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गुरुवार, 23 फ़रवरी 2017

kavita

एक रचना काव्य और जन-वेदना * काव्य क्या? कुछ कल्पना कुछ सत्य है. यह नहीं जड़, चिरंतन चैतन्य है। देख पाते वह अदेखा जो रहा, कवि मनीषी को न कुछ अव्यक्त है। रश्मि है अनुभूतिमय संवेदना। चतुर की जाग्रत सतत हो चेतना शब्द-वेदी पर हवन मन-प्राण का। कथ्य भाषा भाव रस संप्राणता पंच तत्त्वों से मिले संजीवनी साधना से सिद्धि पाते हैं गुनी। कहा पढ़ सुन-गुन मनन करते रहे जो नहीं वे देखकर बाधा ढहे चतुर्दिक क्या घट रहा, क्या जुड़ रहा? कलम ने जो किया अनुभव वह कहा। पाठकों! अब मौन व्रत को तोड़ दो। ‘तंत्र जन’ का है सदा सच-शुभ ही कहो। अशुभ से जब जूझ जाता ‘लोक’ तो ‘तन्त्र’ में तब व्याप जाता शोक क्यों? ‘प्रतिनिधि’ जिसका न क्यों उस सा रहे? करे सेवक मौज, मालिक चुप दहे? शब्द-शर-संधान कर कवि-चेतना चाहती जन की हरे कुछ वेदना। ***

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