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गुरुवार, 1 अगस्त 2019

लेख: "वैदेहीश विलास" में पुरुषायित

शोध  लेख 
राम कथा पर आधारित उड़िया काव्य कृति 'बैदेहीश विलास" में पुरुषायित 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
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राम कथा भारत की सभी भाषाओँ हुए विश्व की अन्य अनेक भाषाओँ में कही गयी गई। सामान्यत: राम को मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में वर्णित किया गया है। तुलसी ने "कंकण किंकिण नूपुर धुनि सुनि" जैसी आलंकारिक किन्तु संयमत अभिव्यक्ति तक खुद को सीमित रखा है। कविराज वीरवर उपेंद्र भंज (सन्‌ 1665 ई. से 1725 ई.) रचित "बिंश छंद" में सामान्य से हटकर सीता जी के अप्रतिम सौंदर्य का श्री राम के मुख से वर्णन कराया गया है। 

एक दिन सीता जी ने कहा की विधाता की किसी विचित्र विधि है कि शिव से अलकापुरी छुड़वाकर शमशान में बसा दिया, विष्णु जी से रत्न जड़ित पलंग ले कर सांप पर सुला दिया और हमसे राज्य छुड़वा कर वन भिजवा दिया। जो विधाता ऐसी अविधि (अनुचित कार्य करते हैं) उन्हें विधि (ब्रम्हा) कैसे कहा जा सकता है।  श्री राम ने लावण्य निधि सीता को अपनी गोद में बैठाकर समझाया  'वे अविधि नहीं विधि ही करते हैं। शिव जी पार्वती  विष्णु जी लक्ष्मी  एकांत में केलि क्रीड़ा कर सकें इसीलिये ब्रम्हा जी ने उन्हें श्मशान हुए क्षीर सागर में वास कराया। हम दोनों को निर्जन वन में इसीलिये भिजवा दिया। रसिक पुरुष और रसिका स्त्री के लिए एकांत से बढ़कर और क्या है? ऐ रतपण्डिते! उन्होंने हमारे लिए क्या कम किया है? अयोध्या की सुख-सुविधाओं  की तुलना में वन के प्राकृतिक सौंदर्य, वनवासियों के स्नेह हुए पंछियों के कलरव को श्रेष्ठ बता हुए राम ने कहा- 

बांधबि ऐथिरे देखायाउ  नाहिं नाचीबार नृत्यकारी 
बेणी नासामणि रमणीमणिरे नचा  अनुग्रह करि 
बिहंति नर्तन नर्तकबरहिं अछिनर्तकबरही   
बोलि चतुरी नासापुड़ा फुलाइ शिरश्चालि देइ रही 

"बांधवी वहाँ नर्तक थे, यहाँ नहीं हैं इसलिए अपनी नथ तथा वेणी को नचाओ।" 

"यहाँ नर्तक नृत्य करते हैं तो यहाँ भी नर्तक (मयूर) नृत्य करते हैं।" कहते हुए सीता जी ने नथ तथा वेणी को न घमकार जोर से श्वास लेकर सर हिलाकर श्री राम का आज्ञा पालन कर दिया। श्री राम ने कहा- 

"ऐ सुंदरी! तुमने मेरा मनोभाव समझकर जिस अभिप्राय से नाथ-वेणी नाचने को कहा था, वह इंगित से कर दिया। (संकेत रमण के समय नथ-वेणी स्थान-च्युत हो जाती हैं। अर्थत तुम रमण हेतु सहमत हो) तब सीता ने पश्चिम में सूर्य और लताओं को देखकर इंगित किया कि सूर्यास्त के पश्चात् लता वन में मनोरथ पूर्ण होगा। प्रसन्न होकर राम ने सीता के विविध अंगों के सौंदर्य की प्रशंसा करते हुए उनकी बाहुवल्लरी का हार पहनने और स्वयंभू शिव द्वय की पूजा (संकेत स्वयंभू अर्थात अपने आप विकसित कुच द्वय का श्रृंगार) करने की कामना की। श्री राम ने सीता जी को लक्ष्मी, रति तथा रंभा आदि से अधिक सुन्दर बताते हुए उनकी मंदोदरी (मंद उदरी) तथा धनुष से अधिक लचीली पतली कमर की प्रशंसा की। सीता ने सविनय उन्हें अपना स्वामी कहा।  

बोलाबोलि हेउँ स्नेह वचन से विचित्र रजनी मिलि 
बिरचाइला  से रमणीरतने यतने पुरुषकेलि 
बाजिला रसना बाद्य मरदल मध्ये ब्रम्हशिरि देइ 
बीणा नाद हुँ हुँ कृत जात वशे कंठ नारद कराइ  

इस प्रेमपूर्ण वार्ता के बीच रात्रि हो गयी और रमणीरत्न सीता ने स्वयं को विपरीत रति हेतु प्रस्तुत किया। उस क्रिया ने उन्हें ब्रम्हानंद की अनुभूति कराई। सीता की करधन बजने लगी और कंठ से नारद के वीणा के तारों की झंकार की तरह  हुँ हुँ की ध्वनि निकलने लगी। 

बिचलित रंभा उर्वशी रामा ये चंचल शेष अंशुक 
बृत्र अंतकपरे तहिं संतक काटिले भोले रसिक 
बिभावरी अंत कले नित्यकृत्य चित्रकूट केलि शेष 
बिंशपदे छांद उपइंद्र वीरवर रचिबारे तोश 

जिस तरह स्वर्ग में नृत्यरत उर्वशी रंभा आदि के वस्त्र हट जाते हैं, उसी तरह विपरीत रति रत सीता के वस्त्र हट गए। जिस तरह वृत्त ने अंत करनेवाले इंद्र पर चिन्ह लगा दिए थे उसी तरह रस विव्हल राम ने सीता के सयानों पर नख से चिन्ह अंकित कर दिए। रात्रि के अंत के साथ चित्रकूट केलि क्रीड़ा का समापन हुआ। प्रभु ने नित्य कर्म किये। वीरवर उपेंद्र भंज को बीस पदों में यह प्रसंग रचकर संतोष हुआ। यहाँ कवि ने सीता-राम की पुरुषायित क्रीड़ा के माध्यम से ब्रम्ह (राम) का माया (सीता) के अधीन होना इंगित किया है। 

विराध वध कर गोमती, कावेरी, नर्मदा, रेवा, बेतवा, फल्गु, भागा आदि नदियों के किनारे वनों में राम-सीता उसी तरह विहार करते रहे जैसे क्षीर सागर में करते थे। अगस्त्य आश्रम के ऋषि राम के सौंदर्य पर आसक्त होकर स्त्री होने की कामना करने लगे तो राम ने वर दिया इस जन्म में केवल सीता ही उनकी पत्नी हैं। अगले जन्म में वे बृज की गोपियाँ बनेंकर कृष्ण के साथ केलि सुख पा सकेंगे। सूर्पनखा प्रसंग में कवि ने फिर विपरीत रति  का चित्रण किया है।  

बिहि बिधि मदन कंदर्प करिण  
बर कान्त पति मोर हुअन्ते पुण 
बासर दिवस निशि लव करंति 
बिधूनन रति करि मति तोषंति 

शूर्पणखा ने सोचा विधाता ने कंदर्प से उसके मद न (मदन  = काम के लोप = संतुष्टि) हेतु इसका निर्माण किया है। यह मेरा पति होता तो मैं विपरीत रति मन को संतुष्ट करते हुए दिन-रात को मुहूर्त (पल) के समान बिता देती। सीता को देखकर शूर्पणखा ने सोचा जिसे यह उत्तम रमणीरत्न प्राप्त है वह मुझे क्यों स्वीकार करेगा? जिस तरह भौंरा सुगन्धित मालती पुष्प के साथ-साथ निर्गन्ध बासा पुष्प का भी रसपान कर लेता है वैसे ही ये भी अनुरक्त होकर मुझे गोद में धारण करेंगे और रतिबंध संयोग सुख देंगे। वह तरु की आड़ से निकल नर नासिका नाक फुला कर नथ हिलाते है, जांघ का वस्त्र हट जाने देती है, रतिप्रवीणा नायिका की तरह युवा मनों को बाँध लेना चाहती है। वह राम से उनके वन आगमन का कारण जानकर कहती है कि वह भुजबंध, आठ प्रकार के आलिंगनों, चौंसठ प्रकार के काम कलाओं, चक्रबंध तथा विपरीत रतिबंध में निपुण हूँ। 

बशीभूत होइ तव शोभाकुं चाही 
बसि बाकु तुम्भ कोले आसिछि मुहिं 
वन्धन करि भुझरे जाणइ स्वत:
बन्धरे ये चक्र सुख पुरुषायित 

राम-लक्ष्मण को न मोह पाने पर सीता वध के लिए तत्पर सूर्पनखा की नाक-कान कटने पर वह रावण को सीता हरण हेतु भेजती है। स्वर्ण मृग प्रसंग के बाद राम सीता को आश्रम में न पाकर विलाप करते हैं -
बिरहोत्कंठिता सार नागरी रतन
बिचारि त थान्ता नब नब भाबमान
बचन के मुँ ताहारि। बंधने कबरी आणि आसिछि चऊँरी   
बासकसज्जा हुए पाशुं गला क्षणे 
बेष सारि शय्या करि निरेखे प्रांगणे 
बिप्र लब्धा होइ घन। बिकास कुसुमकाले तेजि कोलिस्थान। 
बार-बार अभिसार  मो पाशे पंडिता 
बिपरीत मागिबारे हुई खंडिता 
बिधि प्रोषितभर्तृका। बांधवीकु करिबाकु करुअछि दका। 
वह नारी रत्न सीता विरहोत्कंठिता नयोक्ताओं में श्रेष्ठ हैं। मेरे विरह में वियोगिनी होकर वह तरह-तरह नए-नए भाव अपने मन में ले आती है। मैं उनके एक बार कहते ही कवरी बंधन के लिए चौरी ले आया हूँ। फिर वह मुझसे विमुख क्यों हुई? 
मेरे निकट से जाते ही मेरी प्रिया सीता वासकसज्जा नायिका बन जाती है, वह सुसज्जित होकर सेज सजाकर आँगन में खड़ी होकर मेरी राह जोहती है। प्रिय सीता पुष्पवती होने के समय  केलिस्थान त्यागती है मानो विप्रलब्धा मानिनी नायिका हो। आज वह अवस्था नहीं है, फिर वह दिखाई क्यों नहीं दे रही है?
मेरी प्रिय अभिसारिका नायिका की तरह बार-बार मेरे निकट आने में निपुण  पंडिता है। जब मैं विपरीत रति चाहता तब वह खंडिता नायिका बनती, क्रोध दिखाकर मेरे अनुरोध का खंडन करती। आज तो मैंने विपरीत रति नहीं माँगी फिर उसका यह व्यवहार क्यों हुआ? मुझे विधाता से अपनी प्रिया के प्रोषितभर्तृका होने का संदेह हमेशा रहा है, क्या आज ऐसा ही हुआ है? 
राम विविध प्रकार से सीता के साज-श्रृंगार, मन-मनुहार, उनकी देह की गंध को याद कर विलम्ब से आने हेतु क्षमा प्रार्थना करते हुए, उनसे न छिपने का अनुरोध करते हुए कहते हैं कि मैं चुन-चुन कर पुष्प लाया हूँ, मृग चर्म पर बैठो, तुम्हारे केशों में इन्हें सजा दूँ। 
बहिछु शंका चउँरी देइ मोर हस्त
बदाइबे रचिबाकु कि पुरुषायित  
बोळीबाकु नाहिं नाहिं । बोइला बचन आन होइछि मो काहिं। 
ऐ प्रिये! क्या तुम यह सोच कर भय कर रही हो कि चौंरी को हाथ में देकर तुम्हें विपरीत रति के लिए कहूँगा। नहीं नहीं मैं विपरीत रति हेतु नहीं कहूँगा। तुम जानती हो कि मेरा कहा अन्यथा नहीं होता। 


इस कृति की विशेषता राम-सीता के अभिसार पलों का चित्रण, सीता का पुरुषायत में निपुण होने पर भी संकोच करना, लजाना, शूर्पकहना द्वारा राम-लक्ष्मण के साथ पुरुषायित की कामना करना और सीताहरण के बाद विलाप करते राम द्वारा सीता के पुरुषायित को याद कर, उनके संकोच को देखते हुए पुरुषायित न चाहने का वायदा करना है। संभवत: अन्य किसी ग्रन्थ में इतने घटनाक्रमों में इतनी बार पुरुषायित का उल्लेख न हो। कृति का वैशिष्ट्य हर पंक्ति का 'ब' अक्षर से आरंभ होना भी है। रामचरित मानस से हटकर कवि ने मौलिक चिंतन जनित कथा और घटनाओं से कृति को पठनीय बनाया है।
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ओड़िया साहित्य के महान्‌ कवि उपेंद्र भंज सन्‌ 1665 ई. से 1725 ई. तक जीवित रहे। उन्हें 'कवि सम्राट' कहा जाता है। उनके पिता का नाम नीलकंठ और दादा का नाम भंज था। दो साल राज्य करने के बाद नीलकंठ अपने भाई घनभंज के द्वारा राज्य से निकाल दिए गए। नीलकंठ के जीवन का अंतिम भाग नयागढ़ में व्यतीत हुआ था। उपेंद्र भंज के बारे में यह कहा जाता है कि उन्होंने नयागढ़ के निवासकाल में 'ओड्गाँव' के मंदिर में विराजित देवता श्रीरघुनाथ को 'रामतारक' मंत्रों से प्रसन्न किया था और उनके ही प्रसाद से उन्होंने कवित्वशक्ति प्राप्त की थी। संस्कृत भाषा में न्याय, वेदांत, दर्शन, साहित्य तथा राजनीति आदि सीखने के साथ ही उन्होंने व्याकरण और अलंकारशास्त्र का गंभीर अध्ययन किया था। नयागढ़ के राजा लड़केश्वर मांधाता ने उन्हें 'वीरवर' उपाधि से भूषित किया था। पहले उन्होंने बाणपुर के राजा की कन्या के साथ विवाह किया था, किंतु थोड़े ही दिनों बाद उनके मर जाने के कारण नयागढ़ के राजा की बहन को उन्होंने पत्नी रूप में ग्रहण किया। उनका दांपत्य जीवन पूर्ण रूप से अशांत रहा। उनके जीवनकाल में ही द्वितीय पत्नी की भी मृत्यु हो गई। कवि स्वयं 40 वर्ष की आयु में नि:संतान अवस्था में मरे। पेंद्र भंज रीतियुग के कवि हैं। वे लगभग पचास काव्यग्रंथों के निर्माता हैं। इनमें से 20 ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं। उनके लिखित काव्यों में लावण्यवती, कोटिब्रह्माडसंदुरी और वैदेहीशविलास सुप्रसिद्ध हैं। उड़िया साहित्य में रामचंद्र छोटराय से लेकर यदुमाणि तक 200 वर्ष पर्यंत जिस रीतियुग का प्राधान्य रहा उपेंद्र भंज उसी के सर्वाग्रगण्य कवि माने जाते हैं। उनकी रचनाओं में महाकाव्य, पौराणिक तथा काल्पनिक काव्य, संगीत, अलंकार और चित्रकाव्य अंतर्भुक्त हैं। उनके काव्यों में वर्णित विवाहोत्सव, रणसज्जा, मंत्रणा तथा विभिन्न त्यौहारों की विधियाँ आदि उत्कल की बहुत सी विशेषताएँ मालूम पड़ती हैं। उनकी रचनाशैली नैषध की सी है जिसमें उपमा, रूपकादि अलंकारों का प्राधान्य है। अक्षरनियम और शब्दपांडित्य से उनकी रचना दुर्बोध लगती है। उनके काव्यों में नारी-रूप-वर्णन में बहुत सी जगहों पर अश्लीलता दिखाई पड़ती है। परंतु वह उस समय प्रचलित विधि के अनुसार है। उस समय के काव्यों में श्रृंगार का ही प्राचुर्य रहता था। दीनकृष्ण, भूपति पंडित और लोकनाथ विद्याधर आदि विशिष्ट कविगण उपेंद्र के समकालीन थे। उन सब कवियों ने राजा दिव्यसिंह के काल में ख्याति प्राप्त की थी। उपेंद्र के परवर्ती जिन कवियों ने उनकी रचनाशैली का अनुसरण किया उनमें अभिमन्यु, कविसूर्य बलदेव और यदुमणि प्रभृति माने जाते हैं। आधुनिक कवि राधानाथ और गंगाधर ने भी बहुत हद तक उनकी वर्णनशैली अपनाई।
उड़िया साहित्य में उपेंद्र एक प्रमुख संस्कारक थे। संस्कृतज्ञ पंडितों के साथ प्रतियोगिता में उतरकर उन्होंने बहुत से आलंकारिक काव्यों की भी रचना की। धर्म और साहित्य के बीच एक सीमा निर्धारित करके उन्होंने धर्म से सदैव साहित्य को अलग रखा। उनकी रचनाओं में ऐसे बहुत से देवताओं का वर्णन मिलता है पर प्रभु जगन्नाथ का सबसे विशेष स्थान है। वैदेहीशविलास उनका सबसे बड़ा काव्य है जिसमें प्रत्येक पंक्ति का प्रथम अक्षर 'व' ही है। इसी प्रकार 'सुभद्रा परिणय' और 'कला कउतुक' काव्यों की प्रत्येक पंक्ति यथाक्रम 'स' और 'क' से प्रारंभ हुई है। उनके रसपंचक काव्य में साहित्यिक रस, दोष और गुणों का विवेचन किया गया है। अवनारसतरंग एक ऐसा काव्य है जिसमें किसी भी स्थान पर मात्रा का प्रयोग नहीं हुआ है। शब्दप्रयोग के इस चमत्कार के अतिरिक्त उनकी इस रचना में और कोई मौलिकता नहीं है। उनके काव्यों में वर्णन की एकरूपता का प्राधान्य है। पात्र पात्रियों का जन्म, शास्त्राध्ययन, यौवनागम, प्रेम, मिलन और विरह सभी काव्यों में प्राय: एक से हैं। उनके कल्पनाप्रधान काव्यों में वैदेहीशविलास सर्वश्रेष्ठ है :
उन्होंने 'चौपदीभूषण', 'चौपदीचंद्र', प्रभृत्ति कई संगीतग्रंथ भी लिखे हैं, जो उड़ीसा प्रांत में बड़े जनप्रिय हैं। उनकी संगीत पुस्तकों में आदिरस और अलंकारों का प्राचुर्य हैं। कवि की कई पुस्तकें मद्रास, आंध्र, उत्कल और कलकत्ता विश्वविद्यालयों के पाठयक्रम में गृहीत हैं। वैदेहीशविलास, कोटिब्रह्मांडसुंदरी, लावण्यवती, प्रेमसुधानिधि, अवनारसतरंग, कला कउतुक, गीताभिधान, छंतमंजरी, बजारबोली, बजारबोली, चउपदी हारावली, छांद भूषण, रसपंचक, रामलीलामृत, चौपदीचंद्र, सुभद्रापरिणय, चित्रकाव्य बंधोदय, दशपोइ, यमकराज चउतिशा और पंचशायक प्रभृति उनकी कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं।
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http://www.dwarkadheeshvastu.com/001-Epics-PDF/Vaidehish-Vilas-Oriya/004-Vaidehish-Vilas-Oriya.pdf

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