मंगलवार, 7 अप्रैल 2015

muktika: sanjiv

मुक्तिका:
संजीव
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गैर से हमको क्यों गिला होगा?
आइना सामने मिला होगा

झील सी आँख जब भरी होगी
कोई उसमें कमल खिला होगा

गर हकीकत न बोल पायी तो
होंठ उसने दबा-सिला होगा

कब तलक चैट से मिलेगा वह
क्या कभी खत्म सिलसिला होगा

हाय! ऐसे न मुस्कुराओ तुम
ढह गया दिल का हर किला होगा

झोपड़ी खाट धनुष या लाठी
जब बनी बाँस ही छिला होगा

काँप जाते हैं कलश महलों के
नीव पत्थर कोई हिला होगा
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