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रविवार, 4 दिसंबर 2016

गीत

एक रचना * आकर भी तुम आ न सके हो पाकर भी हम पा न सके हैं जाकर भी तुम जा न सके हो करें न शिकवा, हो न शिकायत * यही समय की बलिहारी है घटनाओं की अय्यारी है हिल-मिलकर हिल-मिल न सके तो किसे दोष दे, करें बगावत * अपने-सपने आते-जाते नपने खपने साथ निभाते तपने की बारी आई तो साये भी कर रहे अदावत * जो जैसा है स्वीकारो मन गीत-छंद नव आकारो मन लेना-देना रहे बराबर इतनी ही है मात्र सलाहत * हर पल, हर विचार का स्वागत भुज भेंटो जो दर पर आगत जो न मिला उसका रोना क्यों? कुछ पाया है यही गनीमत ***

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