रविवार, 26 अक्तूबर 2014

nav geet:

नवगीत:

चित्रगुप्त को
पूज रहे हैं

गुप्त चित्र
आकार नहीं
होता है
साकार वही
कथा कही
आधार नहीं 
बुद्धिपूर्ण
आचार नहीं

बिन समझे
हल बूझ रहे हैं

कलम उठाये
उलटा हाथ
भू पर वे हैं
जिनका नाथ 
खुद को प्रभु के
जोड़ा साथ
फल यह कोई
नवाए न माथ

खुद से खुद ही
जूझ रहे हैं

पड़ी समय की
बेहद मार
फिर भी
आया नहीं सुधार
अकल अजीर्ण
हुए बेज़ार
नव पीढ़ी का
बंटाधार

हल न कहीं भी
सूझ रहे हैं

***







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