सोमवार, 26 फ़रवरी 2018

doha

दोहा सलिला
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कालीपद में मुक्ति है, मत होना मन दूर
श्वास-श्वास बजता रहे, आसों का संतूर
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लता-कुञ्ज में बैठकर, दोहा रच ले एक
हों प्रसन्न माँ शारदा, जाग्रत करें विवेक
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इन्द्रप्रस्थ में आ बसे, सुरपुर छोड़ सुरेश
खोज रहे सुर हैं कहाँ, छिपे भाग देवेश?
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ट्रस्टीशिप सिद्धांत लें, पूँजीपति यदि सीख
सबसे आगे सकेगा, देश हमारा दीख
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लोकतंत्र में जब न हो, आपस में संवाद
तब बरबस आते हमें, गाँधी जी ही याद
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क्या गाँधी के पूर्व था, क्या गाँधी के बाद?
आओ! हम आलकन करें, समय न कर बर्बाद
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आम आदमी सम जिए, पर छू पाए व्योम
हम भी गांधी को समझ, अब हो पाएं ओम
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कहें अतिथि की शान में, जब मन से कुछ बात
दोहा बनता तुरत ही, बिना बात हो बात
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समय नहीं रुकता कभी, चले समय के साथ
दोहा साक्षी समय का, रखे उठाकर माथ
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दोहा दुनिया का सतत, होता है विस्तार
जितना गहरे उतरते, पाते थाह अपार
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