 वर्ष पहल ब्राम्ही भाषा की वर्णमाला में 33 अक्षर हैं जिसमें स्वर केवल 6 ही हैं। 250 ई.पू. अशोक के धर्म ले खों से विदित होता हैकि अ,ई,ए,औ ैक  लिए कोई अक्षर नहीं, ऋ, लृ तो हैं ही नहीं। एक हजार ई.पू. की अवस्था भाषा जो संस्कृति की बहिन है, उसमें 13 स्वर और 34 व्यंजन हैं जो सार के सार हलन्त हैं ही। 1000 ई.पू. की फिनौशियन भाषा में भी केवल 22 अक्षर हैं। इसक और पूर्व की इजिप्शयन भाषा के भाव चित्रों में सिफ‍र् 24 व्यंजन ही है और स्वर दिखते ही नहीं । यूं तो मिश्र की इजिप्शन लिपि तीन खण्डों में चलती है। प्रथम काल पहिल राज्यवश से दसव राज्यवंश 100-1700 ई.पू. तक भावचित्रों में 203 संकत हैं । द्वितीय खण्ड में 14 राज्यवंश से 17वं राज्यवंश तक 1700-525 ई.पू.  में जिस ”हरोटिक” कहते हैं, कुल 24 व्यन्जनों  की वर्णमाला थी। अन्त के काल को ‘कोआप्टिक’ भाषा  525 ई.पू से 638 ईस्वी तक तक आते हुए केवल 7 अक्षर और जुड़ । याने 11 सौ वर्षो में 31 अक्षर वाली भाषा बनी और अंत में लुप्त हो गई। इसी तरह 3 हजार ई.पू. के करीब सुमरी लिपि को अक्कादियों ने अपनी सिमैटिक भाषा के लिए अपना लिया। सुमरी कीलाक्षर लिपि में 41 संकते हैं। जिसमें 36 ध्वनि संकतों से प्राप्त हैं। अक्कादियों के अक्षर से यह मसोपोटमियां और सार पश्चिम एशिया में फैल गई तथा इसी कीलाक्षर लिपि को अनातोली, कनानी, ह्रिवू और हितियों ने अपना लिया। फिर पूर्व की ओर की बाढ़ ने इस एलाम और समस्त ईरान ने अपना लिया। भिन्न-भिन्न भौगोलिक स्थलों ने और दशों ने इस पर भी जरूर असर डाला, परिवर्तन भी किया इसीलिए इसक भावचित्र सिकुड़ और कम होते गए। चित्रात्मक से आरम्भ हुई यह लिपि भावात्मक, ध्वनिआत्मक  तथा अक्षरात्मक स्वरूपों को लांघती हुई वर्णात्मक के स्वरूप में पहुंच गई। असीरी के अक्कदी  में 600 संकत थ।  जिसमें भावचित्र भी भर पड़ थ व सुमर और एलाम पहुँचने पर केवल 120 चिन्हों में रह गई। आखिर 600 ई.पू. में ईरान के अखमानी साम्राज्य ने इन्हीं कीलाक्षरों अर्धवर्णात्मक में जन्म दिया। केवल 41 संकत ही रह गए। यह सब परिव ‍र्‍र्तन 3000 ई. पू. से 600 ई.पू. तक याने 2400 वर्षो में सम्पन्न हुआ। याने कीलाक्षर सुमरी में कुल 41 संकत है जो 36 ध्वनियों से प्राप्त होते हैं । जैस चार संकत राजा, प्रांत, भूमि और अहुर-मज्दा शुद्व भावचित्र हैं । सभी व्यन्जनों में अ स्वर निहित है और जिन व्यंजनों में इ, उ हैं उनक चिन्ह  अलग हैं। इसी तरह सिन्धु-घाटी मोहन-जो-दारो और हरप्पा भाषा में श्री सुधाँषु शंकर राय द्वारा 48 वर्ण अक्षरों को ढूँढा गया है और डा. राव के अनुसार सिंध वर्णमाला में 15 व्यन्जन और सिफ‍र् 5 स्वर ही हैं।

अगर हम आधुनिक प्रथम शताब्दी  के वैद्याकर्णी वरूरूचि की महाप्राकृत पर नजर डालं तो उनकी परिपाटी के शिष्य आचार्य हमेंन्द्र ने अपभ्रंंश में 9 स्वर और 26 व्यंजन बताए हैं। इसलिय यह स्पष्ट है कि बुन्देली ने तो हिन्दी की बहन है और ने तो संस्कृत की पुत्री। इसको स्वयं स्वतन्त्र भाषा होने का श्रय प्राप्त है। हाँ हो सकता है संस्कृत से बुन्देली ने ठीक उसी प्रकार शब्द लिए हों जैस कन्नड़, तुलुगू, मलयालम भाषाओं ने अपने 1 लाख शब्दों के अनुपात में 60 से 70 हजार शब्द उधार लिए हैं और तमिल ने तो लाख में सिफ‍र् 40 हजार ही संस्कृत शब्द पचाए हैं।
 बुन्देली का व्याकरण
हिन्दी भाषा ने अपनी  व्याकरण का सारा कलवर संस्कृत से उधार लिया है। इस प्रकार की बात बुन्देली में नहीं है। बुन्देली का प्रारम्भिक युग में कोई व्याकरण अवश्य रहा होगा। जो या तो अब लुप्त हो गया या छानबीन का मोहताज है। लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि यह कातन्त्र व्याकरण की परम्परा में पली है। साथ ही महश्वर परम्परा याने पाणिनी व्याकरण से बहुत दूर तक अलग है। गम्भीरता से दखन पर महर्षि पाणिनी की व्याकरण शैली लगातार 2468 वर्षो से संस्कृत को अपने पन्ज में जकड़ हुय है, जकड़ं रखगी। जब तक भविष्य युग की मांग के अनुसार टक्कर में दूसरा पाणिनी नहीं  पैदा होता। आज तो भयंकर गति से बढ़ता हुआ आधुनकि ज्ञान हजारों नूतन शब्द तथा नई वाक्य रचना की मांग कर रहा है। नय संदर्भ में नय ज्ञान  को नई व्याकरण परिपाटी भी चाहिय। कैस.. ? कब.. ? यह तो भविष्य के गर्भ में है । पर आभास होने लगा है कि संस्कृत को पाणिनी के स्थान पर नय पाणिनी की आवश्यकता है। पाणिनी की जकड़ में फंसी संस्कृत अब छटपटाने लगी हैं। लेकिन बुन्देली ने पहल से ही इस प्रकार की परिधि में घिरना अस्वीकार कर दिया और बोलचाल की परिपाटी वाली कातन्त्र व्याकरण को सहज अपनाया। इसलिए कि बोलचाल की भाषा सदा गिरती पड़ती सदा गतिमान रहती है तथा  वह सदा-सदा आम जन समुदाय के निकट से निकट ही रहगी, इसी कारण बुन्देली का दामन कातन्त्र की हवा में हिलोंर ले ता है।
कातन्त्र की परम्परा ऐन्द्र व्याकरण से प्रारम्भ होती है जिस कुमार व्याकरण भी कहते हैं। युधिष्ठर मीमांसक ने ” व्याकरण शास्त्र का इतिहास” में आदि व्याकर्णी इन्द्र को आठ हजार ई.पू. माना है। शायद यह तिथि अनिश्चित हो, कालगणना में अतिशयोक्ति हो, लेकिन इसस आदि पुरानापन तो विदित होता ही है। इन्द्र के बाद वायु, भारद्वाज, भागुरी, पोषकर, चारायण और काषकृत्सन हैं। अन्तिम तीन समकालीन हैं। काषकृत्सन का व्याकरण तो 24 हजार श्लोकों में था। लक्ष्य रह पाणिनी की व्याकरण से कहीं बड़ी ,दुर्भाग्य से यह अब अप्राप्त है, फिर भी इसक 141 सूत्र मिलते हैं । इसका सम्पूर्ण धातु पाठ कन्नड़ भाषा में मिला है। जिस बाद में फिर से संस्कृत में उल्था किया गया है। सातवाहन काल के एक ब्राण शर्ववर्मा ने काषक्रत्सन का अत्यन्त प्रारम्भिक रूप सरली करण कर ”कातन्त्र” के नाम से लिखा हैं। यही ”कातन्त्र” बुन्देली भाषा की शिक्षा परिपाटी का स्रोत है। जिसकी उर्धवक्ता जड़ं वदकालीन संस्कृत से कहीं आग पूर्वकाल में बिखरी पड़ी है। प्रश्न फिर भी खड़ा है कि ‘कातन्त्र’ का विस्तार काल कितना है.. ? आचार्य इन्द्र, वायु, भारद्वाज आदिकाल से प्रथम, द्वितीय और तृतीय युग लपट हैं तथा अंत में चतुर्थ काल में पोषकर चारायण और काषकृत्सन है। आदिकालीन आचार्य इन्द्र की परिपाटी आठ सौवर्षोंं से कम प्रतीत नहीं होती हैं क्योंकि आदिकाल कभी भी लम्बा होता है। बुद्धि का विकास जैस-जैस बढ़ता है उसी तरह अन्य सुधार के काल कमोवश छोट होते चल जाते हैं। फिर आश्चर्य वायु और भारद्वाज द्वितीय तथा तृतीय युग लगभग 500 और 400 वर्णां का निश्चित रहा होगा। तब कहीं आचार्य पोषकर, चारायण और काषकृत्सन ने एक ही युग के समकक्ष विराजमान हो अपनी परिपाटी को संजोगा- संवारा होगा। जिसका प्रारम्भ से अन्त तक का काल अवश्य से तीन सौ वर्षो तक चलता रहा होगा। अगर इसी काल को आचार्य पाणिनी के काल 480 ई.पू.‍र् जोड़ दिया जाय तो 2480 ई.पू. होता है। यान बुन्देली अपनी काषकृत्सन परिपाटी की पुरानी जड़ों में सूक्ष्म रूप से निश्चित विद्यमान चली आ रही है। फर्क इतना है कि उन बदलते गुणों में इसका  क्या नाम था ..? पता नहीं। नामांकरण हुआ  भी था या नहीं.. ? इसका कोई ज्ञान नहीं । शायद भविष्य की खोजों में कहीं मिल।
कातन्त्र के परिपक्व होने की उपरोक्त गणना कतिपय विद्वितजन कपलां  कल्पित भी कह सकते हैं। लेकिन पाणिनी की परिपाटी के विषय में स्वयं पाणिनी का वर्णन इस सन्दर्भ में हमारा मार्गदर्शक होगा। उन्होंने लिखा है कि उनक पहिल 65 व्याकरण‍रचार्य  गुजर है। अगर इन समस्त आचार्यो  का काल 30 वर्ष प्रति व्यक्ति रखं तो काल 1950 वर्ष बैठता है ।इसी काल में पाणिनी का काल जोड़ दं तो 2430 ई.पू. होता है। साथ ही पाणिनी ने अपने पहल 10 आचार्यो  की भिन्न-भिन्न परिपाटी का उल्लख किया है। इनक नाम है- शकटायन, शाकल्य, आदिशाली, गाग्र्य, गालव, भारद्वाज, काश्यप, सनक, स्फोटायन और चक्रवर्यण। एक परिपाटी का सुधार दूसरी में पहुँत तो पहुंचते काफी समय व्यतीत होता है । अगर औसतन प्रत्यक का समय 200 वर्ष रखं तो काल दो हजार वर्षो का होता है। और इसमें पाणिनी का समय 480 ई.पू.  का समय निकलता है। उपरोक्त 55 व्याकर्णाचार्यो और दस भिन्न-भिन्न परिपाटियों का काल एक ही चक्र में समान्तर चलते हैं और एक दूसर की बराबरी पर उतर आते हैं और तिथियां भी एक सी दर्शाते हैं।
 बुन्देली का स्वर स्फुर्ण भेद
प्रथम हम स्वरों के उच्चारण को ही पकड़ते है।  बुंदेली में दस स्वरों का उच्चरण हिन्दी के आठ स्वरों बिल्कुल भिन्न है। यह कैस जाना जाव.. ? इसक लिए हमें ध्वनिशास्त्र पर नजर डालनी होगी। ध्वनि में केवल भेद ही नहीं वजन भी होता है। हमार भाषा-शास्त्रियों ने इस बड़ी बारीकी से नापा है। शब्द ध्वनि को 8 परमाणुओं की एक मात्रा कहा है। व्यन्जनों में एक मात्रा 8 परमाणुओं की होती है। डढ़ मात्रा 12 परमाणुआंं की। 2 मात्रा 16 परमाणुआंं  की ,ढाई  मात्रा 20 परमाणुआं की और 3 मात्रा 24 परमाणुओंं की होती है। इस क्रम में बुन्देली का स्वर उच्चारण वैभिन्न समझनं के लिय हम केवल ‘अ’ स्वर को ले ते हैं। और इसक उच्चार्णो के पांचों अलगाव को मात्राओं में दर्शाते हैं।
स्वर नामाकरण मात्रा परमाणु संख्या
1.लघुउत्तर(अ-अनमर्ति)18
2.लघु(अ-क) हस्व112
3.गुरू(अ) दीर्घ2्!!16
4.गुरूतर(अ) अतदीर्घ2!!20
5.गुरूतम प्लुत324
इस तालिका को दखकर हम ठीक-ठीक समझ सकंग कि ध्वनि भेद कैसा होता है। हिन्दी के इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ और औ का उच्चरण 2!! से 3 मात्रा  का होता है जबकि बुंदेली में इनकी ध्वनियां 1 से 2 मात्राओं, याने 8 से 16 परमाणुओं के माध्य से स्फुरिट होता है। इन्हीं मात्राओं  की वहज से बुंदेली काव्य तथा संगीत में कितनी सरसता आती होगी इसका अन्दाजा लगाया नहीं जा सकता । अभी तक बुन्देली जगत ने ईश्वरी सरीख कवियों को इस मापदण्ड पर तौला नहीं है और ने उनकी स्वर ध्वनियों को संगीत लहरी में लखबद्ध किया है।
बुन्देली में ई, ए, इ, ओ, औ, ऐ प्रत्यय हैं जब य प्रत्यय बुन्देली धातु से जुड़ते हैं तो  हिन्दी और बुन्देली का एक समान उच्चारण हो जाता है। जैस बुन्देली चर धातु से चल शब्द और उसमें जब उपरोक्त प्रत्यय जुड़ते हैं तो इनका रूप चलो, चल, चली इत्यादि हिन्दी के समान ही होता है। लेकिन याद रह इनकी बनावट में जमीन आसमान का फर्क है। क्योंकि फर्क ‘अ’ की पूर्व ध्वनि का है। बुँदलखण्डी उच्चारण में ‘अ’ इस ध्वनि की कमी हो जाती है। सबस विचित्र बात यह है कि बुन्देली में संस्कृत जैसी संधि अमान्य है। इसी अक्षर स्वर और व्यंजन एक दूसर के सामन या बाद में स्वच्छन्दता से आत और व्यंजन एक दूसर के सामने या बाद में स्वच्छन्दता से आत और बन रहते हैं। पास-पास रहन से उनक उच्चारण में कोई फर्क पड़ता ही नहीं।
बुन्देली में हिन्दी के अक्षर ऋ  ल  अं अ:  ड, , ढ, ष, य, व, क्ष, त्र ज्ञ नहीं है। और स्वरों में अ आ को छोड़कर इ, ई उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ को संयुक्त अक्षर माना है। इसलिय इनक उच्चारण में बड़ा फर्क पड़ गया है। उदाहरण लीजिय-
‘ई’ स्वतन्त्र स्वर ने होकर अ+ईअी है इसी तरह ‘उ’ पूणाँस्वर नहीं बल्कि अ+उअु अथवा अ+ऐअै, अ+ओअऔ इत्यादि । इसी संदर्भ में उपरोक्त ‘इ’ की लिपि का कुछ इतिहास भी दखं। दक्षिण भारत के मदुरा तथा तिरूनलवली जिल के सित्तनवासल स्थान के गुफा लेखों से  क. व्ही. सुब्रामण्यम अययर ने यह सिद्ध किया कि इनमें ‘इ’ अक्षर के लिए एक दण्ड  और दोनों ओर दो बिन्दुओं का चिन्ह मिलता है। इस ‘इ’ के लिए उत्तर भारत में इस प्रकार का चिन्ह 300 ई.पू. तक के ब्राी लेखकोंं में कहीं भी प्राप्त नहीं होता। लेकिन कालांतर में यही चिन्ह उत्तर और पश्चिम भारत के लेखों में मिलता है। इसलिए यह सहज कहा जा सकता है कि ई.प.ू तीसरी शताब्दी में‘ ई’ का यह चिन्ह दक्षिण से उत्तर पहुँच गया था। और इसका स्वरूप ‘इ’ बना। इसस भी अनुमान किया जाता है कि उत्तर भारत में‘ ई’ का स्वरूप बहुत बाद में जुड़ा। चूँकि बुन्देली इस युग से बहुत पहल प्रचलित थी तो इस ‘इ’ की ध्वनि जैस वैदिक काल के पूर्व थी उसी तरह इसका उच्चारण कायम रखा और अ+ई​िअ की तरह युक्ताक्षर माना तथा स्वतन्त्र स्वर मानने से इंकार कर दिया।
यहां  पर थोड़ी चर्चा वैज्ञानिक ढंग स, बुन्देली किस काल में बनती रही यह भी मालूम करना जरूरी है। अस्तु आधुनिक विद्वानों ने वैदिक भाषा के काल को पांच सौ ई.पू.मध्यकाल 500-1000 सन् तथा वर्तमान काल 1000 सन् से आज तक माना है। यह गणना ढर से पाश्चात्य पण्डितों से वदों की रचनाकाल निर्धारित करने की वजह से है। लेेकिन जब ऐतिहासिक दृष्टि से व ासुदशरण अग्रवाल ने पाणिनी का काल 484 ई.पू. कूता है तो वदों का काल 1500 ई.पू. मानना आश्चर्य होगा। वदों की काल रचना 25 सौ से 15 सौ ई.पू. होना निर्धारित हो चुकी तो ‘छन्दस पाली’ प्राकृत तथा अन्य बोलियों की उमर का अंदाजा लेगाना आसान है। पाली प्रकृत की प्रथम अवस्था का नाम है। सम्भव इसी कारण भारत मुनि ने प्राकृत भाषाओं का उल्लख मागधी, अवन्सी, प्राच्य, शैरसनी, अर्ध मागधी, बाल्हकि और दक्षिणात्य मेंकिया। बाद में आचार्य हमेंन्द ने पैशाची और लाटी अधिक जोड़ दी,। लेकिन दखा जाय तो मागधी, अर्धमागधी, शैरसनी और महाराष्ट्रीय के य चार प्राकृतं ही मुख्य हैं। पाली भी पंक्ति पाठ का अपभ्रस शब्द है। पाली के पूर्व वैदिक भाषा को ‘छन्दस’ कहते थ। ‘छन्दस’ ने ही प्राकृतों को जन्म दिया अथवा दोनों समकक्ष चलती रही। फिर भी छन्दस को पाली तक पहुँचने में 15सौ वर्ष लग होंग। तब प्राकृत रूप उभरता है। यह युग 500 ई.पू. से एक हाजर सन मानते हैं। लेकिन पाली का सादि स्वरूप पाली में निहित है।
 उसी तरह पाली छन्दस् से गुत्थी हुई है। अर्थात प्राकृत की परिपाटी भी छन्दस्  के गर्भ‍र् में निहित है। मुख्यत: पाली बुद्ध के वचनों में है और बुद्ध  का काल 624 -544 ई.पू. माना जाता है। पर पाली शब्द का प्रयोग ईस्वीसन की 5वीं शताब्दी में आचार्य बुद्ध घोष ने सर्वप्रथम उपयोग किया है और ई.पू. पाली शब्द का कहीं प्रयोग नहीं मिलता तो क्या 624 ई.पू. 500 सन् याने 11सौ वर्षो तक पाली थी ही नहीं.. ?  या बनती रही ..? अगर इतना लम्बा काल नामकरण के लिय लगता है तो उद्गम कहाँ रखना चाहिय.. ? इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है। आचार्य हरिहर निवास द्विवदी ने तो बौद्ववाँगमय की पाली तथा शैरसनी को वत्रवती की पुत्री कहा है। याने उसक  भौगोलिक क्षत्र को भी निर्धारित कर दिया है। इसलिए प्राकृतों से निकलनवाली या उसक समकक्ष सब बोलियों का उद्गम ‘छन्दस’ से है। याने बुन्देली का प्रारंभिक काल 15सौ ई.पू. मानने में कोई बाधा प्रतीत नहीं होती ।
पूर्व में हमने बुन्देली और हिन्दी उच्चारण भेद को समझा अब हम इनक अक्षर में दोनों को भी दखं  संस्कृत या हिन्दी का आदि स्वर ऋ’ बुन्देली में अ, इ, उ से सीमित रहता है। प्राकृत में भी ‘ऋ’ ध्वनि अ,इ,उ स्वरों से किसी एक में बदल जाती है।
संस्कृत ..पाली… .प्राकृत…….बुन्देली..
ऋक्ष    अच्छ   अच्छ   सध (ई)
हृदय    हदय    हदय    हिरदै (र)
मृग    मग    मग    मिरगा (ई)
पुष्कर   पोक्खर  पोक्खर  पुखरा (उ)
मृत    मिट    मिट    माटी(अ)
अब हिन्दी के अ, आ, इ, ई, उ, ऊ ए, ऐ, ओ, औ स्वरों का उच्चारण बुन्देली में इस प्रकार होगा अ, आ, ​िअ, अी, अु, अू, अ, अै, औ हिन्दी के अं आ: तो संयुक्त अक्षर होने के नाते बुन्देली में शामिल नहींहैं। साथ ही हिन्दी का एअ+ई औअ+ऊ तथा ए की वृद्धि ऎ और ओ की बुद्धि औ है इसलिए प्रारम्भिक रूप से बुन्देली में अ आ दो ही मूल स्वर हैं। इ उ तो दोनों हलन्त है। अत: हम कह सकते हैं कि अ, इ, उ ही बुन्देली के स्वर मात्र हैं। प्रथम ‘अ’ पूर्णस्वर तथा अंत के इ उ हलन्त हैं।
 धातु
किसी भी भाषा का मूलाधार धातुंए हैं। आज के पाश्चात्य विद्वान धातुओं को अमान्य करने लग हैं। कारण कुछ भी हो पर लगता है कि उनकी भाषाऐं इतनी मिश्रित हैं कि मूल का पता पाना असम्भव है।  लेकिन अगर हम अपने धातु जगत को भूल जावं तो समस्त भाषाओं का कलवर ही ढह जावगा।
हम प्रथम संस्कृत को लेते है। पाणिनि के अष्टाध्याई में 1944 संस्कृत की धातुयं गिनाई हैं। भट्टो जी दीक्षित ने उनक ग्रंथ पर टीका टिप्पणी करते हुए  2148 धातुंए लिखी हैं जिनमें दो सौ धातुऐं वैदिक काल में ही लुप्त हो गईं। इसलिए उनक अर्थ और उपयोग नष्ट हो गए । और इसी तरह दो सौ अन्य धातुओं का उपयोग ही समाप्त हो गया। अगर लेखा-जोखा किया जाय तो तो कुल धातुऐं  1748 रह जाती है। आम भ्राँति संस्कृत के बार में यह भी है कि अन्य भारतीय भाषाएं इन्ही धातुओं पर अपना कलेवर बांध हुए हैं। बात ऐसी नहीं,  आचायों ने महाराष्ट्रीय प्राकृत की 639 धातुयं हैं और अपभ्रंश की 850 धातुंए हैं । दोनों मिलाकर 1489 हैं और इनका संस्कृत से बिल्कुल अलगाव है। बुन्देली की भी अपनी धातुएं हैं जो इन्ही से ही ली गई हैं। जहां तक हिन्दी का प्रश्न है  डा.रघुवीर ने अपनहिन्दी शब्द कोष में संस्कृत से हिन्दी के लिए सरल 520 धातुंए लेना समुचित समझा और कहा कि बीस उप-सर्ग और 80 प्रत्यय जोड़ने से लाखों शब्द बनाय जा सकते हैं। लेकिन इतने शब्द अभी पैदा नहीं हुए हैं। बुन्देली की व्याकरण के लेखक श्री नुना जी ने अपनी पुस्तक ”बुन्देली भाषा का बुनियादी शब्द भंडर मे ” लगभग बुनियादी ​क्रिया शब्द 750 की बात कहीं है। बुन्देली में प्रत्यक मूल शब्द को लिंग, वचन, पुरूष, वाच्य और काल भेद से करीब 288 शब्द होते हैं तो सिफ‍र् 750 के 2 लाख 16 हजार शब्द अनायास बने हुए है।
लक्ष्य रह कि संस्कृत उपसर्गो का बुन्देली में कोई उपयोग नहीं क्योंकि बुँदलखंडी इसमें बिल्कुल भिन्न है। जब यह संस्कृत की जोड़ में उतनी दूर है तो हिन्दी की बात ही क्या! क्रियाओं के विभिन्न काल दर्शाने वाल प्रत्यय स्वंय भिन्न हैं। कोई एक दूसर से मिलता नहीं । धातुओं में विकार भी अलग प्रकार से होता है। वैस तो क्रियाओं में जुड़ने वाल सब प्रत्ययों का हिंदी में अभाव है। हिन्दी तो सीध संस्कृत से प्रत्यय उधार लेती है। जिसक बुँदलखण्डी से कोई मलजोल बैठता ही नहीं। बुन्देली में संज्ञा शब्द कितने ही दहाती से प्रतीत क्यों ने हो, पर व स्वयं में सहज हैं और हिन्दी से उनकी विशेष भिन्नता दिखती है। यही भिन्नता भाव-वाचक, व्यक्तिवाचक, जातिवाचक नामों में भी प्रतीत होती है। व्याकरण का मूलाधार अक्षरों के उच्चारण में निहित हैजो अपन-अपने स्थान से भेद भी दर्शाता है। वैदिक ध्वनि समूह में 52 ध्वनियां हैं। स्वर 13 जिनमें मूल 9 और 4 संयुक्त ,फिर 39 स्पर्श व्यंजन हैं।
मानव को ज्ञान कोष की वृद्धि के साथ ध्वनियां भी बढ़ानी पडी़ ताकि शब्द कोष बढ़ । इसलिय संस्कृत के फैलाव में ध्वनियों का विस्तार करना पड़ा लेकिन मूल ध्वनियां कहीं ने कहीं तो थी हीं और व संस्कृत के लिय छन्दस् से प्राप्त हुई और इसी छन्दस् सपंाली ने भी ली परन्तुवह उनका विस्तार नहीं कर पाई। फिर भी वह अपना ज्ञान 10+3344 ध्वनियों से निकाल लेती थीं। क्योंकि इसमें सहज लोच था। इसी प्रकार बुन्देली तो 10+2737 से ही अपना कार्य चला लेती थी। क्योंकि इसमें समयानुकूल शब्दावली प्राप्त थी। याने इन्हीं 37 और 44 स्वर व्यन्जनों का विकास 52 ध्वनियां हैं इसस प्रमाणित होता है कि 37 ध्वनियों वाली बुन्देली बोली या भाषा सबस पुरानी हैं और वह अपना अस्तित्व अभी तक शान से निभाय चली जा रही है। यहाँ यह भी कह देना जरूरी है कि प्रत्यक संस्कृत अक्षर की ध्वनियाँ 2835 प्रकार की हैं और इस महती छलनी से छानकर बुन्देली की ध्वनि प्रकार भी निकालना होगा।
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  • गोस्वामी तुलसीदास
  • आचार्य केशवदास
  • आचार्य पद्माकर
  • राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त
  • वृन्दावनलाल शर्मा
  • सियारामशरण गुप्त
  • डॉ॰ रामकुमार वर्मा
  • श्री अम्बिका प्रसाद दिव्य
  • केदारनाथ अग्रवाल
तुलसीदास 
चित्रकूट जनपद में राजापुर नामक कस्बा यमुना नदी के तट पर स्थित है। तुलसी के प्रतितामह राजपुर आये थे। यहाँ आत्माराम दुबे नामक प्रतिष्ठित सरयूपारीण ब्राह्मण रहते थे। उनकी धर्मपत्नी का नाम हुलसी था। सम्वत् १५५४ विक्रमी की श्रावण सप्तमी के दिन इसी दम्पति की कोख से अभुक्त मूल नक्षत्र में रामबोला --तुलसीदास-- का जन्म हुआ। माता का देहान्त दूसरे दिन हो गया, चुनिया नामक दासी ने साढ़े पाँच वर्ष तक आयु तक उन्हें पाला। भगवान शंकर की प्रेरणा से रामशैल्य पर रहने वाले श्री अनन्तानन्द जी के प्रिय शिष्य श्री नरहर्यानन्द जी ने इस बालक को राम बोला नाम दिया। यज्ञोपवीत संस्कार कर राम मंत्र की दीक्षा दी।
सं. १५८३ वि. जेष्ठ शुक्ल १३ को भरद्वाज गोत्र की सुन्दरी कन्या रत्नावली से उनका विवाह हुआ। पत्नी द्वारा प्रोमाधिक्य धिक्कारे जाने पर गृह त्याग दिया और साधू वेश ग्रहण किया। विभिन्न स्थानों पर भ्रमण करते हुए अयोध्या पहुँचे। चैत्र शुक्ल नौमी --रामजन्त तिथि-- सं. १६३१ वि. में रामचरित मानस की रचना प्रारम्भ की और मार्ग शीर्ष शुक्ल पक्ष में राम विवाह के दिन अर्थात २ वर्ष ७ माह २६ दिन में सातों काण्ड रामचरित मानस के पूर्ण किये। अवधी और ब्रजभाषा में तथा विभिन्न कवित्व शैलियों में उन्होंने दोहावली कवितावली, बरवै रामायण, रामलला नहछू, तथा विनयपत्रिका के पदों की रचना की।
रामचरित मानस ने तत्कालीन हिन्दू जाति के नैराश्य को समाप्त किया। उनमें भक्ति भाव जगाये। शैव और वैष्णव सम्प्रदाय की कटुता को समाप्त कर हिन्दू विचारधारा को उदारमना बनाया। हिन्दुओं को अत्याचार, अनाचार के समाप्ति की किरण दिखाई। गोस्वामी तुलसीदास हिन्दी साहित्य के श्रेष्ठतम कवि और रचनाकार हैं। सं. १६८० वि. श्रावण कृष्ण तृतीया शनिवार को असीघाट --वाराणसी-- पर राम राम कहते हुए अपना भौतिक शरीर परित्याग किया। उनके ग्रन्थों का अनुवाद भारत की समस्त भाषाओं में तथा विश्व के अनेकानेक भाषाओं में सम्पन्न हो चुका है। गोस्वामी तुलसीदास जी की जीवनी और साहित्य पर अनेकानेक शोध-प्रबन्ध देश और विदेश में प्रस्तुत किये गये हैं। तुलसीदास शोध पीठ अयोध्या तथा चित्रकूट में स्थापित हैं। मध्य प्रदेश शासन "तुलसी पुरस्कार समारोह' आयोजित करती है।
गोस्वामी तुलसीदास सत्य, शील, सौन्दर्य के अप्रतिभ कवि हैं। विनय पत्रिका भक्तों के गले का हार है। गीतावली अपनी संगीतात्मकता के साथ माधुरी एवं सरस प्रसंगों के लिए लोकप्रिय है। रामचरित-मानस लोकमानस का अमर काव्य है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भारत में ही नहीं विश्व को अपनी महनीयता से प्रभावित कया है तथा भविष्य में भी मानस समाज को सत्प्रेरणा देते रहेंगे।
१. यह निर्विवाद तथ्य है कि गोस्वामी तुलसीदास भाषा के अप्रतिभ अधिकारी थे। भाषा पर जैसा अधिकार गोस्वामी जी का था वैसा और किसी कवि का नहीं है।
२. "नो पोएट इन द वर्ल्ड हैज़ एवर वीन टु द मासेज़ व्हाट तुलसीदास हैज बीन टु दि पीपुल्स ऑफ दिस लैण्ड।" -एडविन ग्रीब्ज
"गोस्वामी तुलसीदास की कविता तो कविता है ही नहीं, मैं तो उसे सर्वोत्तम महामंत्र मानता हूँ।"
  1. तुलसी गंग दुओ भये सुकविअन के सरदार, इनके काव्यन में मिली भाषा विविध प्रकार।
  2. परशुराम पर पिता हमारे राजापुर सुख भवन सिधारे। प्रथम तीर्थ यात्रा महं आये चित्रकूट लखि अति सुख पाये।
परशुराम सोय सुख पाई तहि मरुत सुख स्वप्न दिखाई। बसहु जाय राजापुर धामा, उत्तर भाग सुभूमि ललामा। -बाबा रघुवर दास रचित तुलसी चरित
"गोस्वामी तुलसीदास का नाम न तो आइन-ए-अकबरी और न समकालीन फारसी इतिहासकारों पर आधारित यूरोपीय लेखकों के ग्रन्थ में मिलेगा, फिर भी वह भारत में अपने समय के सबसे महान पुरुष थे। वह अकबर से भी महान थे क्योंकि इस कवि ने करोड़ों मनुष्यों के हृदय पर अधिकार कर लिया है और यह विजय सम्राट द्वारा युद्ध में प्राप्त किसी भी विजय अथवा उसकी सभी विजयों से कहीं अधिक चिरस्थायी एवं महत्वपूर्ण है।" -वी.ए. स्मिथ
केशवदास
पितामह श्री कृष्ण दत्त मिश्र तथा पिता आचार्य काशी नाथ जी ओरछा दरबार के प्रतिष्ठित विद्वान थे। इसी परिवार में केशवदास जी का जन्म बेतवा नदी के तट पर तुंगारण्य --ओरछा-- में रामनवमी तिथि सं. १६१८ वि. में हुआ। ओरछा नरेश महाराज रामसिंह के राजपंडित पद पर प्रतिष्ठित, सभा चतुर एवं वाकपटु थे। महाराज के छोटे भाई इन्द्रजीत सिंह का उन पर गुरुवत आदर भाव था। राजा बीरबल, टोडरमल, अब्दुर्ररहीम खानखाना स्नेही थे। उनके प्रसिद्ध ग्रन्थ रसिक-प्रिया --सं. १६४८ वि.-- कवि प्रिया --सं. १६५८ वि.-- रस-ज्ञान, अलंकार-समीक्षा के श्रेष्ठतम ग्रन्थ हैं। महाकाव्य रामचन्द्रिका में नाटकीय शैली का समावेश कर प्रतिभा तथा मौलिकता का परिचय दिया। वीरसिंहदेव चरित्र, जहांगीर जसचन्द्रिका, रतनबाउनी में तत्कालीन संस्कृति तथा ऐतिहासिक घटनाओं की झलक प्राप्त है। नखशिख तथा छंदमाला में काव्याचार्य की प्रतिभा प्रतिबिम्बित है। "रामालंकृत मंजरी' पिंगल शास्र का ग्रन्थ है। विज्ञान गीता अध्यात्मक विषयक अनूठा ग्रन्थ है। आचार्य केशवदास मिश्र काव्य रीति की एक विशिष्ट प्रणाली के प्रवर्तक हैं। अलंकार संबन्धी समीक्षा में उनका स्थान अद्वितीय है। उनकी कृतियों में तत्कालीन वृत्तियों का चित्रण प्राप्त है। हिन्दी साहित्य के प्रथम आचार्य का निधन सं. १६७४ वि. में हुआ। रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार उनका जन्म सं. १६१२ वि. है। श्री भगवानदीन के अनुसार जन्म सं. १६१८ वि. है। उनका जीवन युग के अनुरुप रंगीनी रसिकता अनेकपता तथा रोचकता से परिपूर्ण है। उनकी समस्त कृतियों का आधार संस्कृत ग्रन्थ माने जाते हैं। रीति भक्तिकाल में केशव सर्वप्रमुख कवि हैं जिन्होंने बुन्देली साहित्य को ही नहीं हिन्दी के रीतिकाव्य को भी महत्वपूर्ण देन दी है।
१. केशव सब कबियन में मीरा, ज्यों मुतियन में हीरा। मिसरी सी निसरी इमि, बानी बोले मोर पपीरा।। तुगं भूमि तप भूमि ओरछो, बसै बेतवा तीरा।। रामचन्द्रिका सरस बखानी, हरै सकल भव पीरा। -पंडित कपिल देव तैलंग 
२. जगवंदित द्विज कुल तिलक अनुपम प्रतिभावान कविता कानन केसरी केशव सुकवि सुजान
-शंकर द्विवेदी
३. देखी केशव की कवितायी, रसिकन के मन भायी। आखर अरथ अनोखे विवरण, वरनन की फुलवायी।।ं कितऊ सरल जन मन को आवै समझत क कठिनाई। जिनके काव्य कसौटी कस के कवियन मिलत बिदाई।। कविता करता तीन है तुलसी केशव सूर। कविता खेती इन चुनी सीला बिनत मजूर।।
पद्माकर 
मूल नाम प्यारेलाल का जन्म सम्वत् १८१० विक्रमी में सागर नगर में हुआ। इनके पिता श्री मोहनलाल भ सागर के शासक रघुनाथ राव के आश्रित थे। इनका जन्म स्थान बांदा भी माना जाता है। सम्वत् १८३० विक्रमी में नोने अर्जुन सिंह ने इन्हें अपना दीक्षा गुरु बनाया। वे रोसाई हिम्मत बहादुर के दरबार में भी रहे। बनगांव के युद्ध में उनके साथ थे। युद्ध का वर्णन हिम्मत बहादुर विरदावली में है। सम्वत् १८९० वि. में उनका शरीरान्त गंगा तट पर कानपुर में हुआ। उनके काव्य में रूप और यौवन के मनोहारी चित्र अंकित हैं। नायिका के शारीरिक सौन्दर्य के चित्रांकन है। वे रस सिद्ध कवि हैं। उनके कविता में जीवन की सक्रियता एवं यथार्थता है। ईश्वर पचीसी में संसार की असारता का चित्रण है। उनके काव्य में वीर और श्रृंगार रस का अद्भुत समन्वय है। प्रतापशाह विरदावली, हिम्मत बहादुर विरदावली, अर्जुनरायसा व्यक्तिरक ऐतिहासिक काव्य ग्रन्थ है। रामरसायन अन्तिम ग्रन्थ है। पद्माकर हिन्दी साहित्य के श्रृंगार, वीर एवं भक्ति भाव कविता के लिए प्रसिद्ध है। प्रकृति का वर्णन निरपेक्ष है। श्रृंगार काव्य के वे अग्रगण्य कवि हैं। सागर के सूबेदार रघुना# राव ने पद्माकर की कविता की सराहना करते हुए एक लाख रु. का नकद पुरस्कार दिया था। वे लाव-लश्कर के साथ यात्रा करते थे। उनकी कविता रीतिकालीन युग श्रृंगार तथा विलासिता की अभिव्यक्ति करती है। उन्होंने बुन्देली शब्दों की व्यापक काव्य के साथ इस प्रकार संयुक्त किया है कि वे उनमें विलीन हो गये हैं। इनकी भाषा ही इन्हें बुन्देलखण्ड तथा बुन्देली दोनों का श्रेष्ठ कवि घोषित करती है।
तुलसी, केशव, पद्माकर, गंगाधर लाल, बिहारी। गई लिखी मधुरिमा जाकी वही ईसुरी न्यारी।। रहे स्वतन्त्र मंदिर हिन्दी की जा हिन्दी को धारे। रे मन चल बुन्देल भारती की आरती उतारे।।
तुलसी कवि केशवदास हुए, अरु आदि कवि इसी भूमि में आये। गुप्त, बिहारी यहां जन्मे, चतुरेश, रमेश, ने छन्द रचाए।। भूषण की जब डोली उठी तब दत्र ने कांधे दै मान बढ़ाए। तुलसी ने घिसे जब चन्दन तो श्रीराम ने माथे में खौर लगाए।।
पन्नालाल उपाध्याय 
वेद व्यास, तुलसी, केशव की छायी कीर्ति। धन्य कवि भूमि पुण्य प्रतिभा प्रसारिणी।। रघुकुल सूर्य चित्रकूट में रमे थे यहीं। अति रमणीय तीर्थ भूमि मोक्ष कारिणी।। श्रीश गुण गांऊ पढ़ चूम चूम झूम झूम।। हे बुन्देल भूमि हिन्द मानस विहारिणी।।
-हरिदास शर्मा "श्रीश
मैथिलीशरण गुप्त
हिन्दी साहित्य के प्रखर नक्षत्र, माँ भारती के वरद पुत्र मैथिलीशरण गुप्त का जन्म ३ अगस्त सन १८८६ई. में पिता सेठ रामचरण कनकने और माता कौशिल्या बाई की तीसरी संतान के रूप में चिरगांव, झांसी में हुआ। माता और पिता दोनों ही परम वैष्णव थे। "कनकलताद्ध नाम से कविता करते थे। विद्यालय में खेलकूद में अधिक ध्यान देने के कारण पढ़ाई अधूरी ही रह गयी। घर में ही हिन्दी, बंगला, संस्कृत साहित्य का अध्ययन किया। मुंशी अजमेरी जी ने उनका मार्गदर्शन किया। १२ वर्ष की आयु में ब्रजभाषा में कविता रचना आरम्भ किया। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्पर्क में भी आये। उनकी कवितायें खड़ी बोली में मासिक "सरस्वती' में प्रकाशित होना प्रारम्भ हो गई। प्रथम काव्य संग्रह "रंग में भंग' तथा वाद में "जयद्रथ वध' प्रकाशित हुई। उन्होंने बंगाली के काव्य ग्रन्थ "मेघनाथ वध' "ब्रजांगना' का अनुवाद भी किया। सन् १९१४ ई. में राष्टीय भावनाओं से ओत-प्रोत "भारत भारती' का प्रकाशन किया। उनकी लोकप्रियता सर्वत्र फैल गई। संस्कृत में लिखित "स्वप्नवासवदत्त' का अनुवाद प्रकाशित कराया। सन् १९१६-१७ ई. में महाकाव्य "साकेत' का लेखन प्रारम्भ किया। उर्मिला के प्रति उपेक्षा भाव इस ग्रन्थ में दूर किये। स्वतः प्रेस की स्थापना कर अपनी पुस्तकें छापना शुरु किया। साकेत तथा अन्य ग्रन्थ पंचवटी आदि सन् १९३१ में पूर्ण किये। इसी समय वे राष्ट्रपिता गांधी जी के निकट सम्पर्क में आये। 'यशोधरा' सन् १९३२ ई. में लिखी। गांधी जी ने उन्हें "राष्टकवि' की संज्ञा प्रदान की। सन् १९४१ ई. में व्यक्तिगत सत्याग्रह के अंतर्गत जेल गये। उनकी तीन पत्नियां तथा आठ संतान हुई। आगरा विश्वविद्यालय से उन्हें डी.लिट. से सम्मानित किया गया। १९५२-१९६४ तक राज्य सभा के सदस्य मनोनीत हुये। सन् १९५३ ई. में भारत सरकार ने उन्हें "पद्म विभूषण' से सम्मानित किया गया। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद ने सन् १९६२ ई. में अभिनन्दन ग्रन्थ भेंट किया तथा हिन्दू विश्वविद्यालय के द्वारा डी.लिट. से सम्मानित किये गये।
इसी वर्ष प्रयाग में सरस्वती की स्वर्ण जयन्ती समारोह का आयोजन हुआ जिसकी अध्यक्षता श्री गुप्त जी ने की। सन् १९६३ ई. में अनुज सियाराम शरण गुप्त के निधन ने अपूर्णनीय आघात पहुंचाया। १२ दिसम्बर १९६४ ई. को दिल का दौरा पड़ा और साहित्य का जगमगाता तारा अस्त हो गया। ७८ वर्ष की आयु में दो महाकाव्य, १९ खण्डकाव्य, काव्यगीत, नाटिकायें आदि लिखी। उनके काव्य में राष्ट्रीय चेतना, धार्मिक भावना और मानवीय उत्थान प्रतिबिम्बित है। भारत भारती के तीन खण्ड में देश का अतीत, वर्तमान और भविष्य चित्रित है। वे मानववादी, नैतिक और सांस्कृतिक काव्यधारा के विशिष्ट कवि थे। डॉ॰ नगेन्द्र के अनुसार वे राष्ट्रकवि थे, सच्चे राष्ट्रकवि। दिनकर जी के अनुसार उनके काव्य के भीतर भारत की प्राचीन संस्कृति एक बार फिर तरुणावस्था को प्राप्त हुई थी।
वृन्दावनलाल वर्मा
महान उपन्यासकार श्री वृन्दावनलाल वर्मा का जन्म मऊरानीपुर --झांसी-- में ९ जनवरी सन् १८८९ ई. में हुआ। उनके पिता श्री अयोध्या प्रसाद श्रीवास्तव कानूनगो थे। विद्यार्थी जीवन में ही आपने शेक्सपीयर के चार नाटकों का हिन्दी अनुवाद किया। सन् १९१३ में वकालत शुरु की, सन् १९०९ में राजपूत की तलवार --कहानी संग्रह—प्रकाशित हुई। "गढ़-कुण्डार', "विराटा की पद्मिनी', "झांसी की रानी', "हंस मयूर', "माधवराय सिन्धिया', "मृगनयनी', पूर्व की ओर, ललित विक्रम, भुवन विक्रम, अहिल्याबाई "कीचड़' और "कमल' "देवगढ़ की मुस्कान', "रामगढ़ की रानी', "महारानी दुर्गावती', "अब क्या हो', "सोती आग', --ऐतिहासिक उपन्यास--, "लगन, "संगम', "प्रत्यागत', कुण्डली चक्र, प्रेम की भेंट, मंगलसूत्र, राखी की लाज, अचल मेरा कोई, बाँस का फांस, खिलौनी की खोज, कनेर, पीले हाथ, नीलकंठ, केवट, देखा-देखी, उदय, किरण, आहत, आदि सामाजिक उपन्यासों का लेखन पूर्ण किया। अंगूठी का दान, कलाकार का दण्ड, रश्मि समूह, शरणागत, मेढ़क का ब्याह, ऐतिहासिक कहानियां, गौरव गाथाएं, सरदार राने खां, राष्ट्रीय ध्वज की आन, एक दूसरे के लिए हम, आदि कहानियां लिखी। झांसी की रानी, बीरबल, चले चलो, नाटक तथा तीन एकांकी लिखे। हृदय की हिलोर, --गद्य काव्य--, दबे पांव --शिकार अनुभव, सोना --आंचलिक कहानी--, युद्ध के मोर्चे से, --वीरगाथा जीवनी-- १८५७ के अमर वीर --स्केच-- अपनी कहानी --जीवनी-- बुन्देलखण्ड के लोकगती, काश्मीर का कांटा, --राजनैतिक नाटक—भारत यह है --रिपोर्ताज़-- आदि विविध रचनाएं लिखी। ललितादित्य डूबता शंखनाद, अमर ज्योति, आदि प्रकाश्य है। आपकी विभिन्न पुस्तकों का अनुवाद देशी और विदेशी भाषाओं में सम्पन्न हुआ।
भारत सरकार द्वारा सन् १९६५ ई. में "पदम् भूषण' द्वारा सम्मानित हुए। आगरा विश्वविद्यालय द्वारा सन् १९६८ में डी.लिट. उपाधि प्रदत्त हुयी। हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा सन् १९६५ में ""साहित्य वाचस्पति उपाधि प्रदान की गयी। "सोवियत भूमि नेहरु पुरस्कार', "साहित्य अकादमी पुरस्कारद्ध, "हिन्दुस्तानी अकादमी पुरस्कारद्ध तथा "बटुक प्रसाद पुरस्कार' --काशी नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी-- प्राप्त हुए। २३ फ़रवरी सन् १९६९ ई. को ८१ वर्ष की आयु में स्वर्गवासी हुए।
श्री वर्मा जी की कहानियां, उपन्यास, नाटक आदि आंचलिकता का गुण लिये हुए हैं। उनकी तुलना या प्रेरणा स्रोत सर वाल्टर स्काट को माना जाता है, यह भ्रामक है। उनकी घटनाचक्रों की पृष्ठभूमि, पात्रों की मानसिकता तथा वातावरण शुद्धतम भारतीय तथा बुन्देलखण्डी है।
बुदेलखण्ड का चप्पा-चप्पा उनका जाना और छाना हुआ था। यहाँ के निवसी उनकी रचनाओं में अनुप्राणित हैं। बुन्देलाण्ड का समस्त जीवन उनमें प्रतिफलित है। उनका जीवन एक महाकाव्य था। जिसमें विविध सर्ग उनकी रचनाएं थीं। उनके जीवन में बुन्देलखण्ड की मिट्टी की सुगन्ध बसी हुयी थी और वही उनकी रचनाओं में भी मुखरित थी। हिन्दी में एक वही लेखक थे जिसमें एक व्यापक भूखण्ड का अतीत, वर्तमान और भविष्य बोलता है। मानो वह कोई दपंण है जिसमें युगों के चित्र उभरतें, मिटते और मिट-मिट कर फिर उभरते हैं। --पुस्तकांश "मैंने स्मृति के दीप जलाएं' -श्री रामनाथ सुमन सन् १९७६--
सियारामशरण गुप्त 
बहुमुखी प्रतिभा के साहित्यकार श्री सियारामशरण गुप्त का जन्म भाद्र पूर्णिमा सम्वत् १९५२ वि. तद्नुसार ४ सितम्बर १८९५ ई. को सेठ रामचरण कनकने के परिवार में श्री मैथिलीशरण गुप्त के अनुज रूप में चिरगांव, झांसी में हुआ था। प्राइमरी शिक्षा पूर्ण कर घर में ही गुजराती, अंग्रेजी और उर्दू भाषा सीखी। सन् १९२९ ई. में राष्ट्रपिता गांधी जी और कस्तूरबा के सम्पर्क में आये। कुछ समय वर्धा आश्रम में भी रहे। सन् १९४० ई. में चिरगांव में ही नेता जी सुभाषचन्द्र बोस का स्वागत किया। वे सन्त बिनोवा जी के सम्पर्क में भी आये। उनकी पत्नी तथा पुत्रों का निधन असमय ही हो गया। मूलत- आप दु:ख वेदना और करुणा के कवि बन गये। साहित्य के आप मौन साधक बने रहे।
'मौर्य विजय' प्रथम रचना सन् १९१४ में लिखी। अनाथ, आर्द्रा, विषाद, दूर्वा दल, बापू, सुनन्दा, गोपिका आपके खण्ड काव्य हैं। मानुषी --कहानी संग्रह--, पुण्य पर्व --नाटक--, गीता सम्वाद, --अनुवाद--, उन्मुक्त गीत --नाट्य--, अनुरुपा तथा अमृत पुत्र --कविता संग्रह—सर्वप्रसिद्ध है। दैनिकी नकुल, नोआखली में, जय हिन्द, पाथेय, मृण्मयी, आत्मोसर्ग काव्यग्रन्थ हैं। "अन्तिम आकांक्षा', "नारी' और गोद उपन्यास है। "झूठ-सच' निबन्ध संग्रह है। ईषोपनिषद, धम्मपद भगवत गीता का पद्यानुवाद आपने किया।
दीर्घकालीन हिन्दी सेवाओं के लिए सन् १९६२ ई. में "सरस्वती' हीरक जयन्ती में सम्मानित किये गये। आपको सन् १९४१ ई. में "सुधाकर पदक' नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी द्वारा प्रदान किया गया। आपकी समस्त रचनाएं पांच खण्डों में संकलित कर प्रकाशित है। असमय ही २९ मार्च १९६३ ई. को लम्बी बीमारी के बाद मां सरस्वती के धाम में प्रस्थान कर गये।
डॉ. रामकुमार वर्मा 
एकांकी सम्राट डॉ॰ रामकुमार वर्मा का जन्म १५ सितम्बर सन् १९०५ ई. में मोहल्ला गोपालगंज, सागर में हुआ था। आप इलाहाबाद विश्वविद्यालय से विभागाध्यक्ष --हिन्दी-- पद से सेवा निवृत हुये। वीर हम्मीर, चित्तौड़ विजय—प्रबन्ध काव्य-- निशीथ, बालि वध, एकलव्य, --खण्ड काव्य-- कुलललना, नूरजहाँ, भोजराज, जौहर—आख्यान गीत, पृथ्वीराज की आंखें, रेशमी टाई, रुप-रंग, कुन्ती का परिताप, शिवाजी, रिम-झिम, कौमुदी महोत्सव—ऐतिहासिक एकांकी-- मयूर पंख, खट्टे-मीठे, ललित एकांकी, मेरे श्रेष्ठ रंग एकांकी प्रकाशित हैं। साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास, कबीर ग्रन्थावली --सम्पादित-- कबीर का रहस्यवाद, कबीर : एक अनुशीलन, संस्मरणों के सुमन भी प्रकाशित हैं। आपके काव्य संग्रह अंजलि, अभिशाप, रुपराशि, चारुमित्र, सप्तकिरण, हिमहास, स्मृति के अंकुर, रुप-रंग, ॠतुराज, दीपदान, कामकंदला, चन्द्र किरण, बापू, इन्द्रधनुष, अग्निशिखा, अशोक का शोक आदि हैं।
डॉ॰ वर्मा बहुमुखी प्रतिभा के साहित्यकार थे। वे श्रेष्ठ कवि तथा एकांकी लेखन के अद्वितीय रचनाकार थे। एक महान नाटककार एवं साहित्य के मूर्धन्य अध्येता थे। उनका प्रत्येक ग्रन्थ साहित्य जगत में प्रकाशमान है। सन् १९६३ ई. में "पद्म भूषण' से सम्मानित हुए।
अंबिकाप्रसाद दिव्य 
अजयगढ़ जिला पन्ना के सुसंस्कृत कायस्थ परिवार में श्री अम्बिका प्रसाद, "दिव्य' का जन्म १६ मार्च सन् १९०६ ई में हुआ था। एम. ए. --हिन्दी-- साहित्यरत्न उपाधि सम्पन्न "दिव्य जी' ने म.प्र. शिक्षा विभाग में सेवा कार्य प्रारंभ किया, प्राचार्य पद से सेवा निवृत हुवे। आप अंग्रेजी, संस्कृत, रुसी, फारसी, उर्दू भाषाविद् थे। आप बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। खजुराहो की अतिरुपा, प्रीताद्रि की राजकुमारी, काला भौंरा, योगी राजा, सती का पत्थर, फजल का मकबरा, जूठी पातर, जयदुर्ग का राजमहल, असीम का सीमा, प्रेमी तपस्वी आदि प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यासों की रचना की। निमिया, मनोवेदना, बेलकली सामाजिक उपन्यास लिखे। गाँधी परायण, अंतर्जगत, रामदपंण, खजुराहो की रानी, दिव्य दोहावली, पावस, पिपासा, स्रोतस्विनी, पश्यन्ति, चेतयन्ति, अनन्यमनसा, विचिन्तयंति, भारतगीत प्रसिद्ध महाकाव्य तथा मुक्त रचनायें हैं। आपने लंकेश्वर, भोजनन्दन कंस, निर्वाण पथ, तीन पग, कामधेनु, सूत्रपात, चरण चिन्ह, प्रलय का बीज, रुपक सरिता, रुपक मंजरी, फूटी आँखे, भारत माता, झाँसी की रानी, आदि नाटक लिखे। निबन्ध विविधा, दीप सरिता, हमारी चित्रकला म.प्र. शासन—छत्रसाल पुरस्कार-- द्वारा पुरस्कृत है। वीमेन आॅफ खजुराहो अंग्रेजी की सुप्रसिद्ध रचना है। दिव्य जी का पद्य साहित्य मैथिली शरण गुप्त, नाटक साहित्य रामकुमार वर्मा तथा उपन्यास साहित्य वृंदावन लाल वर्मा जैसे शीर्ष साहित्यकारों के सन्निकट हैं। आपने कीर के कागर समान अपना शरीर ५ सितम्बर १९८६ ई. को शिक्षक दिवस समारोह में भाग लेते हुये हृदय-गति रुक जाने से त्याग दिया। आप आदर्श प्राचार्य के रूप में सन् १९६० में सम्मानित किये गये थे। दिव्य जी के उपन्यासों का केन्द्र बिन्दु बुन्देलखंड अथवा बुन्देले नायक हैं। बेल कली --पन्ना नरेश अमान सिंह-- जय दुर्ग का रंग महल—अजयगढ़-- सती का पत्थर—गठौरा का युद्ध-बुन्देलखण्ड का महाभारत—पीताद्रे का राजकुमारी --रानी दुर्गावती-- तथा निमिया की पृष्ठभूमि बुन्देलखण्ड का जनजीवन है। सन् १९८६ ई. में मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा समिति भोपाल द्वारा "दिव्य पुरस्कार' का शुभारम्भ अहिन्दी प्रदेश के नाटककारों के लिए किया गया है। साहित्य सदन—अखिल भारतीय अम्बिका प्रसाद दिव्य स्मृति समारोह द्वारा उपन्यास विधा हेतु तथा दो हजार रुपये की राशि तथा द्वितीय पुरस्कार "कविता विधा हेतु' घोषित किये गये हैं। तथा "दिव्यालोक' का प्रकाशन भी संग्रहणीय स्मारिका के रूप में प्रस्तावित है। दिव्य जी का अभिनन्दन ग्रन्थ प्रकाश्य है।
केदारनाथ अग्रवाल 
श्री केदारनाथ अग्रवाल का जन्म १ अप्रैल १९११ ई. में बाँदा जनपद के कमासिन ग्राम में हुआ। व्यवसाय से आप कुशल अधिवक्ता तथा सरकारी वकील के रूप में भी पदस्थ थे। "देश देश की कविता' प्रथम काव्यानुवाद प्रकाशित हुआ। युग की गंगा, नींद के बादल, गुलमेंहदी, आग का आइना, हे मेरी तुम, कहे किदार खरी-खरी, जमुन जल, जो शिलाएं तोड़े हैं, अनहारी हरियाली, कूकी कोयल खड़ी पेड़ की देह, बसन्त में प्रसन्न हुयी धरती, --काव्य संग्रह—प्रकाशित हैं। पतिया --उपन्यास--, खिली बस्ती गुलाबों की --संस्मरण--, भी प्रमुख ग्रन्थ है। साहित्य अकादमी द्वारा "अपूर्वा' पुरस्कृत है। आप "मैथिलीशरण गुप्त' पुरस्कार से सम्मानित हुए तथा हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा "विद्यावाचस्पति' के उपाधि से अलंकृत किये गये।
आपको जनवादी कवि के नाते सन् १९७३ ई. में सोवियत लैण्ड पुरस्कार प्रदान किया गया तथा रुस का यात्रा भी की। इनकी काव्यप्रेरणा स्वयं का जीवनदर्शन है। उन्होंने किसान एवं मजदूरों की पीड़ा तथा ग्रामीण जीवन के दु:ख दर्दों को ईमानदारी से व्यक्त किया है। माक्र्सवादी विचारधारा से प्रभावित होकर रचना करते हैं, किन्तु इनका व्यक्तित्व स्वछन्द व प्रगतिशील है। वे केवल कवि ही नहीं सूक्ष्म विचारक भी हैं जैसा उनके साहित्यिक लेखों से प्रगट होता है। वे नये मूल्यों की स्थापना करनेवाले विद्रोही कवि हैं। समाज में नये जीवन की नयी किरण का स्वागत करते हैं। संघर्ष और विद्रोह के प्रति उनका दृष्टिकोण स्वस्थ है। उनके बिम्ब नवीन तथा सारगर्भित होते हैं। उनकी भाषा सरल व चुभती हुई है। केदारनाथ अग्रवाल पुरस्कार समारोह बाद में प्रारम्भ हो गया है। बापू जी का देहान्त २२ जून सन् २००० को हो गया।

सहायक ग्रन्थ- 
१. हिंदी, नागरी लिपि व अंक -डॉ. सर्वदानंद द्विवेदी 


१.
मैया शारदे! पत रखियो
*
छंद - सड़गोड़ासनी।
पद - ३, मात्राएँ - १५-१२-१५।
पहली पंक्ति - ४ मात्राओं के बाद गुरु-लघु अनिवार्य।
गायन - दादरा ताल ६ मात्रा।
*
मैया शारदे! पत रखियो
मोखों सद्बुधि दइयो
मैया शारदे! पत रखियो

जा मन मंदिर मैहरवारी
तुरतइ आन बिरजियो
मैया शारदे! पत रखियो

माया-मोह राच्छस घेरे
झट सें मार भगइयो
मैया शारदे! पत रखियो

अनहद नाद सुनइयो माता!
लागी नींद जगइयो
मैया शारदे! पत रखियो

भासा-आखर-कवित मोय दो
लय-रस-भाव लुटइयो
मैया शारदे! पत रखियो

मात्रा-वर्ण; प्रतीक बिम्ब नव
अलंकार झलकइयो
मैया शारदे! पत रखियो

२५-११-२०१९
***
२. फाग-नवगीत
राधे! आओ, कान्हा टेरें
.
राधे! आओ, कान्हा टेरें
लगा रहे पग-फेरे,
राधे! आओ कान्हा टेरें
.
मंद-मंद मुस्कायें सखियाँ
मंद-मंद मुस्कायें
मंद-मंद मुस्कायें,
राधे बाँकें नैन तरेरें
.
गूझा खांय, दिखायें ठेंगा,
गूझा खांय दिखायें
गूझा खांय दिखायें,
सब मिल रास रचायें घेरें
.
विजया घोल पिलायें छिप-छिप
विजया घोल पिलायें
विजया घोल पिलायें,
छिप-छिप खिला भंग के पेड़े
.
मलें अबीर कन्हैया चाहें
मलें अबीर कन्हैया
मलें अबीर कन्हैया चाहें
राधे रंग बिखेरें

ऊँच-नीच गए भूल सबै जन
ऊँच-नीच गए भूल
ऊँच-नीच गए भूल
गले मिल नचें जमुन माँ तीरे
***

सामयिक बुंदेली फाग:
दिल्ली के रंग
*
दिल्ली के रंग रँगो गुइयाँ।
जुलुस मिलें दिन-रैन, लगें नारे कई बार सुनो गुइयाँ।।
जे एन यू में बसो कनैया, उगले ज़हर बचो गुइयाँ।
संसद में कालिया कई, चक्कर में नाँय फँसो गुइयाँ।।
मम्मी-पप्पू की बलिहारी, माथा ठोंक हँसो गुइयाँ।।
छप्पन इंची छाती पंचर, सूजा लाओ सियों गुइयाँ।।
पैले आप-आप कर रए रे, छूटी ट्रेन न रो गुइयाँ।।
नेताजी खों दाँव चूक रओ, माया माँय धँसो गुइयाँ।।
थाना फुँका बता रईं ममता, अपराधी छूटो गुइयाँ।।
सुसमा-ईरानी जब बोलें, चुप्पै-चाप भगो गुइयाँ।।
***
२०.३.२०१६
बुंदेली नवगीत  
कनैया नई सुदरो
*
नई सुदरो, बब्बा नई सुदरो 
मन कारो, 
कनैया नई सुदरो
*
कालिज मा जा खें
नें खोलें किताबें
भासन दें, गुंडों सें
ऊधम कराबें
अधनंगी मोंड़िन सँग
फोटू खिंचाबे
भारत मैया कीं
नाक कटाबे
फरज निभाबें मा
बा पिछरो
मन कारो,
कनैया नई सुदरो
*
दुसमन की जै-जै के
नारे लगाए
भारत की सैना पे
उँगरी उठाए
पत्तल में खा-खा खें
छिदरा गिनाए
थूके खों चाटे, नें
तनकऊ लजाए
सूकर है मैला में
जाय सपरो
मन कारो,
कनैया नई सुदरो
*
१३.३.२०१६

बुंदेली हाइकु :
संजीव
*
मोरी मतारी
नज़र मत फेरो
ओ री मतारी
घबरा खें टेरो
डगर है अँधेरी
मोहे डर घेरो
न डूबे नैया
फँसी भवसागर
बचा ले मैया
एकै बिनै है
न सुत खों बिसारो
तन्नक हेरो
* 
बुंदेली मुक्तक  
*
को खों हेरत फिर रईं बिन्ना?
पाँव नच रए ता-ता-धिन्ना 
उटकन दीदा काढ़ कसीदा
काए नैन नटेरे भिन्ना?

*
७. एक रचना -
भुन्सारे चिरैया
*
नई आई,
बब्बा! नई आई
भुन्सारे चरैया नई आई
*
पीपर पै बैठत थी, काट दओ कैंने?
काट दओ कैंने? रे काट दओ कैंने?
डारी नें पाई तो भरमाई
भुन्सारे चरैया नई आई
नई आई,
सैयां! नई आई
*
टला में पीयत ती, घूँट-घूँट पानी
घूँट-घूँट पानी रे घूँट-घूँट पानी
टला खों पूरो तो रिरयाई
भुन्सारे चरैया नई आई
नई आई,
गुइयाँ! नई आई
*
फटकन सें टूंगत ती बेर-बेर दाना
बेर-बेर दाना रे बेर-बेर दाना
सूपा खों फेंका तो पछताई
भुन्सारे चरैया नई आई
नई आई,
लल्ला! नई आई
*
८-२-२०१६

८ बुंदेली नवगीत :
का बिगार दओ?
*
काए फूँक रओ बेदर्दी सें 
हो खें भाव बिभोर?
का बिगार दो तोरो मैंने
भइया रामकिसोर??
*
हँस खेलत ती
संग पवन खें
पेंग भरत ती खूब।
तेंदू बिरछा
बाँह झुलाउत
रओ खुसी में डूब।
कें की नजर
लग गई दइया!
धर लओ मो खों तोर।
का बिगार दो तोरो मैंने
भइया रामकिसोर??
*
काट-सुखा
भर दई तमाखू
डोरा दओ लपेट।
काय नें समझें
महाकाल सें
कर लई तुरतई भेंट।
लत नें लगईयो
बीमारी सौ
दैहें तोय झिंझोर
का बिगार दो तोरो मैंने
भइया रामकिसोर??
*
जिओ, जियन दो
बात मान ल्यो
पीओ नें फूकों यार!
बढ़े फेंफडे में
दम तुरतई
गाड़ी हो नें उलार।
चुप्पै-चाप
मान लें बतिया
सुनें न कौनऊ सोर।
का बिगार दो तोरो मैंने
भइया रामकिसोर??
*
अपनों नें तो
मेहरारू-टाबर
का करो ख़याल।
गुटखा-पान,
बिड़ी लत छोड़ो
नई तें होय बबाल।
करत नसा नें
कब्बऊ कौनों
पंछी, डंगर, ढोर।
का बिगार दो तोरो मैंने
भइया रामकिसोर??
*
बात मान लें
निज हित की जो
बोई कहाउत सयानो।
तेन कैसो
नादाँ है बीरन
साँच नई पहचानो।
भौत करी अंधेर
जगो रे!
टेरे उजरी भोर।
का बिगार दो तोरो मैंने
भइया रामकिसोर??
*
२१-११-२०१५
कालिंदी विहार लखनऊ
 ९. नवगीत:
संजीव
.
शिव के मन मांहि
बसी गौरा
.
भाँग भवानी कूट-छान के
मिला दूध में हँस घोला
शिव के मन मांहि
बसी गौरा
.

पेड़ा गटकें, सुना कबीरा
चिलम-धतूरा धर झोला
शिव के मन मांहि
बसी गौरा
.
भसम-गुलाल मलन को मचलें
डगमग डगमग दिल डोला
शिव के मन मांहि
बसी गौरा
.
आग लगाये टेसू मन में
झुलस रहे चुप बम भोला
शिव के मन मांहि
बसी गौरा
.
विरह-आग पे पिचकारी की
पड़ी धार, बुझ गै शोला
शिव के मन मांहि
बसी गौरा
-------------------------
१० नवगीत:
*
एक हाथ मा
छुरा छिपा
दूजे से मिले गले 
ताहू पे शिकवा
ऊगे से पैले
भोर ढले.
*
केर-बेर खों संग
बिधाता हेरें
मुंडी थाम.
दोउन खों
प्यारी है कुर्सी
भली करेंगे राम.
उंगठा छाप
लुगाई-मोंड़ा
सी एम - दावेदार।
पिछड़ों के
हम भये मसीहा
अगड़े मरें तमाम।
बात नें मानें जो
उनखों जुटे के तले मलें
ताहू पे शिकवा
ऊगे से पैले
भोर ढले.
एक हाथ मा
छुरा छिपा
दूजे से मिले गले
*
सहें न तिल भर
कोसें दिन भर
पीड़ित तबहूँ हम.
अपनी लाठी
अपन ई भैंसा
लैन न देंहें दम.
सहनशीलता
पाठ पढ़ायें
खुद न पढ़ें, लो जान-
लुच्चे-लोफर
फूंके पुतला
रोको तो मातम।
देस-हितों से
का लेना है
कैसउ ताज मिले.
ताहू पे शिकवा
ऊगे से पैले
भोर ढले.
एक हाथ मा
छुरा छिपा
दूजे से मिले गले 
*
११ बुन्देली गीत;
संजीव 
*
आ खें सेहर गाँव पछता रओ,
नाहक मन खों चैन गँवा दओ....
*
छोर खेत-खलिहान आओ थो,
नैनों मां सपना सजाओ थो।
सेहर आओ तो छूटे अपने,
हाय राम रे! टूटे सपने।
धोखा दें खें, धोखा खा रओ....
*
दूनो काम, मजूरी आधी,
खाज-कोढ़ मां रिस्वत ब्याधी।
सुरसा कहें मूं सी मंहगाई-
खुसियाँ जैसे नार पराई।
आपने साए से कतरा रओ....
*
राह हेरती घर मां तिरिया,
रोत हटी बऊ आउत बिरिया।
कब लौं बहले बिटिया भोली?
खुद सें खुद ही आँख चुरा रओ....
***

१२ नवगीत 
हम का कर रए  
*
हम का कर रए?
जे मत पूछो,
तुम का कर रए
जे बतलाओ?
*
हमरो स्याह सुफेद सरीखो
तुमरो धौला कारो दीखो
पंडज्जी ने नोंचो-खाओ
हेर सनिस्चर भी सरमाओ
घना बाज रओ थोथा दाना
ठोस पका
हिल-मिल खा जाओ
हम का कर रए?
जे मत पूछो,
तुम का कर रए
जे बतलाओ?
*
हमरो पाप पुन्न सें बेहतर
तुमरो पुन्न पाप सें बदतर
होते दिख रओ जा जादातर
ऊपर जा रो जो बो कमतर
रोन न दे मारे भी जबरा
खूं कहें आँसू
चुप पी जाओ
हम का कर रए?
जे मत पूछो,
तुम का कर रए
जे बतलाओ?
*
8.2.2016
१३ सड़गोड़ासनी:
बुंदेली छंद, विधान: मुखड़ा १५-१६, ४ मात्रा पश्चात् गुरु लघु अनिवार्य,
अंतरा १६-१२, मुखड़ा-अन्तरा

जनम भओ किस  बिरिया बोलो 
मरण हुआ कब जानो?
*
जब-जब सत्य प्रतीति हुई तब
कह-कह नित्य बखानो
*
जब-जब सच ओझल हो प्यारे!
निज करनी अनुमानो.
*
चलो सत्य की डगर पकड़ तो
मीत न अरि कुछ मानो
*
देख तिमिर मत मूँदो नयना
अंतर-दीप जलानो
*
तन-मन-देश न मलिन रहे मिल
स्वच्छ करेंगे ठानो
*
ज्यों की त्यों चादर तब जब
जग सपना विहँस भुलानो
***
२९.६.२०१८, ७९९९५५९६१८

१४ नवगीत 
राम रे!
*
राम रे! 
कैसो निरदै काल?
*
भोर-साँझ लौ गोड़ तोड़ रए 
कामचोर बे कैते। 
पसरे रैत ब्यास गादी पै 
भगतन संग लपेटे। 
काम पुजारी गीता बाँचें 
गोपी नचें निढाल-
आँधर ठोंके ताल  
राम रे! 
बारो डाल पुआल। 
राम रे! 
कैसो निरदै काल?
*
भट्टी देह, न देत दबाई
पैलउ माँगें पैसा। 
अस्पताल मा घुसे कसाई 
थाने अरना भैंसा। 
करिया कोट कचैरी घेरे 
बकरा करें हलाल-
बेचें न्याय दलाल 
राम रे !
लूट बजा रए गाल। 
राम रे! 
कैसो निरदै काल?
*
झिमिर-झिमिर-झम बूँदें टपकें 
रिस रओ छप्पर-छानी। 
दागी कर दई रौताइन की 
किन नें धुतिया धानी?
अँचरा ढाँके, सिसके-कलपे 
ठोंके आपन भाल 
राम रे !
जीना भओ मुहाल। 
राम रे! 
कैसो निरदै काल?
***
१५ होरा भूँज रओ छाती पै
*
होरा भूँज रओ छाती पै
आरच्छन जमदूत
पैदा होतई बनत जा रए
बाप बाप खें, पूत
*
लोकनीति बनबास पा रई
राजनीति सिर बैठ
नाच नचाउत नित तिगनी का
घर-घर कर खें पैठ
नाम आधुनिकता को जप रओ
नंगेपन खों भूत
*
नींव बगैर मकान तान रए
भौत सयाने लोग
त्याग-परिस्रम खों तलाक दें
चाह भोग लें भोग
फूँक रए रे, मिली बिरासत
काबिल भए सपूत
*
ईंट-ईंट में खेंच दिवारें
तोड़ रए हर जोड़
लाज-लिहाज कबाड़ बता रए
बेसरमी हित होड़
राह बिसर कें राह दिखा रओ
सयानेपन खों भूत
***
२०-११-२०१५
चित्रकूट एक्सप्रेस,
उन्नाव-कानपूर

१६ अभिनव प्रयोग:
नवगीत
संजीव
.

जब लौं आग न बरिहै तब लौं,
ना मिटहै अंधेरा
सबऊ करो कोसिस मिर-जुर खें
बन सूरज पगफेरा
.
कौनौ बारो चूल्हा-सिगरी
कौनौ ल्याओ पानी
रांध-बेल रोटी हम सेंकें
खा रौ नेता ग्यानी
झारू लगा आज लौं काए
मिल खें नई खदेरा
.
दोरें दिखो परोसी दौरे
भुज भेंटें बम भोला
बाटी भरता चटनी गटखें
फिर बाजे रमतूला
गाओ राई, फाग सुनाओ
जागो, भओ सवेरा
.
(बुंदेलों लोककवि ईसुरी की चौकड़िया फाग की तर्ज़ पर प्रति पर मात्रा १६-१२, नरेंद्र छंद)


१७ नवगीत:
संजीव
.
भारतवारे बड़े लड़ैया
बिनसें हारे पाक सियार
.
घेर लओ बदरन नें सूरज
मचो सब कऊँ हाहाकार
ठिठुरन लगें जानवर-मानुस
कौनौ आ करियो उद्धार
बही बयार बिखर गै बदरा
धूप सुनैरी कहे पुकार
सीमा पार छिपे बनमानुस
कबऊ न पइयो हमसें पार
.
एक सिंग खों घेर भलई लें
सौ वानर-सियार हुसियार
गधा ओढ़ ले खाल सेर की
देख सेर पोंके हर बार
ढेंचू-ढेचूँ रेंक भाग रओ
करो सेर नें पल मा वार
पोल खुल गयी, हवा निकर गयी
जान बखस दो करें पुकार
.
(प्रयुक्त छंद: आल्हा, रस: वीर, भाषा रूप: बुंदेली)

    • १८ .बुन्देली नवगीत :
    •  
  • जुमले रोज उछालें
    *
    संसद-पनघट
    जा नेताजू
    जुमले रोज उछालें।
    *
    खेलें छिपा-छिबौउअल,
    ठोंके ताल,
    लड़ाएं पंजा।
    खिसिया बाल नोंच रए,
    कर दओ
    एक-दूजे खों गंजा।
    खुदा डर रओ रे!
    नंगन सें
    मिल खें बेंच नें डालें।
    संसद-पनघट
    जा नेताजू
    जुमले रोज उछालें।
    *
    लड़ें नई,मैनेज करत,
    छल-बल सें
    मुए चुनाव।
    नूर कुस्ती करें,
    बढ़ा लें भत्ते,
    खेले दाँव।
    दाई भरोसे
    मोंड़ा-मोंडी
    कूकुर आप सम्हालें। 
    संसद-पनघट
    जा नेताजू
    जुमले रोज उछालें।
    *
    बेंच सिया-सत,
    करें सिया-सत।
    भैंस बरा पे चढ़ गई।
    बिसर पहाड़े,
    अद्धा-पौना
    पीढ़ी टेबल पढ़ रई। 
    लाज तिजोरी
    फेंक नंगई
    खाली टेंट खंगालें।
    संसद-पनघट
    जा नेताजू
    जुमले रोज उछालें।
    *
    भारत माँ की
    जय कैबे मां
    मारी जा रई नानी।
    आँख कें आँधर
    तकें पड़ोसन
    तज घरबारी स्यानी।
    अधरतिया मदहोस
    निगाहें मैली
    इत-उत-डालें।
    संसद-पनघट
    जा नेताजू
    जुमले रोज उछालें।
    *
    पाँव परत ते
    अंगरेजन खें,
    बाढ़ रईं अब मूँछें।
    पाँच अंगुरिया
    घी में तर 
    सर हाथ
    फेर रए छूँछे।
    बचा राखियो
    नेम-धरम खों
    बेंच नें
    स्वार्थ भुना लें।
    ***
  • १९ बुंदेली नवगीत 
    *
    १. नाग, साँप, बिच्छू भय ठाँड़े 

    • *
      नाग, साँप, बिच्छू भय ठाँड़े,

      धर संतन खों भेस।
      *
      हात जोर रय, कान पकर रय,
      वादे-दावे खूब।
      बिजयी हो झट कै दें जुमला,
      मरें नें चुल्लू डूब।।
      की को चुनें, नें कौनउ काबिल, 
      सरम नें इनमें लेस।
      *
      सींग मार रय, लात चला रय, 
      फुँफकारें बिसदंत।
      डाकू तस्कर चोर बता रय, 
      खुद खें संत-महंत।
      भारत मैया हाय! नोच रइ
      इनैं हेर निज केस।
      *
      जे झूठे, बे लबरा पक्के, 
      बाकी लुच्चे-चोर।
      आपन मूँ बन रय रे मिट्ठू, 
      देख ठठा रय ढोर।
      टी वी पे गरिया रय
      भत्ते बढ़वा, लोभ असेस।
      ***


२० बुन्देली दोहे

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*


का हो गओ मूँ फेर खें, बैठीं धन्नो आज. 
चलो मना ल्यो 'सलिल' जू', बनें नें बिगरो काज. 
*

जब लौं बऊ-दद्दा जिए, भगत रए सुत दूर
अब काए खों कलपते?, काए हते तब सूर?
*
खूबई तौ खिसियात ते, दाबे कबऊं न गोड़
टँसुआ रोक न पा रए, गए डुकर जग छोड़
*
बने बिजूका मूँड़ पर, झेलें बरखा-घाम
छाँह छीन काए लई, काए बिधाता बाम
*
ए जी!, ओ जी!, पिता जी, सुन खें कान पिराय
'बेटा' सुनबे खों जिया, हुड़क-हुड़क अकुलाय
*

२१ बुन्देली मुक्तिका:
बखत बदल गओ
*
बखत बदल गओ, आँख चुरा रए। 
सगे पीठ में भोंक छुरा रए।।
*
लतियाउत तें कल लों जिनखों
बे नेतन सें हात जुरा रए।।
*
पाँव कबर मां लटकाए हैं
कुर्सी पा खें चना मुरा रए।।
*
पान तमाखू गुटका खा खें
भरी जवानी गाल झुरा रए।।
*
झूठ प्रसंसा सुन जी हुमसें
सांच कई तेन अश्रु ढुरा रए।।
*

२२ मुक्तिका बुंदेली में
*
पाक नें तन्नक रहो पाक है?
बाकी बची न कहूँ धाक है।।
*
सूपनखा सें चाल-चलन कर
काटी अपनें हाथ नाक है।।
*
कीचड़ रहो उछाल हंस पर
मैला-बैठो दुष्ट काक है।।
*
अँधरा दहशतगर्द पाल खें
आँखन पे मल रओ आक है।।
*
कल अँधियारो पक्का जानो
बदी भाग में सिर्फ ख़ाक है।।
*
पख्तूनों खों कुचल-मार खें
दिल बलूच का करे चाक है।।
*
२३ बुन्देली मुक्तिका
कओ बाद में
*
कओ बाद में, सोचो पैले।
मन झकास रख, कपड़े मैले।। 
*
रैदासों सें कर लई यारी।
रुचें नें मंदिर पंडित थैले।।
*
शीश नबा लओ, हो गओ पूजन।
तिलक चढ़ोत्री?, ठेंगा लै ले।।
*
चाहत हो पीतम सें मिलना?
उठो! समेटो, नाते फैले।।
*
जोड़ मरे, जा रए  छोड़कर
लिए मनुज तन, बे थे बैले।।
***

२४ बुन्देली मुक्तिका:
हमाये पास का है?...
*
हमाये पास का है जो तुमैं दें?
तुमाये हात रीते तुमसें का लें?
.
आन गिरवी बिदेसी बैंक मां है
चोर नेता भये जम्हूरियत में।।
.
रेत मां खे रए हैं नाव अपनी
तोड़ परवार अपने हात ही सें।।
.
करें गलती न मानें दोष फिर भी
जेल भेजत नें कोरट अफसरन खें।।
.

भौत है दूर दिल्ली जानते पै
हारियो नें 'सलिल मत बोलियों टें।।
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२५ बुन्देली मुक्तिका:
मंजिल की सौं...
संजीव
*
मंजिल की सौं, जी भर खेल
ऊँच-नीच, सुख-दुःख. हँस झेल

रूठें तो सें यार अगर
करो खुसामद मल कहें तेल

यादों की बारात चली
नाते भए हैं नाक-नकेल

आस-प्यास के दो कैदी
कार रए साँसों की जेल

मेहनतकश खों सोभा दें
बहा पसीना रेलमपेल
*

२६ सलिल रचित आल्हा छंद 
१. बड़े लालची हैं नेतागण, रिश्वत-चारा खाते रोज।
रोज-रोज बढ़ता जाता है, कभी न घटता इनका डोज़।।
'सलिल' किस तरह ये सुधरेंगे?, मिलकर करें सभी हम खोज।
नोच रहे हैं लाश देश की, जैसे गिद्ध कर रहे भोज।।

२. छप्पन इंची सीना देखें, पाकी-आतंकी घबराँय।
मिया मुशर्रफ भूल हेकड़ी,सोते में भी लात चलाँय।।
भौंक रहे हैं खुद शरीफ भी, भुला शराफत जात दिखाँय।
घोल न शर्बत में पी जाएँ, सोच-सोच चीनी डर जाँय।।

३. लोकतंत्र के पीपल बैठे, नेता काटें निश-दिन डाल।
लोक हितों की अनदेखी कर,मचा रहे हैं रोज बवाल।।
रुष्ट देश की जनता सोचे,जिसे चुनो वह खींचे खाल।
हाय राम रे! हमें बचाओ, जीना भी अब हुआ मुहाल।।

४. कौन किसी का कभी हुआ है,मरघट में सब जाते छोड़।
साथ चलेंगे नहीं लगाता, कोई भी थोड़ी भी होड़।।
सुख-समृद्धि में भागीदारी, कंगाली में रहते दूर।
रिश्ते-नाते भरमाते हैं, जो न समझता सच वह सूर।।

५. जा न सड़क पर आम आदमी, अभिनेता आये ले कार।
रौंद सड़क पर तुझे जाएगा, गरियाए कह मूर्ख-गँवार।।
न्यायालय निर्दोष कहेगा, उसे- तुझे ही देगा दोष-
मदद न कोई कहीं मिलेगी, मरे भूख से रो परिवार।।

६. तनक न चिंता करो दाउ जू, बुंदेली के नीके बोल।
जो बोलत हैं बेई जानैं, मिसरी जात कान मैं घोल।।
कबू-कबू ऐसों लागत ज्यौं, अमराई मां फिररै डोल।
आल्हा सुनत लगत हैं ऐसो, जैसें बाज रए रे ढोल।।

७. अंग्रेजी खों मोह ब्याप गौ, जासें मोड़ें जानत नांय।
छींकें-खांसें अंग्रेजी मां, जैंसें सोउत मां बर्रांय।।
नीकी भासा कहें गँवारू, माँ खों ममी कहत इतरांय।
पाँव बुजुर्गों खें पड़ने हौं, तो बिनकी नानी मर जांय।।

८. फ़िल्मी धुन में टर्राउट हैं, आँय-बाँय फिर कमर हिलांय।
बन्ना-बन्नी, सोहर, फागें, आल्हा, होरी समझत नांय।।
बाटी-भर्ता, मठा-महेरी, छोड़ केक बिस्कुट बें खांय।
अमराई चौपाल पनघटा, भूल सहर मां फिरें भुलांय।।
९. घर मा आग लगी बाग़त हैं, देस-बिदेस न देखें हाल।
कहूँ न पानी, कहूँ बाढ़ है, जनगण रोता हो बेहाल।।
कौनउ लेत न जिम्मेदारी, एक-दूसरे पे दें टाल।
अफसर-नेता मौज उड़ाउत, सेठ तिजोरी भरते माल।।
१०. हरिगंधा कुरुक्षेत्र की धरा, पुण्य कमाओ करो प्रणाम।
सुन गीता की वाणी मानो, कर्म-धर्म बिसरा परिणाम।।
कलम थाम बैठे रामेश्वर, सत-शिव-सुंदर रच अभिराम।
सत-चित-आनंद दर्शन पाओ, मोह खास का तज हो आम।।


२४ जून १५६४ महारानी दुर्गावती शहादत दिवस पर विशेष रचना
छंद सलिला: ​​​शुद्ध ध्वनि छंद
*
छंद-लक्षण: जाति लाक्षणिक, प्रति चरण मात्रा ३२ मात्रा, यति १८-८-८-६, पदांत गुरु
लक्षण छंद:
लाक्षणिक छंद है / शुद्धध्वनि पद / अंत करे गुरु / यश भी दे
यति रहे अठारह / आठ आठ छह, / विरुद गाइए / साहस ले
चौकल में जगण न / है वर्जित- करि/ए प्रयोग जब / मन चाहे
कह-सुन वक्ता-श्रो/ता हर्षित, सम / शब्द-गंग-रस / अवगाहे
.
उदाहरण:
१. बज उठे नगाड़े / गज चिंघाड़े / अंबर फाड़े / भोर हुआ
खुर पटकें घोड़े / बरबस दौड़े / संयम छोड़े / शोर हुआ
गरजे सेनानी / बल अभिमानी / मातु भवानी / जय रेवा
ले धनुष-बाण सज / बड़ा देव भज / सैनिक बोले / जय देवा
कर तिलक भाल पर / चूड़ी खनकीं / अँखियाँ छलकीं / वचन लिया
'सिर अरि का लेना / अपना देना / लजे न माँ का / दूध पिया'
''सौं मातु नरमदा / काली मैया / यवन मुंड की / माल चढ़ा
लोहू सें भर दौं / खप्पर तोरा / पिये जोगनी / शौर्य बढ़ा''
सज सैन्य चल पडी / शोधकर घड़ी / भेरी-घंटे / शंख बजे
दिल कँपे मुगल के / धड़-धड़ धड़के / टँगिया सम्मुख / प्राण तजे
गोटा जमाल था / घुला ताल में / पानी पी अति/सार हुआ
पेड़ों पर टँगे / धनुर्धारी मा/रें जीवन दु/श्वार हुआ
वीरनारायण अ/धार सिंह ने / मुगलों को दी / धूल चटा
रानी के घातक / वारों से था / मुग़ल सैन्य का / मान घटा
रूमी, कैथा भो/ज, बखीला, पं/डित मान मुबा/रक खां लें
डाकित, अर्जुनबै/स, शम्स, जगदे/व, महारख सँग / अरि-जानें
पर्वत से पत्थर / लुढ़काये कित/ने हो घायल / कुचल मरे-
था नत मस्तक लख / रण विक्रम, जय / स्वप्न टूटते / हुए लगे
बम बम भोले, जय / शिव शंकर, हर / हर नरमदा ल/गा नारा
ले जान हथेली / पर गोंडों ने / मुगलों को बढ़/-चढ़ मारा
आसफ खां हक्का / बक्का, छक्का / छूटा याद हु/ई मक्का
सैनिक चिल्लाते / हाय हाय अब / मरना है बिल/कुल पक्का
हो गयी साँझ निज / हार जान रण / छोड़ शिविर में / जान बचा
छिप गया: तोपखा/ना बुलवा, हो / सुबह चले फिर / दाँव नया
रानी बोलीं "हम/ला कर सारी / रात शत्रु को / पीटेंगे
सरदार न माने / रात करें आ/राम, सुबह रण / जीतेंगे
बस यहीं हो गयी / चूक बदनसिंह / ने शराब थी / पिलवाई
गद्दार भेदिया / देश द्रोह कर / रहा न किन्तु श/रम आई
सेनानी अलसा / जगे देर से / दुश्मन तोपों / ने घेरा
रानी ने बाजी / उलट देख सो/चा वन-पर्वत / हो डेरा
बारहा गाँव से / आगे बढ़कर / पार करें न/र्रइ नाला
नागा पर्वत पर / मुग़ल न लड़ पा/येंगे गोंड़ ब/नें ज्वाला
सब भेद बताकर / आसफ खां को / बदनसिंह था / हर्षाया
दुर्भाग्य घटाएँ / काली बनकर / आसमान पर / था छाया
डोभी समीप तट / बंध तोड़ मुग/लों ने पानी / दिया बहा
विधि का विधान पा/नी बरसा, कर / सकें पार सं/भव न रहा
हाथी-घोड़ों ने / निज सैनिक कुच/ले, घबरा रण / छोड़ दिया
मुगलों ने तोपों / से गोले बर/सा गोंडों को / घेर लिया
सैनिक घबराये / पर रानी सर/दारों सँग लड़/कर पीछे
कोशिश में थीं पल/टें बाजी, गिरि / पर चढ़ सकें, स/मर जीतें
रानी के शौर्य-पराक्रम ने दुश्मन का दिल दहलाया था
जा निकट बदन ने / रानी पर छिप / घातक तीर च/लाया था
तत्क्षण रानी ने / खींच तीर फें/का, जाना मु/श्किल बचना
नारायण रूमी / भोज बच्छ को / चौरा भेज, चु/ना मरना
बोलीं अधार से / 'वार करो, लो / प्राण, न दुश्मन / छू पाये'
चाहें अधार लें / उन्हें बचा, तब / तक थे शत्रु नि/कट आये
रानी ने भोंक कृ/पाण कहा: 'चौरा जाओ' फिर प्राण तजा
लड़ दूल्हा-बग्घ श/हीद हुए, सर/मन रानी को / देख गिरा
भौंचक आसफखाँ / शीश झुका, जय / पाकर भी थी / हार मिली
जनमाता दुर्गा/वती अमर, घर/-घर में पुजतीं / ज्यों देवी
पढ़ शौर्य कथा अब / भी जनगण, रा/नी को पूजा / करता है
जनहितकारी शा/सन खातिर नित / याद उन्हें ही / करता है
बारहा गाँव में / रानी सरमन /बग्घ दूल्ह के / कूर बना
ले कंकर एक र/खे हर जन, चुप / वीर जनों को / शीश नवा
हैं गाँव-गाँव में / रानी की प्रति/माएँ, हैं ता/लाब बने
शालाओं को भी , नाम मिला, उन/का- देखें ब/च्चे सपने
नव भारत की नि/र्माण प्रेरणा / बनी आज भी / हैं रानी
रानी दुर्गावति / हुईं अमर, जन / गण पूजे कह / कल्याणी
नर्मदासुता, चं/देल-गोंड की / कीर्ति अमर, दे/वी मैया
जय-जय गाएंगे / सदियों तक कवि/, पाकर कीर्ति क/था-छैंया
*********
टिप्पणी: कूर = समाधि,

२८ बुंदेली लघुकथा:
गरम आँसू
*
टप टप टप

चेहरे पर गिरती अश्रु-बूँदों से उसकी नीद खुल गयी, सास को चुपाते हुए कारण पूछा तो उसने कहा- 'बहुरिया! मोय लला से माफी दिला दे रे!मैंने बापे सक करो. परोस का चुन्ना कहत हतो कि लला की आँखें कौनौ से लर गयीं, तुम नें मानीं मने मोरे मन में संका को बीज पर गओ. सिव जी के दरसन खों गई रई तो पंडत जी कैत रए बिस्वास ही फल देत है, संका के दुसमन हैं संकर जी. मोरी सगरी पूजा अकारत भई'
''नई मइया! ऐसो नें कर, असगुन होत है. तैं अपने मोंडा खों समझत है. मन में फिकर हती सो संका बन खें सामने आ गई. भली भई, मो खों असीस दे सुहाग सलामत रहे.''
एक दूसरे की बाँहों में लिपटी सास-बहू में माँ-बेटी को पाकर मुस्कुरा रहे थे गरम आँसू।
*** 
२९ बुन्देली मुक्तिका:
बात नें करियो
संजीव
*
बात नें करियो तनातनी की.
चाल नें चलियो ठनाठनी की..
होस जोस मां गंवा नें दइयो
बाँह नें गहियो हनाहनी की..
जड़ जमीन मां हों बरगद सी
जी न जिंदगी बना-बनी की..
घर नें बोलियों तें मकान सें
अगर न बोली धना-धनी की..
सरहद पे दुसमन सें कहियो
रीत हमारी दना-दनी की..
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३० बुन्देली मुक्तिका:
मंजिल की सौं...
संजीव
*
मंजिल की सौं, जी भर खेल
ऊँच-नीच, सुख-दुःख. हँस झेल

रूठें तो सें यार अगर
करो खुसामद मल कहें तेल

यादों की बारात चली
नाते भए हैं नाक-नकेल

आस-प्यास के दो कैदी
कार रए साँसों की जेल

मेहनतकश खों सोभा दें
बहा पसीना रेलमपेल
*

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