दिव्य नर्मदा : हिंदी तथा अन्य भाषाओँ के मध्य साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक संपर्क हेतु रचना सेतु A plateform for literal, social, cultural and spiritual creative works. Bridges gap between HINDI and other languages, literature and other forms of expression.
कुल पेज दृश्य
गुरुवार, 12 मार्च 2009
प्रो. वीणा तिवारी
कभी-कभी
कभी-कभी ऐसा भी होता है
कोई अक्स, शब्द
या वाक्य का टुकडा
रक्त में घुल-मिल जाता है।
फ़िर उससे बचने को
कनपटी की नस दबाओ
उँगलियों में कलम पकडो
या पाँव के नाखून से
धरती की मिट्टी कुरेदो
वह घड़ी की टिक-टिक-सा
अनवरत
शिराओं में दौड़ता-बजता रहता है।
-कभी ऐसा क्यों होता है?
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क्या-क्यों?
क्या हो रहा है?
क्यों हो रहा है?
इस 'क्या' और 'क्यों' को
न तो हम जानना चाहते हैं
न ही जानकर मानना
बल्कि प्रश्न के भय से
उत्तर की तरफ पीठ करके
सारी उम्र नदी की रेत में
सुई तलाशते हैं.
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मन
दूसरों की छोटी-छोटी भूलें
आँखों पर चढी
परायेपन की दूरबीन
बड़े-बड़े अपराध दिखाती है
जिनकी सजा फांसी भी कम लगती है
अपनों की बात आने पर ये मन
भुरभुरी मिट्टी बन जाता है
जिसमें वह अपराध कहीं भीतर दब जाता है.
फिर सजा का सवाल कहाँ रह जाता है?
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बसंतोत्सव पर विशेष
श्री जयदेव रचित गीत गोविन्द
महीयसी महादेवी वर्मा
छाया सरस बसंत विपिन में,
करते श्याम विहार.
युवती जनों के संग रास रच
करते श्याम विहार.
ललित लवंग लताएँ छूकर
बहता मलय समीर।
अली संकुल पिक के कूजन से
मुखरित कुञ्ज कुटीर.
विरहि जनों के हित दुरंत
इस ऋतुपति का संचार.
करते श्याम विहार.
जिनके उर में मदन जगाता
मदिर मनोरथ-भीर.
वे प्रोशितपतिकाएं करतीं
करूँ विलाप अधीर.
वकुल निराकुल ले सुमनों पर
अलिकुल का संभार.
करते श्याम विहार.
मृगमद के सौरभ सम सुरभित
नव पल्लवित तमाल,
तरुण जनों के मर्म विदारक
मनसिज नख से लाल-
किंशुक के तरु jaal कर रहे
फूलन से श्रृंगार.
करते श्याम विहार.
राजदंड स्वर्णिम मनसिज का
केशर-कुसुम-vikas
समर तूणीर बना है पाटल
लेकर भ्रमर-विलास.
करता है ऋतुपति दिगंत में
बासंती विस्तार.
करते श्याम विहार.
विगलित-लज्जा जग सता है
तरुण करूँ उपहास,
कुंतामुखाकृतिमयी केतकी
फूल रही सोल्लास,
विरहिजनों के ह्रदय निकृन्तन
में जो है दुर्वार.
करते श्याम विहार.
ललित माधव परिमल से,
मल्लिका सुमन अभिराम,
मुनियों का
मन भी कर देता
यह ऋतुराज सकाम,
बंधु अकारण यह तरुणों का
आकर्षण-अगर.
करते श्याम विहार.
भेंट लता अतिमुक्त, मंजरित
पुलकित विटप रसाल
तट पर भरा हुआ यमुनाजल
रहा जिसे प्रक्षाल,
वह वृन्दावन पूत हो रहा
पा अभिषेक उदार.
करते श्याम विहार.
इसमें है श्रीकृष्ण-चरण की
मधु स्मृतियों का सार,
मधुर बसन्त-कथा में मन के
भाव मदन-अनुसार
श्री जयदेव-रचित रचना यह
शब्दों में साकार।
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लक्ष्मी शर्मा
एक विभ्रम में
शायद शब्द कुछ बन पाते
हो पाते साकार
इसके पूर्व ही
एक विभ्रम में
बिखर गए शब्द
हो गए निराकार.
और कागज़ के स्थान पर
निरंतर
छपते रहे
मस्तिष्क के पटल पर.
चलता रहा यह अनवरत क्रम
और बनते -गिरते रहे
लगातार
बार-बार
बार-बार
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रूपांतरण
वक़्त को
ओढ़कर
सो गयी मैं.
कई वर्ष बीत गए,
जब जागी अपनी निद्रा से
तो उस अन्तराल को देखकर
आश्चर्यचकित रह गयी.
बड़ा आश्चर्य हुआ,
इस बीच जो कुछ
मैंने देखा
वह स्वप्न सरीखा था।
मोरपंखी,
रंग-बिरंगे-
कई चित्र
मुझे लगा
इस अन्तराल ने
मुझे
दो व्यक्तित्वों में बदल दिया है।
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अनवरत क्रम
स्वप्निल आँखों में
एकाकीपन
और अधिक गहराने लगता है।
चारों ओर
वीरानगी नजर आती है।
गुजरती हवाएं
कचोटती सी लगती हैं।
अपना ही साया
हो गया है बेगाना
सब कुछ
खोया-खोया सा
महसूस होता है.
सूरज के उगने से
लेकर
चाँद के ढलने तक
अनवरत चलता है यह क्रम
झोली भर सुख की तलाश में
प्रतीक्षारत हूँ मैं।
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रविवार, 8 मार्च 2009
खूनी हस्ताक्षर
कवि: गोपाल प्रसाद व्यास
वह खून कहो किस मतलब का, जिसमें उबाल का नाम नहीं।
वह खून कहो किस मतलब का, आ सके देश के काम नहीं।
वह खून कहो किस मतलब का, जिसमें जीवन, न रवानी है!
जो परवश होकर बहता है, वह खून नहीं, पानी है!
उस दिन लोगों ने सही-सही, खून की कीमत पहचानी थी।
जिस दिन सुभाष ने बर्मा में, मॉंगी उनसे कुरबानी थी।
बोले, स्वतंत्रता की खातिर, बलिदान तुम्हें करना होगा।
तुम बहुत जी चुके जग में, लेकिन आगे मरना होगा।
आज़ादी के चरणें में जो, जयमाल चढ़ाई जाएगी।
वह सुनो, तुम्हारे शीशों के, फूलों से गूँथी जाएगी।
आजादी का संग्राम कहीं, पैसे पर खेला जाता है?
यह शीश कटाने का सौदा, नंगे सर झेला जाता है"
यूँ कहते-कहते वक्ता की, ऑंखें में खून उतर आया!
मुख रक्त-वर्ण हो दमक उठा, दमकी उनकी रक्तिम काया!
आजानु-बाहु ऊँची करके, वे बोले,"रक्त मुझे देना।
इसके बदले भारत की, आज़ादी तुम मुझसे लेना।"
हो गई उथल-पुथल, सीने में दिल न समाते थे।
स्वर इनकलाब के नारों के, कोसों तक छाए जाते थे।
"हम देंगे-देंगे खून", शब्द बस यही सुनाई देते थे।
रण में जाने को युवक खड़े, तैयार दिखाई देते थे।
बोले सुभाष," इस तरह नहीं, बातों से मतलब सरता है।
लो, यह कागज़, है कौन यहॉं, आकर हस्ताक्षर करता है?
इसको भरनेवाले जन को, सर्वस्व-समर्पण काना है।
अपना तन-मन-धन-जन-जीवन, माता को अर्पण करना है।
पर यह साधारण पत्र नहीं, आज़ादी का परवाना है।
इस पर तुमको अपने तन का, कुछ उज्जवल रक्त गिराना है!
वह आगे आए जिसके तन में, भारतीय ख़ूँ बहता हो।
वह आगे आए जो अपने को, हिंदुस्तानी कहता हो!
वह आगे आए, जो इस पर, खूनी हस्ताक्षर करता हो!
मैं कफ़न बढ़ाता हूँ, आए, जो इसको हँसकर लेता हो!"
सारी जनता हुंकार उठी- हम आते हैं, हम आते हैं!
माता के चरणों में यह लो, हम अपना रक्त चढ़ाते हैं!
साहस से बढ़े युबक उस दिन, देखा, बढ़ते ही आते थे!
चाकू-छुरी कटारियों से, वे अपना रक्त गिराते थे!
फिर उस रक्त की स्याही में, वे अपनी कलम डुबाते थे!
आज़ादी के परवाने पर, हस्ताक्षर करते जाते थे!
उस दिन तारों ना देखा था, हिंदुस्तानी विश्वास नया।
जब लिखा था महा रणवीरों ने, ख़ूँ से अपना इतिहास नया।
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शक्ति और क्षमा !
कवि: रामधारी सिंह "दिनकर"
क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल, सबका लिया सहारा
पर नर व्याघ सुयोधन तुमसे, कहो कहाँ कब हारा?
क्षमाशील हो ripu -सक्षम, तुम हुये विनीत जितना ही
दुष्ट कौरवों ने तुमको, कायर समझा उतना ही
क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल है
उसका क्या जो दंतहीन, विषरहित विनीत सरल है
तीन दिवस तक पंथ मांगते, रघुपति सिंधु किनारे
बैठे पढते रहे छन्द, अनुनय के प्यारे प्यारे
उत्तर में जब एक नाद भी, उठा नही सागर से
उठी अधीर धधक पौरुष की, आग राम के शर से
सिंधु देह धर त्राहि-त्राहि, करता आ गिरा शरण में
चरण पूज दासता गृहण की, बंधा मूढ़ बन्धन में
सच पूछो तो शर में ही, बसती है दीप्ति विनय की
संधिवचन सम्पूज्य उसीका, जिसमे शक्ति विजय की
सहनशीलता, क्षमा, दया को, तभी पूजता जग है
बल का दर्प चमकता उसके, पीछे जब जगमग है !
गुरुवार, 5 मार्च 2009
पारस नाथ मिश्र, शहडोल
सफ़र भी खूबसूरत है चलो तुम भी,
शहसवारों की जरूरत है चलो तुम भी।
व्यावहारिक दक्षता कब काम आयेगी?
पाँव पड़ने का मुहूरत है चलो तुम भी।
गीत
पारस नाथ मिश्र, शहडोल
माटी का आकर बना है,
माटी का आधार बना है।
फिर क्यों प्यार न हो माटी से-
माटी का संसार बना है...
माटी के उत्तान महल ये,
माटी की औंधी झोपडियां।
माटी डाल गयी माटी के-
हाथों में बलात हथकडियां।
माटी की छाया में, माटी की-
मूरत शहीद होती है।
माटी के हाथों, माटी की-
नित माटी पलीद होती है.
माटी के क्रेता-विक्रेता
माटी का व्यापार बना है...
यद्यपि माटी के दीपक पर
माटी का पतंग जल जाता।
फिर भी शाश्वत रहा विश्व में,
माटी से माटी का नाता।
माटी अमृत और ज़हर भी,
माटी अमर और नश्वर भी।
युग-युग का विप्लव है माटी,
कल्प-कल्प का शांत समर भी.
माटी सृजन, सतत शाश्वत पर
माटी पर संहार पला है..
माटी का प्रणयी मिटता,
माटी की परिणीता के पीछे।
माटी का भगवान् भटकता,
माटी की सीता के पीछे।
माटी का मसीह, माटी को
चूम-चूम चन्दन कर जाता।
माटी का रसूल माटी ले,
माटी का कुरान रच जाता.
माटी के चरणों की रज ले,
माटी का पाषाण तरा है...
मैं माटी का बुला रहा हूँ,
कोइ माटी का आ जाए।
माटी पहचाने माटी को,
माटी को माटी पा जाए।
माटी का पुतला है साकी,
माटी का ही पीने वाला।
माटी पर ही मर मिटाता है,
हर माटी का जीने वाला.
साकी माटी के प्याले में,
माटी का ही सार भरा है,
फिर क्यों प्यार न हो माटी से
माटी का संसार बना है...
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गीत
लज्जा
अवध प्रताप शरण
एक शाम खजुराहो की निर्वसना नारी
से कर बैठा प्रश्न एक अनजान अनाडी.
नारी का तो लज्जा ही भूषण है देवी.
तुमने चोली-लाज तजी, किसको दी साडी?
उत्तर में मुस्काई मधुर आर्या-प्रतिमा,
बोली-भद्र! तुम्हारा प्रश्न अरण्य-रुदन है.
लज्जा तो आवरण पुरुष ने डाला मुझ पर-
नग्न, सत्य, शाश्वत है और चिरंतन है.
नग्न न थी तो कलाकार ने नग्न कर दिया.
नग्न हुई तो कलाकार ने नयन ढँक लिए.
नग्न मूर्ति के कलाकार को मिली प्रशंसा-
नग्न मूर्ति ने दृष्टि, व्यंग,आक्षेप सह लिए.
दुर्बलता ताकत श्रृद्धा नर की नारी है,
उसे वासना-ममता की कठपुतली लगती.
सहनशीलता ही नारी का सच्चा गुण है.
मान या कि अपमान मौन हो सह लेती है.
मुझे कला की संज्ञा देकर नग्न किया है.
कलाकार ही मुझे बताये कला कहाँ है?
नेत्र, अधर, भ्रू, पग, सिर रहते नग्न सदा ही-
और कौन सा अंग कलामय यहाँ ढला है?
दूर देश से कई पर्यटक आते रहते.
मुझको कहते मूर्ति कला का अजब नमूना.
सत्य अजब हूँ, यही भारतीयों का कहना-
लाजवती भारत की नारी पर तन सूना.
नित्य सहस्त्राधिक पुरुषों के सम्मुख होकर
यह विवस्त्र तन लज्जित होकर दिखलाती हूँ.
नग्न किया, तन देखो फिर खुद ही शरमाओ
माँ भगिनी मैं सुता लाज से गड जाती हूँ.
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गीत
विशाल देश का अन्तस्
अवध प्रताप शरण
अंधी गलियाँ, मूक डगर,
उजडे गाँव-विवस्त्र शहर।
महानगर में शीत लहर.
अनगिनती शव किये शीत ने
कितनी लोई?, कितने कम्बल?...
नत मस्तक लाचार नयन,
भूख अधिक कम है राशन।
अश्रुगैस-डंडा शासन
अनगिन पेट कलपते भूखे
कितना गेहूं?, कितना चांवल?...
लाखों अंधे, लाखों लूले।
लाखों पिचके, लाखों फूले।
अपाहिजों से खूब वसूले?
लुप्त दावा, परिचारक रूठे
कितने रोगी?, कितने घायल?...
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रविवार, 1 मार्च 2009
ज्ञानार्जन को अंकों के मापदण्ड पर उतारना
विवेक रंजन श्रीवास्तव
सी ६ , विद्युत मंडल कालोनी , रामपुर , जबलपुर म.प्र.
परीक्षा जीवन की एक अनिवार्यता है . परीक्षा का स्मरण होते ही याद आती है परीक्षा की शनैः शनैः तैयारी . निर्धारित पाठ्यक्रम का अध्ययन , फिर परीक्षा में क्या पूछा जायेगा यह कौतुहल , निर्धारित अवधि में हम कितनी अच्छी तरह अपना उत्तर दे पायेंगे यह तनाव . परीक्षा कक्ष से बाहर निकलते ही यदि कुछ समय और मिल जाता या फिर अगर मगर का पछतावा ..और फिर परिणाम घोषित होते तक का आंतरिक तनाव . परिणाम मिल जाने पर भी असंतुष्टि या पुनर्मूल्यांकन की चुनौती ..हम सब इस प्रक्रिया से किंचित परिवर्तन के साथ कभी न कभी कुछ न कुछ मात्रा में तनाव सहते हुये गुजरे ही है . टी वी के रियल्टी शोज में तो इन दिनों प्रतियोगी के सम्मुख लाइव प्रसारण में ही उसे सफल या असफल घोषित करने की परंपरा चल निकली है .. परीक्षा और परिणाम के इस स्वरूप पर प्रतियोगी की दृष्टि से सोचकर देखें .
सामान्यतः परीक्षा लिये जाने के मूल उद्देश्य व दृष्टिकोण को हममें से ज्यादातर लोग सही परिप्रेक्ष्य में समझे बिना ही येन केन प्रकारेण अधिकतम अंक पाना ही परीक्षा का उद्देश्य मान लेते हैं . और इसके लिये अनुचित तौर तरीकों के प्रयोग तक से नही हिचकिचाते . या फिर असफल होने पर आत्महत्या जेसे घातक कदम तक उठा लेते हैं .
प्रश्न है कि क्या परीक्षा में ज्यादा अंक पाने मात्र से जीवन में भी सफलता सुनिश्चित है ? जीवन की अग्नि परीक्षा में न तो पाठ्यक्रम निर्धारित होता है और न ही यह तय होता है कि कब कौन सा प्रश्न हल करना पड़ेगा ? परीक्षा का वास्तविक उद्देश्य मुल्यांकन से ज्ञानार्जन हेतु प्रोत्साहित करना होता है . जीवन में सफल वही होता है जो वास्तविक ज्ञानार्जन करता है न कि अंक मात्र प्राप्त कर लेता है . यह तय है कि जो तन्मयता से ज्ञानार्जन करता है वह परीक्षा में भी अच्छे अंक अवश्य पाता है . अतः जरूड़ी है कि परीक्षा के तनाव में ग्रस्त होने की अपेक्षा शिक्षा व परीक्षा के वास्तविक उद्देश्य को हृदयंगम किया जावे , संपूर्ण पाठ्यक्रम को अपनी समूची बौद्धिकता के साथ गहन अध्ययन किया जावे व तनाव मुक्त रहकर परीक्षा दी जावे . याद रखें कि सफलता कि शार्ट कट नही होते . परीक्षा का उद्देश्य ज्ञानार्जन को अंकों के मापदण्ड पर उतारना मात्र है . ज्ञानार्जन एक तपस्या है . स्वयं पर विश्वास करें . विषय का मनन चिंतन , अध्ययन करें , व श्रेष्ठतम उत्तर लिखें , परिणाम स्वयमेव आपके पक्ष में आयेंगे .
विवेक रंजन श्रीवास्तव

फागुनी दोहे आचार्य संजीव 'सलिल'
फागुनी दोहे
आचार्य संजीव 'सलिल'
संजिव्सलिल।ब्लागस्पाट.कॉम / दिव्य नर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम
दूरभाष: ०७६१ २४१११३१ / चलभाष: ९४२५१ ८३२४४
महुआ महका, मस्त हैं पनघट औ' चौपाल।
बरगद बब्बा झूमते, पत्ते देते ताल।
सिंदूरी जंगल हँसे, बौराया है आम।
बौरा-गौरा साथ लख, काम हुआ बेकाम।
पर्वत का मन झुलसता, तन तपकर अंगार।
वसनहीन किंशुक सहे, पञ्च शरों की मार। ।
गेहूँ स्वर्णाभित हुआ, कनक-कुञ्ज खलिहान।
पुष्पित-मुदित पलाश लख, लज्जित उषा-विहान।
बाँसों पर हल्दी चढी, बंधा आम-सिर मौर,
पंडित पीपल बांचते, लगन पूछ लो और।
तरुवर शाखा पात पर, नूतन नवल निखार।
लाल गाल संध्या किये, दस दिश दिव्य बहार।
प्रणय-पंथ का मान कर, आनंदित परमात्म।
कंकर में शंकर हुए, प्रगट मुदित मन-आत्म।
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शनिवार, 28 फ़रवरी 2009
ॐ
दोहा संसार
आचार्य संजीव "सलिल"
संपादक दिव्य नर्मदा
sanjivsalil।blogspot.com / sanjivsalil.blog.co.in
अनिल अनल भू नभ सलिल, पञ्च तत्वमय देह
आत्म मिले परमात्म में, तब हो देह विदेह
जन्म ब्याह राखी तिलक, ग्रह प्रवेश त्यौहार
सलिल बचा पौधे लगा, दें पुस्तक उपहार
चित्त-चित्त में गुप्त हैं, चित्रगुप्त परमात्म
गुप्त चित्र निज देख ले, तभी धन्य हो आत्म
शब्द-शब्द अनुभूतियाँ, अक्षर-अक्षर भाव
नाद , थाप, सुर, ताल से, मिटते सकल अभाव
सलिल साधना स्नेह की, सच्ची पूजा जान
प्रति पल कर निष्काम तू, जीवन हो रस-खान
उसको ही रस-निधि मिले, जो होता रस-लीन
पान न रस का अन्य को, करने दे रस-हीन
कहो कहाँ से आए हैं, कहाँ जायेंगे आप
लाये थे, ले जाएँगे, सलिल पुण्य या पाप
जितना पाया खो दिया, जो खोया है साथ
झुका उठ गया, उठाया झुकता पाया माथ
साथ रहा संसार तो, उसका रहा न साथ
सबने छोड़ा साथ तो, पाया उसको साथ
नेह-नर्मदा सनातन, सलिल सच्चिदानंद
अक्षर की आराधना, शाश्वत परमानंद
सुधि की गठरी जिंदगी, सांसों का आधार
धीरज धरकर खोल मन, लुटा-लूट ले प्यार ।
स्नेह साधना जो करे, नित मन में धर धीर ।
।। इस दुनिया में है नहीं, उससे बड़ा अमीर ।।
। नेह मर्मदा में नहा, तरते तन मन प्राण ।
।। कंकर भी शंकर बने, जड़ भी हो संप्राण ।।
। कलकल सलिल प्रवाह में, सुन जीवन का गान ।
।। पाशाणों को मोम कर, दे॑ दे कर मुस्कान ।।
। लहरों के संग खेलती, हँस सूरज की धूप ।
।। देख मछलियाँ नाचतीं, रश्मिरथी का रूप ।।
। बैठो रेवा तीर पर, पंकिल पैर पखार ।
।। अँजुरी में लेकर "सलिल", लो निज रूप निहार ।।
। कर सच से साक्षात मन, हो जाता है संत ।
।। भुला कामना कामिनी, हो चिंता का अंत ।।
। जो मिलता ले लुटाती, तिनका रखे न पास ।
।। निर्मल रहती नर्मदा, सबको बाँट हुलास ।।
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प्रेषक: आचार्य संजीव 'सलिल', संपादक दिव्य नर्मदा ई मेल; सलिल.संजीव@जीमेल.कॉम वार्ता: ०७६१२४१११३१ / ९४२५१ ८३२४४
राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद
साहित्यिक पुरस्कार २००८ परिणाम घोषित
मंगलवार, 24 फ़रवरी 2009
salil.sanjiv@gmail.com
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sanjivsalil.blog.in.com
१.
ताज़ा-ताज़ा दिल के घाव।
सस्ता हुआ नमक का भाव.
मंझधारों-भंवरों को पार
किया किनारे डूबी नाव।
सौ चूहे खाने के बाद
सत्य-अहिंसा का है चाव।
ताक़तवर के चूम कदम
निर्बल को दिखलाया ताव।
ठण्ड भगाई नेता ने
जला झोपडी, बना अलाव।
डाकू तस्कर चोर खड़े
मतदाता क्या करे चुनाव?
नेता रावण, जन सीता
कैसे होगा सलिल निभाव?
*******
२.
दिल ने हरदम चाहे फूल।
पर दिमाग ने बोए शूल.
मेहनतकश को कहें ग़लत
अफसर काम न करते भूल।
बहुत दोगली है दुनिया
नहीं सुहाते इसे उसूल.
तू मत नाहक पैर पटक
सिर पर बैठे उडकर धूल.
बना तीन के तेरह लें
चाहा , डुबा दिया धन मूल.
मंझधारों में विमल 'सलिल'
गंदा करते तुम जा कूल.
धरती पर रख पैर जमा
'सलिल' न दिवा स्वप्न में झूल.
*******
३.
खर्चे अधिक, आय है कम
दिल रोता, आँखें हैं नम.
पाला शौक तमाखू का
बना मौत का फंदा यम्.
जो करता जग उजियारा
उसी दीप के नीचे तम.
सीमाओं की फ़िक्र नहीं
ठोंक रहे संसद में खम.
जब पाया तो खुश न हुए,
खोया तो करते क्यों गम?
टन-टन रुचे न मन्दिर की
कोठे की रुचती छम-छम.
वीर bhogyaa वसुंधरा
'सलिल' रखो हाथों में दम.
४.
मार हथौडा तोड़ो मूरत।
बदलेगी तब ही यह सूरत.
जिसे रहनुमा माना हमने
करी देश की उसने दुर्गत.
आरक्षित हैं कौए-बगुले
कोयल-राजहंस हैं रुखसत.
तिया सती पर हम रसिया हों
मन में है क्यों कुत्सित चाहत?
खो शहरों की चकाचौंध में
किया गाँव का बेडा गारत.
क्षणजीवी सुख मोह रहा है
रुचे न शाश्वत दिव्य विरासत.
चलभाषों का चलन अनूठा
'सलिल' न कासिद और नहीं ख़त.
*******
५.
सागर ऊंचा पर्वत गहरा
अँधा न्याय, प्रशासन बहरा.
खुली छूट आतंकवाद को
संत-आश्रमों पर है पहरा.
पौरुष निस्संतान मर रहा
वंश बढाता रक्षित महरा.
भ्रष्ट सियासत देश बेचती
राष्ट्रभक्ति का झंडा लहरा.
शक्ति पूजते, जला शक्ति को
सूखी नदियाँ,रोता सहरा।
राजमार्ग ने वन-गिरि निगले
घन विनाश का नभ में घहरा।
चुल्लू भर सागर में तूफां
सागर का जल ठहरा-ठहरा।
जनसेवक ने जनसेवा का '
सलिल' नहीं क्यों पढ़ा ककहरा?
*******
सोमवार, 23 फ़रवरी 2009
******************************
शिवभक्ति स्तोत्र
राघव ने शिव भक्तिमय, दिया गुंजा स्तोत्र।
शिव भक्तों का एक ही होता है कुल-गोत्र।।
डम-डम, डिम-डिम नाद सुन, कांपे निशिचर-दुष्ट।
बम-बम-भोले नाचते, भक्त तुम्हारे तुष्ट।।
प्रलयंकर-शंकर हरे!, हर हर बाधा-कष्ट।
नेत्र तीसरा खोलकर, करो पाप सब नष्ट॥
नाचो-नाचो रुद्र हे!, नर्मदेश ओंकार।
नाद-ताल-सुर-थाप का, रचो नया संसार॥
कार्तिकेय!-विघ्नेश्वर!, जगदम्बे हो साथ।
सत-शिव-सुंदर पर रखो, दया दृष्टिमय हाथ॥
सदय रहो सलिलेश हे!, हरो सकल आतंक।
तोड़ो भ्रष्टाचार का, तीक्ष्ण-विषैला डंक॥
दिक् अम्बर ओढे हुए, हैं शशीश-त्रिपुरारि।
नाश और निर्माण के, देव अटल असुरारि॥
salil।sanjiv@gmail.com / sanjivsalil.blogspot.com
शिवा और शिव पूजकर,हमने तजा असत्य।
योनि-लिंग हैं सृजन के,माध्यम सबको ज्ञात।
आत्म और परमात्म का,नाता क्यों अज्ञात?
गूढ़ सहज ही व्यक्त हो,शिष्ट सुलभ शालीन।
शिव पूजन निर्मल करे,चित्त- न रहे मलीन।
नर-नारी, बालक-युवा,वृद्ध पूजते साथ।
सृष्टि मूल को नवाते, 'सलिल' सभी मिल माथ।
आचार्य संजीव 'सलिल' sanjivsalil.blogspot.comsanjivsalil.blog.co.indivyanarmada.blogspot.com
बंद झरोखा कर दिया
आचार्य संजीव 'सलिल', सम्पादक दिव्या नर्मदासंजीवसलिल.ब्लागस्पाट.कॉम / सलिल.संजीव@जीमेल.कॉम
बंद झरोखा कर दिया
बंद झरोखा कर दिया, अब न सकेगी झाँक।
दूर रहेगी जिंदगी, सच न सकेगी आँक.
मन में मेरे क्या छिपा, पूछ रही आ द्वार।
खाली हाथों लौटती, प्रतिवेशिनी हर बार.
रहे अधूरे आज तक, उसके सब अरमान।
मन की थाह न पा सके, कोशिश कर नादान.
सुन उसकी पदचाप को, बंद कर लिए द्वार।
बैठी हूँ सुख-शान्ति से, उससे पाकर पार.
मुझे पता यदि ले लिया, मैंने उसको साथ।
ख़ुद जैसा लेगी बना, मुझे पकड़कर हाथ.
सुला रही है धारा पर, दिखा गगन का ख्वाब।
बता हसरतों को दिया, ओढे रहो नकाब.
बीच राह में छोड़ दे, करना मत विश्वास।
दे देगी दुःख-दर्द सब, जो हैं उसके खास.
भय न तनिक, रुचता नहीं, मुझको उसका संग।
देखूं खिड़की बंद कर, अमन-चैन के रंग.
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स्वजन तंत्र
राजनीति विज्ञान के शिक्षक ने जनतंत्र की परिभाषा तथा विशेषताएँ बताने के बाद भारत को विश्व का सबसे बड़ा जनतंत्र बताया तो एक छात्र से रहा नहीं गया. उसने अपनी असहमति दर्ज करते हुए कहा- ' गुरु जी! भारत में जनतंत्र नहीं स्वजन तंत्र है.'
' किताब में एसे किसी तंत्र का नाम नहीं है।' - गुरु जी बोले। '
' यह स्वजन तंत्र होता क्या है? यह तो बताओ।' -सहपाठियों ने पूछा। '
' लेकिन यह तो बहुत बड़ी परिभाषा है, याद कैसे रहेगी?' छात्र नेता के चमचे ने परेशानी बताई। '
सोमवार, 16 फ़रवरी 2009
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'' संपादक दिव्य नर्मदा.
संजिव्सलिल.ब्लागस्पाट.कॉम / संजिव्सलिल.ब्लॉग.सीओ.इन / सलिल.संजीव@जीमेल.कॉम
सुनो कहानी चिल्ली की
किसी समय में किसी देश में, एक हुए थे चिल्ली शेख।
सदियाँ गुजर गयीं उन जैसा, दूजा सका न कोई देख।
शोर शरारत नटखटपन के, किस्से कहते लोग अनेक।
कहीं बेवकूफी दिखती है, कहीं झलकता बुद्धि-विवेक।
आओ! सुन किस्सा चिल्ली का, हम अपना मन बहलायें।
'सलिल' न अपना शीश धुनें, कुछ सबक सीख कर मुस्काएं
अफवाहों पर ध्यान न दें
दिन दोपहरी बीच बजरिया, दौड़ रहे थे चिल्ली शेख।
'चल गयी, चल गयी' थे चिल्लाते, लोग चकित थे उनको देख।
रोक रहे सब रुके नहीं थे, पूछे उनसे कैसे?, कौन?
विस्मय शंका भय ने घेरा, बंद दुकानें कर सब मौन।
व्यापारी घबराए पूछें- ' कहाँ चली?, किसने मारी?
कितने मरे बताओ भैया?, किसने की गोलीबारी?'
कौन बताये?, नहीं जानता, कोई कहाँ हुआ है क्या?
पता लगा 'चल गयी' चिल्लाता भगा केवल चिल्ली था।
चिल्ली को सबने जा घेरा, पूछा- 'चल गयी क्यों बोले?'
चिल्ली चुप सकुचाये गुमसुम राज नहीं अपना खोलें।
बार-बार पूछा तो बोले- ' झूठ नहीं सचमुच चल गयी।
बीच बजरिया दिन दोपहरी मेरे ही हाथों चल गयी।
''क्या कहते हो तुमसे चल गयी?, या अल्ला क्या गजब हुआ?'
अब्बा चीखे- 'सिर्फ़ मुसीबत लाता है कमबख्त मुआ।
'चिल्ली चकराए है गडबड, बोले- 'फ़िक्र न आप करें।
चल गयी खोटी आज चवन्नी, यह चिल्लर ले आप धरें।'
बात समझ आए तो सबकी चिंता दूर हुई भारी।
सर धुनते सब वापिस लौटे बात जरा सी दईमारी।
व्यर्थ परेशां हुए आज, अब बिन सच जाने कान न दें।
सबक सिखाया चिल्ली जी ने, अफवाहों पे ध्यान न दें।
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लेख : भवन निर्माण संबन्धी वास्तु सूत्र
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' / संजिव्सलिल.ब्लागस्पाट.कॉम / सलिल.संजीव@जीमेल.कॉम" target=_blank>सलिल.संजीव@जीमेल.कॉम
लेख :
भवन निर्माण संबन्धी वास्तु सूत्र
वास्तुमूर्तिः परमज्योतिः वास्तु देवो पराशिवः
वास्तुदेवेषु सर्वेषाम वास्तुदेव्यम -- समरांगण सूत्रधार, भवन निवेश
वास्तु मूर्ति (इमारत) परम ज्योति की तरह सबको सदा प्रकाशित करती है। वास्तुदेव चराचर का कल्याण करनेवाले सदाशिव हैं. वास्तुदेव ही सर्वस्व हैं वास्तुदेव को प्रणाम. सनातन भारतीय शिल्प विज्ञानं के अनुसार अपने मन में विविध कलात्मक रूपों की कल्पना कर उनका निर्माण इस प्रकार करना कि मानव तन और प्रकृति में उपस्थित पञ्च तत्वों का समुचित समन्वय व संतुलन इस प्रकार हो कि संरचना का उपयोग करनेवालों को सुख मिले, ही वास्तु विज्ञानं का उद्देश्य है.मनुष्य और पशु-पक्षियों में एक प्रमुख अन्तर यह है कि मनुष्य अपने रहने के लिए ऐसा घर बनते हैं जो उनकी हर आवासीय जरूरत पूरी करता है ज्ब्म्क अन्य प्राणी घर या तो बनाते ही नहीं या उसमें केवल रात गुजारते हैं. मनुष्य अपने जीवन का अधिकांश समय इमारतों में ही व्यतीत करते हैं.
एक अच्छे भवन का परिरूपण कई तत्वों पर निर्भर करता है। यथा : भूखंड का आकार, स्थिति, ढाल, सड़क से सम्बन्ध, दिशा, सामने व आस-पास का परिवेश, मृदा का प्रकार, जल स्तर, भवन में प्रवेश कि दिशा, लम्बाई, चौडाई, ऊँचाई, दरवाजों-खिड़कियों की स्थिति, जल के स्रोत प्रवेश भंडारण प्रवाह व् निकासी की दिशा, अग्नि का स्थान आदि। हर भवन के लिए अलग-अलग वास्तु अध्ययन कर निष्कर्ष पर पहुचना अनिवार्य होते हुए भी कुछ सामान्य सूत्र प्रतिपादित किए जा सकते हैं जिन्हें ध्यान में रखने पर अप्रत्याशित हानि से बचकर सुखपूर्वक रहा जा सकता है।
* भवन में प्रवेश हेतु पूर्वोत्तर (ईशान) श्रेष्ठ है। उत्तर, पश्चिम, दक्षिण-पूर्व (आग्नेय) तथा पश्चिम-वायव्य दिशा भी अच्छी है किंतु दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य), पूर्व-आग्नेय, उत्तर-वायव्य तथा दक्षिण दिशा से प्रवेश यथासम्भव नहीं करना चाहिए। यदि वर्जित दिशा से प्रवेश अनिवार्य हो तो किसी वास्तुविद से सलाह लेकर उपचार करना आवश्यक है।
* भवन के मुख्या प्रवेश द्वार के सामने स्थाई अवरोध खम्बा, कुआँ, बड़ा वृक्ष, मोची, मद्य, मांस आदि की दूकान, गैर कानूनी व्यवसाय आदि नहीं हो.
* मुखिया का कक्ष नैऋत्य दिशा में होना शुभ है।
* शयन कक्ष में मन्दिर न हो।
* वायव्य दिशा में कुंवारी कन्याओं का कक्ष, अतिथि कक्ष आदि हो। इस दिशा में वास करनेवाला अस्थिर होता है, उसका स्थान परिवर्तन होने की अधिक सम्भावना होती है।
* शयन कक्ष में दक्षिण की और पैर कर नहीं सोना चाहिए। मानव शरीर एक चुम्बक की तरह कार्य करता है जिसका उत्तर ध्रुव सिर होता है। मनुष्य तथा पृथ्वी का उत्तर ध्रुव एक दिशा में ऐसा तो उनसे निकलने वाली चुम्बकीय बल रेखाएं आपस में टकराने के कारण प्रगाढ़ निद्रा नहीं आयेगी। फलतः अनिद्रा के कारण रक्तचाप आदि रोग ऐसा सकते हैं। सोते समय पूर्व दिशा में सिर होने से उगते हुए सूर्य से निकलनेवाली किरणों के सकारात्मक प्रभाव से बुद्धि के विकास का अनुमान किया जाता है। पश्चिम दिशा में डूबते हुए सूर्य से निकलनेवाली नकारात्मक किरणों के दुष्प्रभाव के कारण सोते समय पश्चिम में सिर रखना मना है।
* भारी बीम या गर्डर के बिल्कुल नीचे सोना भी हानिकारक है।
* शयन तथा भंडार कक्ष सेट हुए न हों।
* शयन कक्ष में आइना रखें तो ईशान दिशा में ही रखें अन्यत्र नहीं।
* पूजा का स्थान पूर्व या ईशान दिशा में इस तरह ऐसा की पूजा करनेवाले का मुंह पूर्व दिशा की ओर तथा देवताओं का मुख पश्चिम की ओर रहे। बहुमंजिला भवनों में पूजा का स्थान भूतल पर होना आवश्यक है. पूजास्थल पर हवन कुण्ड या अग्नि कुण्ड आग्नेय दिशा में रखें.
* रसोई घर का द्वार मध्य भाग में इस तरह हो कि हर आनेवाले को चूल्हा न दिखे। चूल्हा आग्नेय दिशा में पूर्व या दक्षिण से लगभग ४'' स्थान छोड़कर रखें. रसोई, शौचालय एवं पूजा एक दूसरे से सटे न हों. रसोई में अलमारियां दक्षिण-पश्चिम दीवार तथा पानी ईशान में रखें.
* बैठक का द्वार उत्तर या पूर्व में हो। deevaron का रंग सफेद, पीला, हरा, नीला या गुलाबी हो पर लाल या काला न हो. युद्ध, हिंसक जानवरों, शोइकर, दुर्घटना या एनी भयानक दृश्यों के चित्र न हों. अधिकांश फर्नीचर आयताकार या वर्गाकार तथा दक्षिण एवं पश्चिम में हों.
* सीढियां दक्षिण, पश्चिम, आग्नेय, नैऋत्य या वायव्य में हो सकती हैं पर ईशान में न हों। सीढियों के नीचे शयन कक्ष, पूजा या तिजोरी न हो. सीढियों की संख्या विषम हो.
* कुआँ, पानी का बोर, हैण्ड पाइप, टंकी आदि ईशान में शुभ होता है, दक्षिण या नैऋत्य में अशुभ व नुकसानदायक है।
* स्नान गृह पूर्व में, धोने के लिए कपडे वायव्य में, आइना पूर्व या उत्तर में गीजर तथा स्विच बोर्ड आग्नेय में हों।
* शौचालय वायव्य या नैऋत्य में, नल ईशान पूव्र या उत्तर में, सेप्टिक tenk उत्तर या पूर्व में हो।
* मकान के केन्द्र (ब्रम्ह्स्थान) में गड्ढा, खम्बा, बीम आदि न हो. यह स्थान खुला, प्रकाशित व् सुगन्धित हो।
* घर के पश्चिम में ऊंची जमीन, वृक्ष या भवन शुभ होता है।
* घर में पूर्व व् उत्तर की दीवारें कम मोटी तथा दक्षिण व् पश्चिम कि दीवारें अधिक मोटी हों। तहखाना ईशान, या पूर्व में तथा १/४ हिस्सा जमीन के ऊपर हो. सूर्य किरंनें तहखाने तक पहुंचना चाहिए.
* मुख्य द्वार के सामने अन्य मकान का मुख्य द्वार, खम्बा, शिलाखंड, कचराघर आदि न हो।
* घर के उत्तर व पूर्व में अधिक खुली जगह यश, प्रसिद्धि एवं समृद्धि प्रदान करती है.
वराह मिहिर के अनुसार वास्तु का उद्देश्य 'इहलोक व परलोक दोनों की प्राप्ति है. नारद संहिता, अध्याय ३१, पृष्ठ २२० के अनुसार-
अनेन विधिनन समग्वास्तुपूजाम करोति यः
आरोग्यं पुत्रलाभं च धनं धन्यं लाभेन्नारह।
अर्थात इस तरह से जो व्यक्ति वास्तुदेव का सम्मान करता है वह आरोग्य, पुत्र धन - धन्यादी का लाभ प्राप्त करता है।
- आचार्य संजीव वर्मा, संजिव्सलिल।ब्लागस्पाट।कॉम सलिल.संजीव@जीमेल.कॉम" target=_blank>सलिल.संजीव@जीमेल.कॉम
मंगलवार, 27 जनवरी 2009
काले बादल ने रोका है फ़िर से मार्ग मयंक का।
छोड़ अहिंसा शस्त्र उठायें, सिर काटें आतंक का...
राजनीति के गलियारों से आशा तनिक न शेष है।
लोकनीति की ताकत सचमुच अपराजेय अशेष है।
शासक और विपक्षी दल केवल सत्ता के लोभी हैं।
रामराज के हैं कलंक ये, सिया विरोधी धोबी हैं।
हम जनगण वानर भालू बन साथ अगर डट जाएँगे-
आतंकी असुरों का भू से नाम निशान मिटायेंगे।
मिल जवाब दे पाएंगे हम हर विषधर के डंक का।
छोड़ अहिंसा शस्त्र उठायें, सिर काटें आतंक का...
अब न करें अनुरोध कुचल दें आतंकी बटमारों को।
राज खोलते पुलिस बलों का पत्रकार गद्दारों को।
शासन और प्रशासन दोनों जनगण सम्मुख दोषी हैं।
सीमा पार करें, न संदेसा पहुंचाएं संतोषी हैं।
आंसू को शोलों में बदलें बदला लें हर चोट का।
नहीं सुरक्षा का मसला हो बंधक लालच नोट का
आतंकी शिविरों के रहते दाग न मिटे कलंक का।
छोड़ अहिंसा शस्त्र उठायें, सिर काटें आतंक का...
अनुमति दे दो सेनाओं को, एक न बैरी छोडेंगे।
काश्मीर को मिला देश में कमर पाक की तोडेंगे।
दानव है दाऊद न वह या संगी-साथी बच पायें।
सेना और पुलिस के बलिदानों की हम गाथा गायें।
पूजें नित्य शहीदों को, स्वजनों को गले लगायेंगे।
राष्ट्र हेतु तन-मन-धन दे, भारत माँ की जय गायेंगे।
राजनीति हो चादर उजली, दाग नहीं हो पंक का।
छोड़ अहिंसा शस्त्र उठायें, सिर काटें आतंक का...
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नर्मदा परिक्रमा हेतु पर्यटन विभाग नियमित व्यवस्था करे .
सुझाव कर्ता ..
श्रीमती कल्पना श्रीवास्तव
एम.एससी.
गृहणी
विवेक सदन , नर्मदागंज , मंडला म.प्र.
महोदय
नर्मदा विश्व की एक मात्र ऐसी नदी है जिसकी परिक्रमा का पौराणिक महत्व है . हमें गर्व है कि यह हमारे प्रदेश की जीवन दायनी है . मेरा सुझाव है कि यदि नर्मदा की परिक्रमा को विश्व स्तर पर प्रचारित किया जावे व सुविधा जनक पर्यटन यान की समुचित व्यवस्था हो तो यही नर्मदा परिक्रमा प्रदेश को आर्थिक लाभ भी पहुंचा सकती है . वर्तमान में नर्मदा परिक्रमा आस्थावान ग्रामीण परिवेश तक ही सीमित है , जो पैदल ही धार्मिक भावना से नर्मदा परिक्रमा करते हैं . नर्मदा तट अति रमणीय हैं व उनका पर्यटन की दृष्टि से महत्व निर्विवाद है . जरूरत केवल समुचित संसाधनो के विकास व व्यवस्था का है . यदि हमारे प्रदेश का पर्यटन विभाग मासिक रूप से नियमित नर्मदा परिक्रमा हेतु सुविधाजनक वाहन चलाने लगे तो अनेक संपन्न लोग भी आस्था , मनोरंजन , देशाटन की इच्छा से नर्मदा परिक्रमा करेंगे यह मेरा अनुमान है .

शुक्रवार, 16 जनवरी 2009
ओढ़ कुहासे की चादर
ओढ़ कुहासे की चादर
धरती लगाती दादी।
ऊंघ रहा सतपुडा,
लपेटे मटमैली खादी...
सूर्य अंगारों की सिगडी है,
ठण्ड भगा ले भैया।
श्वास-आस संग उछल-कूदकर
नाचो ता-ता थैया।
तुहिन कणों को हरित दूब,
लगती कोमल गादी...
कुहरा छाया संबंधों पर,
रिश्तों की गरमी पर।
हुए कठोर आचरण अपने,
कुहरा है नरमी पर।
बेशरमी नेताओं ने,
पहनी-ओढी-लादी...
नैतिकता की गाय कांपती,
संयम छत टपके।
हार गया श्रम कोशिश कर,
कर बार-बार अबके।
मूल्यों की ठठरी मरघट तक,
ख़ुद ही पहुँचा दी...
भावनाओं को कामनाओं ने,
हरदम ही कुचला।
संयम-पंकज लालसाओं के
पंक-फंसा- फिसला।
अपने घर की अपने हाथों
कर दी बर्बादी...
बसते-बसते उजड़ी बस्ती,
फ़िर-फ़िर बसना है।
बस न रहा ख़ुद पर तो,
परबस 'सलिल' तरसना है।
रसना रस ना ले, लालच ने
लज्जा बिकवा दी...
हर 'मावस पश्चात्
पूर्णिमा लाती उजियारा।
मृतिका दीप काटता तम् की,
युग-युग से कारा।
तिमिर पिया, दीवाली ने
जीवन जय गुंजा दी...
*****
मंगलवार, 6 जनवरी 2009
प्रो. वीणा तिवारी
३०-०७-१९४४ एम्. ए. , एम्,. एड.
प्रकाशित कृतियाँ - सुख पाहुना सा (काव्य संग्रह), पोशम्पा (बाल गीत संग्रह), छोटा सा कोना (कविता संग्रह} .
सम्मान - विदुषी रत्न तथा अन्य.
संपर्क - १०५५ प्रेम नगर, नागपुर मार्ग, जबलपुर ४८२००३.
बकौल लीलाधर मंडलोई --
'' वे जीवन के रहस्य, मूल्य, संस्कार, संबंध आदि पर अधिक केंद्रित रही हैं. मृत्यु के प्रश्न भी कविताओं में इसी बीच मूर्त होते दीखते हैं. कविताओं में अवकाश और मौन की जगहें कहीं ज्यादा ठोस हैं. ...मुख्य धातुओं को अबेरें तो हमारा साक्षात्कार होता है भय, उदासी, दुःख, कसक, धुआं, अँधेरा, सन्नाटा, प्रार्थना, कोना, एकांत, परायापन, दया, नैराश्य, बुढापा, सहानुभूति, सजा, पूजा आदि से. इन बार-बार घेरती अनुभूतियों की अभिव्यक्ति के लिए पैबंद, कथरी, झूलता पंखा, हाशिया, बेहद वन, धुन्धुआती गीली लकडी, चटकती धरती, धुक्धुकाती छाती, बोलती हड्डियाँ, रूखी-खुरदुरी मिट्टी, पीले पत्ते, मुरझाये पौधे, जैसे बिम्बों की श्रंखला है. देखा जाए तो यह कविता मन में अधिक न बोलकर बिम्बों के माध्यम से अपनी बात कहने की अधिक प्रभावी प्रविधि है. वीणा तिवारी सामुदायिक शिल्प के घर-परिवार में भरोसा करनेवाली मनुष्य हैं इसलिए पति, बेटी, बेटे, बहु और अन्य नातेदारियों को लेकर वे काफी गंभीर हैं. उनकी काव्य प्रकृति भावः-केंद्रित है किंतु वे तर्क का सहारा नहीं छोड़तीं इसलिए वहाँ स्त्री की मुक्ति व आज़ादी को लेकर पारदर्शी विमर्श है. वीणा तिवारी की कवितायें आत्मीय पथ की मांग करती हैं. इन कविताओं के रहस्य कहीं अधिक उजागर होते हैं जब आप धैर्य के साथ इनके सफर में शामिल होते हैं. इस सफर में एक बड़ी दुनिया से आपका साक्षात्कार होता है. ऐसी दुनिया जो अत्यन्त परिचित होने के बाद हम सबके लिए अपरिचय की गन्ध में डूबी हैं. समकालीन काव्य परिदृश्य में वीणा तिवारी की कवितायें गंभीरता से स्वीकार किए जाने की और अग्रसर हैं
घरौंदा
रेत के घरौंदे बनाना
जितना मुदित करता है
उसे ख़ुद तोड़ना
उतना उदास नहीं करता.
बूँद
बूँद पडी
टप
जब पडी
झट
चल-चल
घर के भीतर
तुझको नदी दिखाऊँगा
मैं
बहती है जो
कल-कल.
चेहरा
जब आदमकद आइना
तुम्हारी आँख बन जाता है
तो उम्र के बोझिल पड़ाव पर
थक कर बैठे यात्री के दो पंख उग आते हैं।
तुम्हारी दृष्टि उदासी को परत दर परत
उतरती जाती है
तब प्रेम में भीगा ये चेहरा
क्या मेरा ही रहता है?
चाँदनी
चाँदनी गुमसुम अकेले डोलती है
क्या करें सुनती है न कुछ बोलती है
शाख पर सहमे पखेरू
लरजती डरती हवाएं
क्या करें जब चातकी भ्रम तोड़ती है
चाँदनी गुमसुम अकेले डोलती है।
चाहना फ़ैली दिशा बन
आस का सिमटा गगन
क्या करें सूनी डगर मुख मोडती है
चाँदनी गुमसुम अकेले डोलती है
उम्र मात्र सी गिनी
सामने पतझड़ खड़ा
क्या करें बहकी लहर तट तोड़ती है
चाँदनी गुमसुम अकेले डोलती है
मन
उतरती साँझ में बेकल मन
सूनी पगडंडी पर दो चरण
देहरी पर ठिठकी पदचाप
सांकल की परिचित खटखटाहट
दरारों से आती धीमी उच्छ्वास ही
क्यों सुनना चाहता है मन?
सगे वाला
सुबह आकाश पर छाई रक्तिम आभा
विदेशियों के बीच परदेस में
अपने गाँव-घर की बोली बोलता अपरिचित
दोनों ही उस पल सगे वाले से ज्यादा
सगे वाले लगते हैं।
शायद वे हमारे अपनों से
हमें जोड़ते हैं या हम उस पल
उनकी ऊँगली पकड़ अपने आपसे जुड़ जाते हैं
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शनिवार, 3 जनवरी 2009
नर्मदाअष्टकम - आचार्य संजीव वर्मा " सलिल "

