शनिवार, 26 अक्तूबर 2019

सरस्वती वंदना -अनिल अनवर

अनिल अनवर
आत्मज - स्व० तारा - स्व० शारदा प्रसाद श्रीवास्तव। 
जन्म - २७ सितंबर १९५२ / २० फरवरी ५३, 
सीतापुर (उ०प्र०)।  
शिक्षा - बी० एस सी०, इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में डिप्लोमा। 
पैतृक ग्राम - मुंशी दरियाव लाल का पुरवा, ज़िला - सुलतानपुर (उ०प्र०। )
सम्प्रति - सेवा निवृत्त अधिकारी भारतीय वायु सेना, स्वतंत्र लेखन।
प्रकाशित पुस्तकें - आस्था के गीत, गुलशन : मज़्मूआ-ए-नज़्म, विमल करो मन मेरा। 
सम्पादन / प्रकाशन : मरु गुलशन (त्रैमासिक) २० वर्ष, ७९ अंक। 
उपलब्धि - सारस्वत आराधना।
संपर्क - ३३ व्यास कॉलोनी, एयर फोर्स, जोधपुर ३४२०११ राजस्थान।
दूरभाष - ०२९१ २६७१९१७, चलभाष - ७७३७६८९०६६, ८७६४७३७७८१। ईमेल - aksrivastava2709@gmail.com 
  
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माँगता हूँ, दें मुझे
माँगता हूँ, दें मुझे अब वर यही माँ शारदे !
सीख पाऊँ मैं भी करना शाइरी माँ शारदे !
बुग़्ज़ो-नफ़रत, हिर्सो-ग़ीबत घर न दिल में कर सके,
और हो क़िरदार में भी सादगी माँ शारदे !
है बहुत मुश्किल अरूज़ी बन के कह पाना ग़ज़ल,
दूर करना मेरे शे'रों की कमी माँ शारदे !
हैं कई सिन्फ़े-सुख़न, ग़ज़लें मगर मक़बूल हैं,
बात दिल की मैंने ग़ज़लों में कही माँ शारदे !
दौर था वो भी कि ज़ुल्फ़ों में ही ग़ज़लें क़ैद थीं,
इन के मरक़ज़ में है अब आम आदमी माँ शारदे !
अब नहीं उस्ताद 'शंकर' किस तरह इस्लाह हो,
नज़्रे-सानी डालिये अब आप ही माँ शारदे !
आरज़ू 'अनवर' की है ज़िन्दा रहे एक-आध शे'र,
ख़त्म हो इस जिस्म की जब ज़िन्दगी माँ शारदे !
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हंसवाहिनी माँ!

हंसवाहिनी माँ! वीणा फिर आज बजा दो। 
मेरे मन में दिव्य ज्ञान की ज्योति जगा दो।। 

द्वेष मिटाकर स्नेह-प्रेम का निर्झर भर दो।
आस्था दृढ़ हो मानवता में ऐसा वर दो।।
दनुज वृत्तियों को जीवन से दूर भगा दो 

बुद्धि विमल हो, मन निर्मल हो, वाणी शोभन। 
नहीं डिगाये धन-पद-यश के मुझे प्रलोभन।। 
अंतर में केवल विद्या की लगन लगा दो 

साँसों में संगीत, ह्रदय में प्रीत समाये। 
मुख से निकलें शब्द सत्य की राह दिखाये।।
मुझे लेखनी से रचना सद्भाव सीखा दो 
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उद्धार करो मेरा ब्रह्माणी!

उद्धार करो मेरा ब्राह्मणी! 
माँ मेरे भावों को दो वाणी।।

मैं मूढ़ निरा नादान बड़ा। 
मन में छाया अभिमान बड़ा।।
भूलों को मेरी, माफ़ करो। 
अंतस का कल्मष साफ़ करो।।
तुम ज्ञान सिंधु हो, मैं अज्ञानी 

निज कर में वीणा लिए रहो। 
हित कलाकार का किये रहो।।
साहित्य-कला-संगीत बढ़े।
तेरे चरणों में प्रीत बढ़े।।
हे! शिल्प-कलाओं की वरदानी 

जो भी हैं तेरे आराधक।
वे बने रहें सच्चे साधक।।
उनको तेरा पथ मधुर लगे। 
धन और प्रलोभन से न डिगें।।
यह कृपा सदा करना कल्याणी 
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