गुरुवार, 1 फ़रवरी 2018

पुरोवाक्

पुरोवाक्
सूर्यमंजरी : शब्दों की अंतर्यात्रा
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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                     सु धार और समय-सापेक्षता साहित्य-सृजन की सनातन कसौटी है। रचनाकार आत्मानुभूतियों की अभिव्यक्ति कर 'स्व' से 'सर्व' के मध्य संवेदना-सेतु का निर्माण करता है। अबोले को बोलने में समर्थ 'शब्द' को भारतीय मनीषा 'ब्रह्म' कहती-मानती है। 'कंकर-कंकर में शंकर' देखने की विरासत 'स्वानुभूत' ही नहीं, 'अन्यानुभूत' संवेदनाओं को भी 'स्वगत' मानकर ग्रहण कर, उन पर मनन-चिंतन और लेखन करती है। मानव सभ्यता आदि काल से प्रकृति व समाज में हो रहे परिवर्तनों, उनसे उत्पन्न प्रभावों तथा विसंगतियों-विडंबनाओं के आकलन-निराकरण हेतु चिंतन काव्य-रचनाओं के माध्यम से करती रही है।


                     नी ति वाक्य 'सार-सार को गह रहे, थोथा देय  उड़ाय' का अनुसरण करते रचनाकार समाज के हर वर्ग से आकर, हर वर्ग के चिंतन को मुखरित कर 'सर्व हित समभाव' को मुखरित करते हैं। 'सिंधु को बिंदु' में समाहित करते हुए कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक अभिव्यक्त करने की कला 'कविता' है। 'स्वानुभूत' को इस तरह अभिव्यक्त किया जाए कि वह 'सर्वानुभूत' प्रतीत हो, हर पाठक को कविता के कथ्य में अपनत्व की अनुभूति हो तो ही कविता और कवि दोनों की सफलता है। सीमित में असीमित को समाहित करते हुए 'मन-मंथन' से नि:सृत अमृत के 'जीवन-घूँट' 'अवचेतन' में प्रस्फुटित हों तो 'निराशा का दुष्चक्र' या 'बंदिशें' 'अंतस का दर्द' 'ओस की बूँद' की तरह उड़ाकर  'सुहानी सुबह' के प्रति आश्वस्त करती हैं। 'यादों का संसार' 'सफर' के 'समापन' पर 'अपने आसमां की तलाश' करते हुए 'समाधान' की 'उम्मीद' में 'आत्मदीप का प्रकाश' कर 'संघर्ष' के' समंदर' में 'भंवर' पर जयी होने की प्रेरणा देता है।

                     ता कत का प्रयोग, सुधार और 'बदलाव' की चाहत 'भीष्म-प्रतिज्ञा' बनकर 'समस्या का समाधान' खोजने की प्रेरणा और 'समापन' की 'सीख' बनकर 'फरियाद' की 'दहलीज का प्रण' पूर्ण कर 'ये है जीवन' का जयघोष करती है।

                     दि नकर के 'आभामंडल' का 'अंदाज' कर कवयित्री 'एक मुट्ठी आसमां की तलाश' में 'सूरज आता देखकर' 'चलते जाना जीवन है' को मूलमंत्र मानकर 'उजाले की ओर' प्रस्थान  करती है। 'या रब मेरे!' 'जीवन घूँट' पी 'अब मैं जीना चाहती हूं' कहती मानवीय 'जिजीविषा' की गुहार सुनकर वह सोचती है- 'काश', परम 'पिता' सब 'शिकायतें' भुलाकर 'रूहानी इत्र' से जीवन-पथ महका दे, ताकि कलम 'निर्वाण' का 'ध्रुवतारा' देख-दिखा सके। सेर को सवा सेर की 'तलाश' में परिस्थितियों को 'कोसना' बंदकर, समाधान की 'तलाश' में, विचारों के  'गहन-गर्त' से 'उधारी' की संस्कृति-वाहकों को वैचारिक 'श्रद्धांजलि' देते हुए 'बवंडर छोड़ो' का आव्हान करतीये काव्य रचनाएँ आम आदमी के चिंतन को उद्घाटित करती हैं। सैयाद की तरह 'यादें' तंग करने लगे और 'प्रिय मुक्तमना' मन मौन हो चले तो 'मैं सृजन गीत का करती हूँ' कहती हुई मानवीय मनीषा, शब्दों की 'अंतर्यात्रा' जीवनानुभवों के 'कोलाज के साथ', उम्र के विविध पड़ावों को पार करते हुए हौसलों का जयघोष इन कविताओं में करती है।

                     ने क इरादों के साथ जमाने के बाजों से जूझती कलम-गौरैया में आशा-आकांक्षा होना स्वाभाविक  है। 'एक चिड़िया की तरह /अंतहीन आकाश में / बंदिशों के बिना / उड़ना चाहती हूँ' कहती कविता कैशोर्य के सपनों को साकार करना चाहती है किंतु समय करने नहीं दे रहा।

                     श राफत के साथ जीना दिन-ब-दिन कठिन से कठिनतर होता जा रहा है। कवयित्री समय की विसंगतियों को इंगित कर लिखती हैं-'ऐ जिंदगी! / यह क्या किया तूने? / बसंत लिखना भी चाहूँ / कागज पर, फिर भी / पतझड़ उतर आता है.....चल , माना जिंदगी! / तराश रही थी मुझको / चोट हथौड़े की देकर / पर अब तो बस कर / कुछ बेढब, टेढ़ा-मेढ़ा / ही रह जाने दे। / मरने से पहले मुझको / थोड़ा सा जी जाने दे।'

                     सिं ह की तरह जीना हो तो चुनौतियों को स्वीकार कर उन पर विजय पाना भी आवश्यक है। 'उठो! / निराशा का दुष्चक्र  तोड़ो / मन स्थिर करने की खातिर / रुख तूफान का भी मोड़ो / ...कर्म करो, फल ईश्वर पर छोड़ो / रखो एक आँख पर पूरा ध्यान।' कहती कवियित्री पाठक के लिए प्रेरणास्रोत बनती है।


                     ह क की बात करनेवाले प्राय: फर्ज को भूल जाते हैं। कवि सत्य-दृष्टा होता है। वह अपना धर्म कैसे भूल सकता है? 'सब अनिश्चित है / कुछ निश्चित है / तो केवल कर्म। / विश्वासयोग्य है / शरण उसी की। / करो हमेशा / वरण उसी का / कर्म का ही सम्मान / मार्ग का ही ध्यान / धुन स्वयं पर करो सवार / जाने को पार / हर बाधा पर कड़ा प्रहार / हुई हार तो हेतु को / ढूँढ निकालो, दूर करो / औरों की क्षमता मत देखो / अपनी अक्षमता दूर करो।'


                     स मस्याएँ सभी के जीवन में आती हैं। साहित्यिकार अपनी नहीं, सबकी समस्याओं का समाधान सृजन के माध्यम से खोजता है। 'समस्याओं का समाधान / ढूँढना हमें ही होगा / समस्या से भागकर या / सीधे समाधान ढूँढकर नहीं / अपने भीतर जाकर / गहराई में / गहन अवचेतन में।/ समस्या की जड़ क्या है? / क्यों हम औरों से ज्यादा टूटते हैं? / आहत होते हैं? / हमें अपना ही / सामना करना होगा / जो हम अमूमन नहीं करना चाहते।'

                     दा सता सिर्फ शारीरिक नहीं, मानसिक भी होती है। साहित्य-सृजन कर सत्-शिव-सुंदर की आराधना करते समय रचनाकार 'अवचेतन' में 'स्व'  से 'सर्व' तक की यात्रा करता है। 'चेतन मन के साथ / अवचेतन मन को साधना / अवचेतन की शक्ति पहचानना / व्यवस्थित जीवन / एवं मनोदशा हेतु जरूरी है / अवचेतन चुंबक है / जो गहन पसंद की चीजों / को खींचता है। / इस मैग्नेट को हमेशा / चार्ज करना होता है.... अवचेतन से संवाद करो / गहरी से गहरी पीड़ा / वहाँ व्यक्त करो / और उस अंतहीन आकाश में / मौन, खुद को बहने दो / सारे भार गिरा दो / कालचक्र को चलने दो / और तब, अवचेतन, अर्द्ध जागृत मन / राह जरूर दिखाएगा / जो सर्वोत्तम राह होगी।'

                     खु द का खुदा से साक्षात् कराने का श्रेष्ठ माध्यम प्रकृति ही है। 'सुहानी सुबह / अलसाई सी / सूरज की किरणों से / उषा है नहाई सी / धुला सा आसमान / जहाँ-तहाँ उड़ते बादल / पंछियों के कलरव / गिलहरी की अठखेलियाँ / धवल अनोखी / निष्कपट हरियाली / पत्तों के बीच से निकलती / हवा की मंद सरसराहट / अति नीरव / अति शांत / प्रकृति जैसे छेड़ देती / अपनी विशालता का / विराटता का / अनुपम संगीत / मानो कण-कण / उल्लसित होकर / नृत्य कर रहे हों / मानो परम देव की प्रस्तुत / झलक कर रहे हों।'

                     श को-सुबह की 'भंवर' जिंदगी के 'समंदर' में तूफान उठाती रहती है। यदि विश्वास का लंगर मजबूत न हुआ तो हक़ीक़त की दुनिया को 'यादों का संसार' बनते देर नहीं लगती। 'मेरे पास तुम्हारी / यादें हैं / सांसें हैं अपनी / पर प्राण शक्ति नहीं / धड़कन है / पर जिंदगी नहीं / अनजाना सा अपनापन / रूहानी अहसासों का / खूशबू बनकर / फिजाओं में घुल गया है / तुम यहीं हो / यहीं कहीं हो / पर नजर नहीं आते / आ भी नहीं सकते।'

                     र स वर्षण साहित्य और साहित्यकार का धर्म है। 'जीवन टूटकर जुड़ता है / आँधी के अनगिनत थपेड़ों से / लड़कर जीतता है।' ... लक्ष्य का 'ध्रुवतारा' आँखों से ओझल न हो इसलिए 'दर्द के काँटों से / घायल मन... आस्था का मलहम' लगाकर 'बहल जाता है / बस यूँ  ही दर्द से / उबर आता है और तब 'जिजीविषा' कहती है- मैं ;एक चिड़िया की तरह / अंतहीन आकाश में / बंदिशों के बिना / उड़ना चाहती हूँ / पंख पसारे/ अपने सहारे / अपनी ही दुनिया में / विचरना चाहती हूँ / अब मैं जीना चाहती हूँ।'

                     हि तकर होना साहित्य का लक्षण और उद्देश्य दोनों है। जिसमें सबका हित समाहित हो वही सच्चा साहित्य है। सूर्यमंजरी की कविताएँ व्यक्ति हित और लोक हित ही नहीं मानव हित और जीव हित को भी ध्यान में रखकर रची गयी हैं। यह स्वाभाविक भी है। जब जब मानवीय मनीषा 'सुनीता' हो तो सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय' की सनातन विरासत को ग्रहण मात्र नहीं करती अपितु अगली पीढ़ी के लिए मूल्य सम्मत साहित्य की रचनाकार समृद्ध और सुरक्षित भी करती है। संतोष यह कि उच्च प्रशासनिक पद भी सुनीता की संवेदनाओं को पाषाण-सिला नहीं बना सका है। वह नियमोपनियमों के कठघरे में कैद रहकर कार्यरत रहते हुए भी स्वतंत्र चेता मानसी बनी रह सकी हैं। ये कवितायें भी भाषा, कथ्य और शिल्प के स्तर पर सामान्य नियमों का पालन करते हुए भी प्रकृति के निरीक्षण-परीक्षण पश्चात् निष्कर्ष निकालकर अभिवयक्त करने में 'स्व-विवेक को ही सर्वोपरि मानती हैं। सुनीता का मौलिक चिंतन उन्हें अपनी पीढ़ी और संवर्ग से अलग पहचान देता है। 'कहते हैं कि  ग़ालिब का है अंदाज़े-बयान और' की उक्ति इन कविताओं पर लागू होती है। 

                     'ए कोsहं बहुस्याम' का ब्रम्ह सूत्र साहित्य-सृजन के मूल में होता है। रचनाकार अपनी विचार-सृष्टि का ब्रम्हा होता है। वह अपने विचार प्रस्तुत कर अपने वैचारिक सहधर्मी पाता है। प्रिय सुनीता की यह प्रथम काव्य कृति मुझे अपने कुल-गोत्र के बढ़ने की प्रतीति करा रही है। रचनाकर 'व्यक्ति' होते हुए भी 'समष्टि' के हित-चिन्तन के उद्देश्य से रचनाकर्म में प्रवृत्त होता है। इस रचनाओं का वैशिष्ट्य उनकी सरलता, सहजता, सरसता, सारगर्भितता, सोद्देश्यता, स्पष्टता तथा यथार्थता है। प्रसाद गुण संपन्न ये कविताएँ छंद मुक्त होते हुए भी नीरस, उबाऊ या जटिल नहीं हैं। ये रचनाएँ किसी पंथ, विचारधारा, या वाद के पूर्वाग्रहों से मुक्त वैचारिक ताजगी से समृद्ध हैं। छंद मुक्ति और छंद युक्ति की सीमा रेखा को स्पर्श करती ये रचनाएँ रस व लय की प्रतीति करा सकी हैं।कवयित्री सुशिक्षित, समझदार, प्रशासनिक व सामाजिक अनुभव-संपन्न है। इससे परिस्थितियों के आकलन तथा विचारों की संतुलित अभिव्यक्ति में उन्हें सफलता मिली है। इन रचनाओं के सृजनकर्ता होते हुए वे लिंग, जाति, धर्म आदि पूर्वाग्रहों से मुक्त रहकर 'व्यक्ति' हो सकी हैं।  इस कारण कविता में अन्तर्निहित विचार स्वाभाविक रूप से विकसित होकर परिणति तक जा पाते हैं। मुझे आशा ही नहीं विश्वास है कि ये कवितायेँ सामान्य और विशिष्ट दोनों वर्गों में पढ़ी, समझी और सराही जाएँगी। ये रचनाएँ कवयित्री सुनीता की पहचान ही नहीं प्रतिष्ठा की भी परिचायक बनकर उनकी गली कृतियों की प्रतीक्षा करता पाठक वर्ग तैयार कर सकेंगी। 
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