सोमवार, 20 फ़रवरी 2017

samiksha

पुस्तक चर्चा -
नियति निसर्ग : दोहा दुनिया का नया रत्न 
चर्चाकार- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
[पुस्तक परिचय- नियति निसर्ग, दोहा संग्रह, प्रो. श्यामलाल उपाध्याय, प्रथम संस्करण, २०१५, आकार २२.५ से.मी. x १४.५ से.मी., आवरण सजिल्द, जैकेट सहित, पृष्ठ १२६, मूल्य १३०/-, प्रकाशक भारतीय वांग्मय पीठ, लोकनाथ कुञ्ज, १२७/ए/८ ज्योतिष राय मार्ग, नया अलीपुर कोलकाता ७०००५३] 
                                 विश्व वाणी हिंदी के छंद कोष के सर्वाधिक प्रखर और मूल्यवान दोहा कक्ष को अलंकृत करते हुए श्रेष्ठ-ज्येष्ठ शारदा-सुत प्रो. श्यामलाल उपाध्याय ने अपने दोहा संकलन रूपी रत्न 'नियति निसर्ग' प्रदान किया है. नियति निसर्ग एक सामान्य दोहा संग्रह नहीं है, यह सोद्देश्य, सारगर्भित,सरस, लाक्षणिक अभिव्यन्जनात्मकता से सम्पन्न दोहों की ऐसी रसधार प्रवाहित का रहा है जिसका अपनी सामर्थ्य के अनुसार पान करने पर प्रगाढ़ रसानंद की अनुभूति होती है. 

                                 प्रो. उपाध्याय विश्ववाणी हिंदी के साहित्योद्यान में ऐसे वट-वृक्ष हैं जिनकी छाँव में गणित जिज्ञासु रचनाशील अपनी शंकाओं का संधान और सृजन हेतु मार्गदर्शन पाते हैं. वे ऐसी संजीवनी हैं जिनके दर्शन मात्र से माँ भारती के प्रति प्रगाढ़ अनुराग और समर्पण का भाव उत्पन्न होता है. वे ऐसे साहित्य-ऋषि हैं जिनके दर्शन मात्र से श्नाकों का संधान होने लगता है. उनकी ओजस्वी वाणी अज्ञान-तिमिर का भेदन कर ज्ञान सूर्य की रश्मियों से साक्षात् कराती है. 

                                 नियति निसर्ग का श्री गणेश माँ शारदा की सारस्वत वन्दना से होना स्वाभाविक है. इस वन्दना में सरस्वती जी के जिस उदात्त रूप की अवधारणा ही, वह अन्यत्र दुर्लभ है. यहाँ सरस्वती मानवीय ज्ञान की अधिष्ठात्री या कला-संगीत की आदि शक्ति इला ही नहीं हैं अपितु वे सकल विश्व, अंतरिक्ष, स्वर्ग और ब्रम्ह-लोक में भी व्याप्त ब्रम्हाणी हैं. कवि उन्हें अभिव्यक्ति की देवी कहकर नमन करता है. 
'विश्वपटल पर है इला, अन्तरिक्ष में वाणि 
कहीं भारती स्वर्ग में, ब्रम्ह-लोक ब्रम्हाणि' 

                                 'घर की शोभा' धन से नहीं कर्म से होती है. 'कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन' की विरासत नयी पीढ़ी के लिए श्लाघ्य है- 
'लक्ष्मी बसती कर्म में, कर्म बनता भाग्य 
भाग्य-कर्म संयोग से, बन जाता सौभाग्य' 

                                 माता-पिता के प्रति, शिशु के प्रति, बाल विकास, अवसर की खोज, पाठ के गुण विशेष, शिक्षक के गुण, नेता के गुण, व्यक्तित्व की परख जैसे शीर्षकों के अंतर्गत वर्णित दोहे आम आदमी विशेषकर युवा, तरुण, किशोर तथा बाल पाठकों को उनकी विशिष्टता और महत्त्व का भान कराने के साथ-साथ कर्तव्य और अधिकारों की प्रतीति भी कराते हैं. दोहाकार केवल मनोरंजन को साहित्य सृजन का लक्ष्य नहीं मानता अपितु कर्तव्य बोध और कर्म प्रेरणा देते साहित्य को सार्थक मानता है. 

                                 राष्ट्रीयता को साम्प्रदायिकता मानने के वर्तमान दौर में कवि-ऋषि राष्ट्र-चिंतन, राष्ट्र-धर्म, राष्ट्र की नियति, राष्ट्र देवो भव, राष्ट्रयता अखंडता, राष्ट्रभाषा हिंदी का वर्चस्व, देवनागरी लिपि आदि शीर्षकों से राष्ट्रीय की ओजस्वी भावधारा प्रवाहित कर पाठकों को अवगाहन करने का सुअवसर उपलब्ध कराते हैं. वे सकल संतापों का निवारण का एकमात्र मार्ग राष्ट्र की सुरक्षा में देखते हैं. 
आदि-व्याधि विपदा बचें, रखें सुरक्षित आप 
सदा सुरक्षा देश की, हरे सकल संताप 

                                 हिंदी की विशेषता को लक्षित करते हुए कवि-ऋषि कहते हैं- 
हिंदी जैसे बोलते, वैसे लिखते आप 
सहज रूप में जानते, मिटते मन के ताप 

हिंदी के जो शब्द हैं, रखते अपने अर्थ 
सहज अर्थ वे दे चलें, जिनसे हो न अनर्थ 

बस हिंदी माध्यम बने, हिंदी का हो राज 
हिंदी पथ-दर्शन करे, हिंदी हो अधिराज 

हिंदी वैज्ञानिक सहज, लिपि वैज्ञानिक रूप 
इसको सदा सहेजिए, सुंदर स्निग्ध स्वरूप

तकनीकी सम्पन्न हों, माध्यम हिंदी रंग 
हिंदी पाठी कुशल हों, रंग न होए भंग  

                                 देवनागरी लिपि शीर्षक से दिए दोहे भारत के इतिहास में हिंदी के विकास को शब्दित करते हैं. इस अध्याय में हिंसी सेवियों के अवदान का स्मरण करते हुए ऐसे दोहे रचे गए हैं जो नयी पीढ़ी का विगत से साक्षात् कराते हैं. 

                                 संत कबीर, महाबली कर्ण, कविवर रहीम, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, मौनी बाबा तथा श्रीकृष्ण पर केन्द्रित दोहे इन महान विभूतियों को स्मरण मात्र नहीं करते अपितु उनके अवदान का उल्लेख कर प्रेरणा जगाने का काम भी करते हैं. 
कबीर का गुरु एक है, राम नाम से ख्यात 
निराकार निर्गुण रहा, साई से प्रख्यात 

जब तक स्थापित रश्मि है, गंगा जल है शांत 
रश्मिरथी का यश रहे, जग में सदा प्रशांत 

ऐसा कवि पायें विभो, हो रहीम सा धीर 
ज्ञानी दानी वुगी हो, युद्ध क्षेत्र का वीर 

महावीर आचार्य हैं, क्या द्विवेद प्रसाद 
शेरश जागरण काल के, विषय रहा आल्हाद 

मौनी बाबा धन्य हैं, धन्य आप वरदान 
जनमानस सुख से रहे, यही बड़ा अवदान 

                                 भारत कर्म प्रधान देश है. यहाँ शक्ति की भक्ति का विधान सनातन काल से है. गीता का कर्मयोग भारत ही नहीं, सकल विश्व में हर काल में चर्चित और अर्चित रहा है. सकल कर्म प्रभु को अर्पित कर निष्काम भाव से संपादित करना ही श्लाघ्य है- 
सौंपे सरे काज प्रभु, सहज हुए बस जान 
सारे संकट हर लिए, रख मान तो मान 

कर्म कराता धर्म है, धर्म दिलाता अर्थ 
अर्थ चले बहु काम ले, यह जीवन का मर्म 

                                 जातीय छुआछूत ने देश की बहुत हानि की है. कविगुरु कर्माधारित वर्ण व्यवस्था के समर्थक हैं जिसका उद्घोष गीत में श्रीकृष्ण 'चातुर्वर्ण्य माया सृष्टं गुण-कर्म विभागश:' कहकर करते हैं. 
वर्ण व्यवस्था थी बनी, गुणवत्ता के काज 
कुलीनता के अहं ने, अपना किया अकाज 

घृणा जन्म देती घृणा, प्रेम बढ़ाता प्रेम 
इसीलिए तुम प्रेम से, करो प्रेम का नेम 

                                 सर्वधर्म समभाव के विचार की विवेचना करते हुए काव्य-ऋषि धर्म और संप्रदाय को सटीकता से परिभाषित करते हैं- 
होता धर्म उदार है, संप्रदाय संकीर्ण 
धर्म सदा अमृत सदृश, संप्रदाय विष-जीर्ण 

                                 कृषि प्रधान देश भारत में उद्योग्व्र्धक और कृषि विरोधी प्रशासनिक नीतियों का दुष्परिणाम किसानों को फसल का समुचित मूल्य न मिलने और किसानों द्वारा आत्म हत्या के रूप में सामने आ रहा है. कवी गुरु ने कृषकों की समस्या का जिम्मेदार शासन-प्रशासन को ही माना है-
नेता खेलें भूमि से, भूमिग्रहण व्यापार
रोके इसको संहिता, चाँद लगाये चार 

रोटी के लाले पड़े, कृषक भूमि से हीन 
तडपे रक्षा प्राण को, जल अभाव में मीन 

                                 दोहे गोशाला के भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसान की दुर्दशा को बताते हैं. कवी गौ और गोशाला की महत्ता प्रतिपादित करते हैं-
गो में बसते प्राण हैं, आशा औ' विश्वास 
जहाँ कृष्ण गोपाल हैं, करनी किसकी आस 

गोवध अनुचित सर्वथा, औ संस्कृति से दूर 
कर्म त्याज्य अग्राह्य है, दुर्मत कुत्सित क्रूर 

                                 राष्ट्र के प्रति कर्तव्य, स्वाधीनता की नियति, मादक द्रव्यों के दुष्प्रभाव, चिंता, दुःख की निरंतरता, आत्मबोध तत्व, परमतत्व बोध, आशीर्वचन, संस्कार, रक्षाबंधन, शिवरात्रि, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी आदि शीर्षकों के अंतर्गत दिए गए दोहे पाठकों का पाठ प्रदर्शन करने क साथ शासन-प्रशासन को भी दिशा दिखाते हैं. पुस्तकांत में 'प्रबुद्ध भारत का प्रारूप' शीर्षक से कविगुरु ने अपने चिंतन का सार तत्व तथा भविष्य के प्रति चिंतन-मंथन क नवनीत प्रस्तुत किया है- 
सत्य सदा विजयी रहा, सदा सत्य की जीत 
नहीं सत्य सम कुछ जगत, सत्य देश का गीत 

सभी पन्थ हैं एक सम, आत्म सन्निकट जान
आत्म सुगंध पसरते, ईश्वर अंश समान

बड़ी सोच औ काम से, बनता व्यक्ति महान 
       चिंतन औ आचार हैं, बस उनके मन जान   
    
                                 किसी कृति का मूल्याङ्कन विविध आधारों पर किया जाता है. काव्यकृति का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष उसका कथ्य होता है. विवेच्य ८६ वर्षीय कवि-चिन्तक के जीवनानुभवों का निचोड़ है. रचनाकार आरंभ में कटी के शिल्प के प्रति अत्यधिक सजग होता है क्योंकि शिल्पगत त्रुटियाँ उसे कमजोर रचनाकार सिद्ध करती हैं. जैसे-जैसे परिपक्वता आती है, भाषिक अलंकरण के प्रति मोह क्रमश: कम होता जाता है. अंतत: 'सहज पके सो मीठा होय' की उक्ति के अनुसार कवि कथ्य को सरलतम रूप में प्रस्तुत करने लगता है. शिल्प के प्रति असावधानता यत्र-तत्र दिखने पर भी कथ्य का महत्व, विचारों की मौलिकता और भाषिक प्रवाह की सरलता कविगुरु के संदेश को सीधे पाठक के मन-मस्तिष्क तक पहुँचाती है. यह कृति सामान्य पाठक, विद्वज्जनों, प्रशासकों, शासकों, नीति निर्धारकों तथा बच्चों के लिए समान रूप से उपयोगी है. यही इसका वैशिष्ट्य है. 
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-समन्वयम 204 विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, सुभद्रा वार्ड, जबलपुर ४८२००१ 
चलभाष: ९४२५१८३२४४, salil.sanjiv@gmail.com
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