गुरुवार, 1 सितंबर 2016

laghukatha

लघुकथा
आनंद पथ
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हर साल ३-४ बार उसे डाक से कुष्ठाश्रम का पत्र मिलता, वह एक सरसरी नज़र डालकर उसे फेंक देता और सोचता यह सब ठगने का तरीका है। एक दिन उसकी पत्नी ने परेशानी बताई कि फिर से बरौनी खोजना होगी। उसने कारण पूछा तो पता चला बरौनी के पैरों में कुष्ठ के घाव हो गए हैं और उसके बच्चे गरीबी के कारण इलाज भी ठीक से नहीं करा पा रहे। सरकारी अस्पताल से कभी दवाई मिलती है, कभी नहीं।
वह कोई उपाय सोचता रहा, अचानक कुष्ठाश्रम का पत्र याद आया। पुराने अख़बारों के बीच दबाया हुआ पत्र उसने खोज लिया और दूरभाष से संपर्क कर बरौनी के रहने और इलाज की व्यवस्था कर, बरौनी को खबर देने उसकी झोपड़ी की ओर गया।
बरसात के पानी से बने गड्ढे और ऊबड़-खाबड़ पगडंडी पर कीचड से पैंट गन्दी होने लगी, उसने सोचा बुरा फँसा, बेहतर होता खबर भेजकर बरौनी को बुलाता लेकिन फिर लगा देर करना ठीक नहीं।

अपनी झोपडी में उसे देख बरैनी की ख़ुशी का ठिकाना न रहा, वह कुछ बोलता उससे पहले ही बरौनी ने बताया कि उसने अपनी बेटी को उसके घर काम करने को राजी कर लिया है। उसने बरौनी को इलाज की व्यवस्था के बारे में बताया तो वह औए उसके बच्चे पैर छूने लगे। वह राह खर्च के लिए पैसे देकर लौटा तो वही पगडंडी लग रही थी आनंद पथ।
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