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शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

alha

एक रचना
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मचा महाभारत भारत में, जन-गण देखें ताली पीट 
दहशत में हैं सारे नेता, कैसे बचे पुरानी सीट?  
हुई नोटबंदी, पैरों के नीचे, रही न हाय जमीन 
कौन बचाए इस मोदी से?, नींद निठुर ने ली है छीन 
पल भर चैन न लेता है खुद, दुनिया भर में करता धूम 
कहे 'भाइयों-बहनों' जब भी, तभी सफलता लेता चूम 
कहाँ गए वे मौनी बाबा?, घपलों-घोटालों का राज 
मनमानी कर जोड़ी दौलत, घूस बटोरी तजकर लाज 
हाय-हाय हैं कैसे दुर्दिन?, छापा पड़ता सुबहो-शाम 
चाल न कोई काम आ रही, जब्त हुआ सब धन बेदाम 
जनधन खातों में डाला था, रूपया- पीट रहे अब माथ 
स्वर्ण ख़रीदा जाँच हो रही, बैठ रहा दिल खाली हाथ 
पत्थर फेंक करेगा दंगा, कौन बिना धन? पिट रइ गोट 
नकली नोट न रहे काम के, रोज पड़े चोटों पर चोट   
ताले तोड़ आयकरवाले, खाते-बही कर रहे जब्त 
कर चोरी की पोल खोलते, रिश्वत लेंय न कैसी खब्त?
बेनामी संपत्ति बची थी, उस पर ली है नजर जमाय 
हाय! राम जी-भोले बाबा, हनुमत  कहूँ न राह दिखाय 
छोटे नोट दबाये हमीं ने, जनता को है बेहद कष्ट  
चूं न कर रहा फिर भी कोई, समय हो रहा चाहे नष्ट 
लगे कतारों में हैं फिर भी, कहते नीति यही है ठीक 
शायर सिंह सपूत वही जो, तजे पुरानी गढ़ नव लीक 
पटा लिया कुछ अख़बारों को, चैनल भरमाते हैं खूब 
दोष न माने फिर भी जनता, लुटिया रही पाप की डूब  
चचा-भतीजे आपस में भिड़, मोदी को करते मजबूत 
बंद बोलती माया की भी, ममता को है कष्ट अकूत 
पाला बदल नितिश ने मारा, दाँव न लालू जाने काट 
बोल थके है राहुल भैया, खड़ी हुई मैया की खाट 
जो मैनेजर ललचाये थे, उन पर भी गिरती है गाज 
फारुख अब्दुल्ला बौराया, कमुनिस्टों का बिगड़ा काज  
भूमि-भवन के भाव गिर रहे, धरे हाथ पर हाथ सुनार 
सेठ अफसरों नेताओं के ठाठ, न बाकी- फँसे दलाल  
रो-रो सूख रहे हैं आँसू, पिचक गए हैं फूले गाल 
जनता जय-जयकार कर रही, मोदी लिखे नाता इतिहास 
मन मसोस दिन-रात रो रहे, घूसखोर सब पाकर त्रास 
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