रविवार, 6 अक्तूबर 2019

नवगीत

एक रचना
*
महरी पर गड़ती
गृद्ध-दृष्टि सा
हो रहा पर्यावरण
*
दोष अपना और पर मढ़
सभी परिभाषा गलत पढ़
जिस तरह हो सीढ़ियाँ चढ़  
देहरी के दूर
मिट्टी गंदगी सा
कर रहे हैं आचरण
*
हवस के बनकर पुजारी
आरती तन की उतारी
दियति अपनी खुद बिगाड़ी
चीयर डाला
असुर बनकर
माँ धरा का आवरण
***  

कोई टिप्पणी नहीं: