शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2018

शिव दोहावली

शिव भौतिकता से परे,
आध्यात्मिक अनुभूति।
अंतर्मन में ऋषि करें,
मूंदे नयन प्रतीति।।
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शिवा न नारी देह हैं,
योनि नहीं देहांग।
सत्-रज-तम का समन्वय,
शिव की शक्ति शुभांग।।
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शिव ऊर्जा हो अपरिमित,
कर सकती जग-नाश।
शिवा शांत-संतुलित कर,
रोकें विहंस विनाश।।
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जो करता संदेह, वह
खोता निज विश्वास।
जो खोता विश्वास वह,
गंवा रहा सुख-श्वास।।
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नारी भोग न भोगती,
खोती शुचिता-मान।
नर भोग्या का भोग हो,
पाता है अपमान।।
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जब प्रवृत्ति हो उग्र तो,
हो निवृत्ति से शांत।
कांति न कांता बिन मिले,
कांता-कांति सुकांत।।
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प्रेम अकाम सुवर्ण सा,
दें-पाएं निष्काम।
हों विदेह संदेह तज,
हो सहाय विधि वाम।।
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नहीं देह के अंग हैं,
लिंग-योनि हैं तत्व।
तत्व लीन हो इंद्रियां,
अनुभव करतीं सत्व।।
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हर्षित ऋषि-ऋषिपत्नियां,
हाटकेश-जय बोल।
तप्त स्वर्ण की कांति सा,
सत् श्वासों में घोल।।
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२.२.२०१८, जबलपुर

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