शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

muktak, muktika, kundalini

मुक्तक
कल्पना के बिना खेल होता नहीं 
शब्द का शब्द से मेल होता यहीं 
गिर 'सलिल' पर हुईं बिजलियाँ लुप्त खुद 
कलप ना, कलपना व्यर्थ होता कहीं?
*
मुक्तिका
*
नाजनीं को नमन मुस्कुरा दीजिए
मशविरा है बिजलियाँ गिरा दीजिए 
*
चिलमनों के न पीछे से अब वार हो
आँख से आँखबरबस मिला दीजिए
 *
कल्पना ही सही क्या बुरा है अगर
प्रेरणा बन के आगे बढ़ा दीजिए
*
कांता के हुए कांत अब तो 'सलिल'
बैठ पलकों पे उनको बिठा दीजिए
*
जो खलिश दिल में बाकी रहे उम्र भर
ले के बाँहों में उसको सजा दीजिए
***

कुंडलिनी
*
जिस पर बिजली गिर गयी, वह तो बैठा शांत
गिरा रहे जो वे हुए अपने आप शांत
अपने आप अशांत बढ़ा बैठे ब्लड प्रेशर 
करें कल्पना हुए लाल कश्मीरी केसर
'सलिल' हुआ है मुग्ध अनूठा रूप देखकर
वह भुगते बिजली गिरनी है अब जिस जिस पर
***

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