शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2019

रमन प्रभाव

विग्यान लेख
रमन प्रभाव
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एकल तरंग दैर्घ्य प्रकाश (मोनोक्रोमेटिक) किरणें जब किसी पारदर्शक माध्यम (ठोस, द्रव या गैस) से गुजरती है तब इसकी छितराई किरणों में मूल प्रकाश किरणों के अलावा स्थिर अंतर पर बहुत कम तीव्रता का किरणें भी रहती हैं। इन किरणों को खोजकर्ता वैग्यानिक भारत रत्न सर चंद्रशेखर वेंकटेश्वर रमन के नाम पर रमन प्रभाव (रमन इफेक्ट) कहा जाता है। २८-२-१९२८ को सर रमन ने इस खोज की घोषणा की थी इसलिए २२ फरवरी को राष्ट्रीय विग्यान दिवस मनाया जाता है। प्रकाश-प्रकीर्णन पर उत्कृष्ट मौलिक कार्य हेतु रमन को सन १८-२४ में रायल सोसायटी लंदन की फैलोशिप, १९३० में भौतिकी का नोबल पुरस्कार, १९५२ में भारत रत्न तथा १९५७ में लेनिन शांति पुरस्कार प्राप्त हुआ।

राष्ट्रीय विग्यान दिवस का मूल उद्देश्य विद्यार्थियों को विग्यान के प्रति आकर्षित करना तथा जन सामान्य को वैग्यानिक उपलब्धियों के प्रति सजग करना है। रमन किरणें माध्यम के कणों के कंपन व घूर्णन के कारण मूल प्रकाश किरणों में ऊर्जा कम या अधिक होने से उत्पन्न होती हैं। रमन प्रभाव का  औषधि विग्यान, जीव विग्यापन, भौतिकी, खगोल विज्ञान व दूरसंचार के क्षेत्र में बहुत महत्व है। रमन प्रभाव के अनुसार कोई एकवर्णी प्रकाश किरणों या ठोसों से होकर गुजरे तो उसमें आपतित प्रकाश के साथ अत्यल्प तीव्रता का कुछ अन्य रंगों का प्रकाश दिखता है। रमन ने यह महत्वपूर्ण शोध पुराने किस्म के यंत्रों से किया। रमन प्रभाव ने विग्यान व प्रौद्योगिकी पर बहुत प्रभाव डाला। इससे बैक्टीरिया, रासायनिक प्रदूषण, विस्फोटकों आदि का पता चल जाता है। अमरीकी वैग्यानिकों ने काँच की अपेक्षा सिलिकॉन पर रमन प्रभाव दस हजार गुना अधिक तीव्र पाया है। इससे आर्थिक लाभ के साथ समय की बचत होती है।

वर्ष १९१७ में कलकत्ता विश्वविद्यालय में भौतिकी प्राध्यापक का पद निर्मित होने पर कुलपति आशुतोष मुखर्जी ने रमन को आमंत्रित किया। रमन ने कुछ पदार्थों में वस्तुओं में प्रकाश किरणों के संचलन का अध्ययन करते समय देखा कि किरणों का पूर्ण समूह एकदम सीधा नहीं चलता, उसका कुछ भाग पथ परिवर्तन कर बिखर जाता है। सन १९२१ में विश्वविद्यालयों की अॉक्सफोर्ड कांग्रेस में गए रमन ने मनोरंजन करने के स्थान पर सेंट पॉल गिरजाघर में उसके फुसफुसाते गलियारों का रहस्य समझा। जलयान से स्वदेश लौटते समय
रमन ने भूमध्य सागर के जल में उसका अनोखा अनोखा नीला व दूधियापन देखा। कलकत्ता पहुँचकर रमन ने पदार्थों में प्रकाश के विकरण का अध्ययन आरंभ कर सात वर्षों में रमन प्रभाव की खोज की।

१९२७ में उनका ध्यान इस बात पर गया कि जब एक्स किरणें प्रकीर्ण होती है तो उनकी तरंग लंबाई बदल जाती है। प्रश्न उठा कि साधारण प्रकाश में भी ऐसा क्यों नहीं होना चाहिए? रमन ने पारद आर्क के प्रकाश का स्पेक्ट्रम स्पेक्ट्रोस्कोप में बनाया। इन दोनों के मध्य विविध रासायनिक पदार्थ रखकर पारद आर्क के प्रकाश को इनमें से गुजारकर स्पेक्ट्रम बनाए। आपने देखा कि हर स्पेक्ट्रम भिन्न होता है। आपने श्रेष्ठ स्पैक्ट्रम चित्र तैयार कर मापकर गणितीय गणना व सैद्धान्तिक व्याख्या की। उन्होंने प्रमाणित किया कि यह अंतर पारद प्रकाश की तरंग लंबाई में परिवर्तन के कारण होता है। रमन का यह कार्य पराधीन भारत में भारतीय मनीषा का विश्व स्तर पर लोहा मनवाया।
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संवस

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