शनिवार, 25 अक्तूबर 2014

muktak:

मुकतक:

मेरी आभा ले हरते हैं, दीपक जग से सघन अँधेरा
सूर्य उगा करता है मेरी ड्योढ़ी का कर-कर पगफेरा
आतप-बरखा, धूप-छाँव, सुख-दुःख, खेलें संग आँख मिचौली
पीर-गरल लूँ कंठ धार, धर अधरों पर मुस्कान सवेरा
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अपना सपना नपना जग में कोई न अब बेमेल रहे
कचरा-तिमिर जला दूँ सारा, जब तक बाती-तेल रहे
गुब्बारों जैसे संसाधन, आसमान सी आशाएं
मेरे लिये ज़िंदगी पूजा, और समझते खेल रहे
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पूजें लक्ष्मी जी गणेश संग, यहाँ विष्णु बम फोड़ रहे
साथी बदले ऋद्धि-सिद्धि क्या?, क्या ऐसी भी होड़ रहे??
चक्र सुदर्शन चकरी बनकर चकराया है धरती पर
परम्पराएँ, रीति-नीतियाँ बना-बनाकर तोड़ रहे.
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उड़े पखेरू, दुबके कूकुर, इन्सां क्यों पगलाया है
इन सा नादां कोई दूसरा कहाँ कभी मिल पाया है
भौंक, दहाड़ें, गुर्राते हम तो हमको जंगली कहें
नहीं जंगली इनके जैसा जंगल में भी पाया है
*
 
भैया दूज मनाती हूँ मैं, तुम भी बहिना दूज मनाओ
मैं तुमको पकवान खिलाऊँ, तुम मुझको मिष्ठान खिलाओ
मुझे बचाना तुम विपदा से, मैं संकट से तुम्हें बचाऊँ
आजीवन सम्बन्ध न टूटे, समरसता से इसे निभाओ
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