सोमवार, 29 सितंबर 2014

muktak:

मुक्तक :

बदलता करवट समय है
मेहनती इंसां अभय है
बेचता जो चाय इस पल
महानायक वह अजय है
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गुणग्राहक मिल जायेंगे
शत्रु स्वयं हिल जायेंगे
मन में दृढ़ संकल्प कर-
फूल अगिन खिल जायेंगे 
*
ऊँचाई पा भूल मत किंचित अपना मूल
तभी फूल पा सकेगा वरना चुभते शूल
नेकनीयत ले जो बढ़े उसे मिले मुस्कान
बदनीयत को मित्र भी लगता शत्रु समान
*
करी भूल तो सजा भी, तेरा ही है प्राप्य
आज नहीं तो कल मिले, कब तक रहे अप्राप्य
सजा मिले तो झेल ले, प्रभु की इच्छा मान
भोग कर्म फल है नहीं इसका अन्य निदान
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