रविवार, 6 अक्तूबर 2019

दुर्गा सप्तशती प्राधानिकं रहस्यं

दुर्गा सप्तशती प्राधानिकं रहस्यं
सृष्टि उत्पत्ति और सरस्वती जी
*
ॐ अस्य श्री सप्तशतीरहस्यत्रयस्य नारायण
ऋषिरनुष्टुप छंद:, महाकाली-महालक्ष्मी-महा
सरस्वती देवता यथोक्त फला वाप्यर्थं जपे विनियोग:।
ॐ सतशती के रहस्य त्रय, ऋषिवर श्री नारायण हैं।
देव महा काली-रमा-शारद, छंद अनुष्टुप धारण है।
मिले यथोचित फल इस हेतु करें जप में विनियोग सदा।
राजोवाच
भगवन्नवतारा में चंडीकायास्त्वयोदिता:।
एतेषां प्रकृतिं ब्रह्मन् प्रधानं वक्तुमर्हसि।।१।।
राजा बोले प्रभु! चण्डी के अवतारों की कथा कही।
अब इनकी प्रधान प्रकृति की ब्रह्मन्! मुझसे कथा कहें।।
आराध्यं यन्मया देव्या: स्वरूपं येन च द्विज।
विधिना ब्रूहि सकलं यथावत्प्रणतस्य मे।।२।।
देवी की आराधना किस छवि में द्विजश्रेष्ठ!
करूँ कहें उसकी विधि चरण-शरण मैं ज्येष्ठ!
ऋषिरुवाच
इदं रहस्यं परममनाख्येयं प्रचक्षते।
भक्तोsसीति न मे किञ्चत्तवावाच्यं नराधिप।।३।।
ऋषि बोले आख्यान यह परम गुप्त है भूप।
कह न सकूँ निज भक्त से, है कुछ नहीं अनूप।।
सर्वस्याद्या महालक्ष्मीस्त्रिगुणा परमेश्वरी।
लक्ष्यालक्ष्यस्वरूपा सा व्याप्य कृत्स्नं व्यवस्थिता।।४।।
सर्व मूल महालक्ष्मी त्रिगुणमयी जगदंब।
दिखें अदिख रह व्याप्त हैं सकल सृष्टि में अंब।।
मातुलिङ्ग गदां खेटं पानपात्रं च बिभ्रती।
नागं लिङ्गं च योनिं च बिभ्रती नृप मूर्द्धनी।।५।।
कर में सोहे मातुलिंग गदा, ढाल, पानदान।
नाग, लिंग, योनि करे शोभित दिव्य ललाट।।
तप्तकाञ्चन वर्णाभा तप्तकाञ्चनभूषणा।
शून्यं तदखिलं स्वेन पूरयामास तेजसा।।६।।
तप्त स्वर्ण सा रंग है, तप्त स्वर्ण श्रृंगार।
करतीं अपने तेज से, पूर्ण सकल संसार।।
शून्यं तदखिलं लोकं विलोक्य परमेश्वरी।
बभार परमं रूपं तमसा केवलेन हि।।७।।
शून्य सकल संसार को, देखें देवी आप।
तमोगुणी नव रूप ले प्रगटें सबमें व्याप।।
सा भिन्नाञ्जनसंकाशा दंष्ट्राङ्कित वरानना।
विशाललोचना नारी बभूव तनुमध्यमा।।८।।
श्यामल अंजन सदृश वह, मुख पर शोभित दंत।
मृगनयनी मध्यम बदन, नारी रूप अनंत।।
खड्गपात्रशिर:खेटैरलङ्कृत चतुर्भुजा।
कबंधहारं शिरसा बिभ्राणा हि शिर:स्रजम्।।९।।
खड्ग पात्र सिर ढाल ले, भुजा सुशोभित चार।
मुंड माल धारण किये, कर कबंध श्रृंगार।।
सा प्रोवाच महालक्ष्मीं तामसी प्रमदोत्तमा।
नाम कर्म च मे मातर्देहि तुभ्यं नमो नम:।।१०।।
तामसी प्रमदोत्तमा ने महालक्ष्मी से कहा।
माँ! मुझे दें नाम; कह दें काम भी; तुमको नमन।।
तां प्रोवाच महालक्ष्मीस्तामसीं प्रमादोत्तमाम्।
ददामि तव नामानि यानी कर्माणि तानि ते।।११।।
महालक्ष्मी ने कहा हे तामसी प्रमदोत्तमा!
नाम देती हूँ तुम्हें मैं, काम कहती तुम्हारा।।
महामाया महाकाली महामारी क्षुधा तृषा।
निद्रा तृष्णा चैकवीरा कालरात्रिर्दुरत्यया।।१२।।
महामाया महाकाली महामारी क्षुधा तृषा।
निद्रा तृष्णा व एकवीरा कालरात्रि दुरत्यया।।
इमानि तव नामानि प्रतिपाद्यानि कर्मभिः।
एभि: कर्माणि ते ज्ञात्वा योsधीते सोsश्नुते सुखं।।१३।।
ये हैं नाम तुम्हारे; जा कर्मों द्वारा चरितार्थ कर।
जो कर्मों को जान जपेंगे, सुख पाएँगे नारी-नर।।
तामित्युक्त्वा महालक्ष्मी: स्वरूपमपरं नृप।
सत्त्वाख्येनातिशुद्धेन गुणेनेंदुप्रभं दधौ।।१४।।
महालक्ष्मी ने यह कहकर, रूप दूसरा प्रगट किया।
सत्वगुणी अति शुद्ध शशि सदृश प्रभापूर्ण नव रूप लिया।।
अक्षमालाङ्कुशधरा वीणा पुस्तक धारिणी।
सा बभूव वरा नारी नामान्यस्यै च सा ददौ।।१५।।
अक्षमाल अंकुश सहित, वीणा पुस्तक थाम।
महीयसी को रमा ने, दिए अलौकिक नाम।।
महाविद्या महावाणी भारती वाक् सरस्वती।
आर्या ब्राह्मी कामधेनुर्वेदगर्भा च धीश्वरी।।१६।।
महाविद्या महावाणी, भारती वाक् सरस्वती।
आर्या ब्राह्मी कामधेनु, वेदगर्भा व धीश्वरी।।
अथोवाच महालक्ष्मीर्महाकालीं सरस्वतीं।
युवां जनयतां देव्यौ मिथुन स्वानुरूपत:।।१७।।
महाकाली सरस्वती से, महा लक्ष्मी ने कहा।
देवियों! दो जन्म निज, अनुरूप जोड़ों को अभी।।
इत्युक्त्वा ते महालक्ष्मी: ससर्ज मिथुनं स्वयं।
हिरण्यगर्भौ रुचिरौ स्त्रीपुंसौ कमलसानौ।।१८।।
महालक्ष्मी ने यह कहकर आप मिथुन कर सृजन किया।
कनकगर्भ प्रगटे नारी-नर, कमलासन आसीन किया।।
ब्रह्मन् विधे विरंचेति धातरित्याह तं नरं।
श्री: पद्मे कमले लक्षिमत्याह माता च तां स्त्रियं।।१९।।
ब्रह्मन विधे विरंचि धात:, दिए पुरुष को नाम।
श्री पद्मा कमला लक्ष्मी, नामित नारि ललाम।।
महाकाली भारती च मिथुन सृजत: सह।
एतयोरपि रूपाणि नामानि च वदामि ते।।२०।।
महाकाली भारती ने, भी युग्म दो पैदा किये।
रूप गुण उनके हुए कैसे, बताता हूँ तुम्हें।।
नीलकण्ठं रक्तबाहुं श्वेतांग चंद्रशेखरं।
जनयामास पुरुषं महाकाली सितां स्त्रियं।।२१।।
नील कंठ भुज लाल श्वेत तन चंद्र शीश पर।
जन्मा नर; माँ काली से गोरी नारी सँग।।
स रूद्र: शंकर: स्थाणुः कपर्दी च त्रिलोचन:।
त्रयी विद्या कामधेनु: सा स्त्री भाषाक्षरा स्वरा।।२२।।
पुरुष रूद्र शंकर स्थाणु कपर्दी त्रिलोचन।
स्त्री त्रयी विद्या कामधेनु भाषाक्षरा स्वरा।।
सरस्वती स्त्रियाँ गौरीन कृष्णं च पुरुषं नृप।
जनयामास नामानि तयोरपि वदामि ते।।२३।।
सरस्वती से गोरी नारी श्यामल पुरुष हुए राजन!।
उन दोनों को नाम मिले जो कहता हूँ, वे भी सुन लो।
विष्णु: कृष्णो हृषीकेशो वासुदेवो जनार्दन:।
उमा गौरी सती चंडी सुंदरी सुभगा शिवा।।२४।।
विष्णु कृष्ण हृषिकेश वासुदेव जनार्दन नाम पुरुष के।
उमा गौरी सती चंडी सुंदरी सुभगा शिवा स्त्री के।।
एवं युवतय: सद्य: पुरुषत्वं प्रपेदिरे।
चक्षुष्मंतो नु पश्यंति नेतरेsतद्विदो जना:।।२५।।
हुईं शीघ्र ही तीन नारियाँ तीनों पुरुष रूप को प्राप्त।
देख न सकते चर्म चक्षु यह, देखें ज्ञान नेत्र ही आप्त।।
ब्रह्मणे प्रददौ पत्नीं महालक्ष्मीर्नृप त्रयीम्।
रुद्राय गौरी वरदां वासुदेवाय च श्रियम्।।२६।।
महालक्ष्मी ने ब्रह्मा को सौंपी त्रयी पत्नि राजन!।
और रूद्र को गौरी दी, दी वासुदेव को श्री नृपवर!।।
स्वरया सह संभूय विरिंचोsण्डमजीजनत्।
विभेद भगवान् रुद्रस्तद् गौर्या सह वीर्यवान्।।२७।।
स्वर के साथ मिले ब्रह्मा जी, तब ब्रह्माण्ड यहाँ जन्मा।
वीर्यवान शिव ने गौरी के साथ किया भेदन उसका।।
अण्डमध्ये प्रधानादि कार्यजातमभून्नृप।
महाभूतात्मकं सर्वं जगत्स्थावरजंगमम्।।२८।।
अंड मध्य में मूल मुख्य कारज से भू जन्मी राजन।
महाभूतमय है समस्त जड़-जंगम कहते विद्वज्जन।।
पुपोष पालयामास तल्लक्षम्या सह केशव:।
संजहार जगत्सर्वं सह गौर्या महेश्वर:।।२९।।
पोषण-पालन किया जगत का साथ लक्ष्मी के केशव ने।
और किया संहार सर्व का गौरी साथ महेश्वर ने।।
महालक्ष्मीर्महाराज सर्वसत्वमयीश्वरी।
निराकारा च साकारा सैव नानाभिधानभृत।।३०।।
महाराज! है महालक्ष्मी तत्वमयी सर्वेश्वरी।
निराकार-साकार वही हैं नाना नाम उन्हीं के हैं।।
नामांतरैर्निरूप्यैषा नाम्ना नान्येन केनचित्।।३१।।
नाम भेद से करें निरूपण, एक नाम से हो न सके।।
(टीप - नामभेद सत्य, ज्ञान, चित्, महामाया आदि)
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