गुरुवार, 7 फ़रवरी 2019

सामयिक कविता: बूझ पहेली

सामयिक कविता: 
बूझ पहेली
संजीव 'सलिल' 
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हर चेहरे की अलग कहानी, अलग रंग है. 
अलग तरीका, अलग सलीका, अलग ढंग है... 
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छोटी दाढ़ीवाला यह नेता तेजस्वी.
कम बोले करता ज्यादा है श्रमी-मनस्वी.
नष्ट प्रांत को पुनः बनाया, जन-मन जीता.
मरू-गुर्जर प्रदेश सिंचित कर दिया सुभीता.
गोली को गोली दे, हिंसा की जड़ खोदी.
कर्मवीर नेता है भैया......................?
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डर से डरकर बैठना सही न लगती राह.
हिम्मत गजब जवान की, मुँह से निकले वाह.
घूम रहा है प्रांत-प्रांत में नाम कमाता.
गाँधी कुल का दीपक, नव पीढ़ी को भाता.
जन-मत परिवर्तन करने की लाता आँधी.
बूझो-बूझो नाम बताओ ......................
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चचा-बाप को लगा पटकनी साइकिल पाई
नूरा-कुश्ती पिता पुत्र की जन-मन भाई
थाम विरोधी-हाथ दाँव मारा है जमकर
ठगा रह गया हाथी, चूक न जाए अवसर
संगी रहा न कमल का, इतनी बात विशेष
डिंपल-पति है तिकड़मी, कहो-कहो........
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गोरी परदेसिन की महिमा कही न जाए.
सास और पति के पथ पर चल सत्ता पाए.
बिखर गया परिवार मगर क्या खूब सम्हाला?
देवरानी से मन न मिला यह गड़बड़ झाला.
इटली में जन्मी, भारत का ढंग ले लिया.
बहू फिरंगन भारत माँ की नाम? .........
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चेली कांसीराम की,चतुर तेज तर्रार
दलित वर्ग को मोहती, बाकी को फटकार
करे सियासत सिया-सत तज अद्भुत स्फूर्ति
मोहित होती देखकर पार्क और निज मूर्ति
आरक्षण के नाम पर जनगण है बौराया
सत्ता की दावेदारी करती फिर ............
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मध्य प्रदेशी जनता के मन को था भाया.
दोबारा सत्ता पाकर जो था इतराया.
जिसे लाड़ली बेटी पर आता दुलार था
व्यापम से बदनाम हुआ, आया निखार था
भोजन बाँट, बना है जन-मन का जो तारा.
जल्दी नाम बताओ वह .............  बिचारा।
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तेजस्वी वाचाल साध्वी पथ भटकी है.
कौन बताये किस मरीचिका में अटकी है?
ढाँचा गिरा अवध में उसने नाम कमाया.
बनी मुख्य मंत्री, सत्ता सुख अधिक न भाया.
बड़बोलापन ले डूबा, अब है गुहारती.
शिव-संगिनी का नाम मिला, है ...............
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यह नेता भैंसों को, ब्लैक बोर्ड बनवाता.
कुर्सी पड़े छोड़ना, बीबी को बैठाता.
घर में रबड़ी रही, मगर खाता था चारा.
जनता ने ठुकराया, अब तड़पे बेचारा.
मोटा-ताज़ा लगे, अँधेरे में वह भालू.
जल्द पहेली बूझो नाम बताओ........?
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बूढ़ा शेर बैठ मुम्बई में चीख रहा था .
देश बाँटता, हाय! भतीजा दीख रहा था.
पहलवान था नहीं मुलायम दिल कठोर था.
धनपति नेता डूब गया ले, कटी डोर था.
शुगर किंग मँहगाई अब तक रोक न पाया.
रबर किंग पगड़ी बाँधे, पहचानो भाया.
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रंग-बिरंगे नेता करते बात चटपटी.
ठगते सबके सब जनता को बात अटपटी.
लोकतंत्र को लोभतंत्र में, बदल हँस रहे.
कभी फाँसते हैं औरों को, कभी फँस रहे.
ढंग कहो, बेढंग कहो, चल रही जंग है.
हर चहरे की अलग कहानी, अलग रंग है.
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७.२.१०१७ 
भगवा कमल चढ़ा, सत्ता पर जिसको लेकर 
गया पाक बस में, आया था असफल होकर. 
भाषण लच्छेदार सुनाए, कविता गाए. 
धोती कुरता गमछा धारे, सबको भाए. 
बरस-बरस उसकी छवि, हमने विहँस निहारी. 
ताली पीटो, नाम बताओ-...........
७.२.२०१० 

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