बुधवार, 20 फ़रवरी 2019

चित्रालंकार: पर्वत

चित्रालंकार: पर्वत 

गाएंगे
अनवरत
प्रणय गीत
सुर साधकर।
जी पाएंगे दूर हो
प्रिये! तुझे यादकर।

*

मैं
खुद को
खुद-ब-खुद
छलता रहा हूं।
मंजिलों का स्वप्न
बनकर, हौसला ले
प्रयास सा पलता रहा हूं।

*


सनम
गले लग।
नयन मिला
हो न विलग।
दो न रहें, एक हों
प्रिय! इरादे नेक हों। 

*

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