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शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

muktak

मुक्तक
*
हुए मिथलेश के दर्शन, न झट क्यों जानकी आती?
लिख रहे राम मन ही मन, अ-भेजी रह गयी पाती
सुनैना ले सुनैना को हुईं जब सामने पल भर-
मधुर छवि देखकर धड़की अजाने साथ ही छाती
*
मन के द्वारे आया कोई, करें प्रतीक्षा आप
लौट न जाए कहीं द्वार से, शून्य न जाए व्याप
जब सपना बन रहा हो, सन्नाटे का जाल
मन ही मन में कीजिए, चुप रह प्रभु का जाप

*
शब्दों को नवजीवन देना, सीख सकें हम काव्य से
लय-गति-यति हो भंग न किंचित किसी छंद संभाव्य से
भाव-बिंब में रहे सुसंगति, हो प्रतीक भी उचित नये
रस-लहरों की बहे नर्मदा, नीरसता का किला ढहे
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