गुरुवार, 8 दिसंबर 2016

vimarsh

विमर्श:
नाद छंद का मूल है

सृष्टि का मूल ही नाद है. योगी इसे अनहद नाद कहते हैं इसमें डूबकर परमात्म की प्रतीति होती है ऐसा पढ़ा-सुना है. यह नाद ही सबका मूल है.यह नाद निराकार है, इसका चित्र नहीं बन सकता़, इसे चित्रगुप्त कहा गया है. नाद ब्रम्ह की नियमित आवृत्ति ताल ब्रम्ह को जन्म देती है. नाद और ताल जनित तरंगें अनंत काल तक मिल-बिछुड़ कर भारहीन कण और फिर कई कल्पों में भारयुक्त कण को जन्म देती हैं. ऐसा ही एक कण 'बोसॉन' चर्चित हो चुका है. इन कणों के अनंत संयोगों से विविध पदार्थ और फिर जीवों का विकास होता है. नाद-ताल दोनों अक्षर ब्रम्ह है. ये निराकार जब साकार (लिपि) होते हैं तो शब्द ब्रम्ह प्रगट होता है. चित्रगुप्त के 3 रूप जन्मदाता, पालक और विनाशक तथा उनकी आदि शक्तियों (ब्रम्हा-महा शारदा, विष्णु-महालक्ष्मी, शिव-महाकाली) के माध्यम से सृष्टि-क्रम बढ़ता है. विष्णु के विविध अवतार विविध जीवों के क्रमिक विकास के परिचायक हैं. जैन तथा बौद्ध जातक कथाएँ स्पष्ट: is कहती हैं कि परब्रम्ह विविध जीवों के रूप में आता है. ध्वनि के विविध संयोजनों से लघु-दीर्घ वर्ण और वर्णों के सम्मिलन से शब्द बनते हैं. शब्दों का समुच्चय भाषा को जन्म देता है. भाषा भावों कि वाहक होती है. संवेदनाएँ और अनुभूतियाँ भाषाश्रित होकर एक से अनेक तक पहुँचती हैं. ध्वनि के लघु-गुरु उच्चारण विविध संयोजनों से विविध लयों का विकास करते हैं. इन लयों से राग बनते हैं. शब्द-संयोजन छंद को जन्म देते हैं. लय राग और छंद दोनों के मूल में होती है. लय की अभिव्यक्ति नाद से कंठ, ताल से वाद्य, शब्द से छंद , रेखाओं से चित्र तथा मुद्राओं से नृत्य करता है.सलिल-प्रवाह की कलकल, पक्षियों का कलरव भी लय की ही अभिव्यक्ति है. लय में विविध रस अन्तर्निहित होते हैं. रसों की प्रतीति भाव-अनुभाव करते हैं. लेखन, गायन तथा नर्तन तीनों ही रसहीन होकर निष्प्राण हो जाते हैं. आलाप ही नहीं विलाप में भी लय होती है. आर्तनाद में भी नाद तो निहित है न? नाद तो प्रलाप में भी होता है, भले ही वह निरर्थक प्रतीत हो. मंत्र, श्लोक और ऋचाएँ भी विविध स पड़ा हैलयों के संयोजन हैं. लय का जानकार उन्हें पढ़े तो रस-गंगा प्रवाहित होती है, मुझ जैसा नासमझ पढ़े तो नीरसता कि प्रतीति होती है. अभ्यास और साधना ही साधक को लय में लीन होने कि पात्रता और सामर्थ्य प्रदान करते हैं.

यह मेरी समझ और सोच है. हो सकता है मैं गलत हूँ. ऐसी स्थिति में जो सही हैं उनसे मार्गदर्शन अपेक्षित है.
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