गुरुवार, 15 सितंबर 2016

muktak

मुक्तक 
नित्य प्रात हो जन्म, सूर्य सम कर्म करें निष्काम भाव से। 
संध्या पा संतोष रात्रि में, हो विराम नित नए चाव से।। 
आस-प्रयास-हास सँग पग-पग, लक्ष्य श्वास सम हो अभिन्न ही -
मोह न व्यापे, अहं न घेरे, साधु हो सकें प्रिय! स्वभाव से।।
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