गुरुवार, 2 अक्तूबर 2014

sansmaran: sanjay sinha

कल और आज: कैसा बचपन

संजय सिन्हा

आज पोस्ट लिखने से पहले मैं कई बार रोया। कई बार लगा कि क्या इस अपराध में मैं भी शामिल रहा हूं? क्या जिस चुटकुले को मैं आज आपसे मैं साझा करने जा रहा हूं, उसका पात्र मैं भी हूं? 
फेसबुक के मेेरे भाई श्री Avenindra Mann जी ने यूं ही चलते फिरते ये चुटकुला मुझसे साझा किया था, शायद हंसाने के लिए या फिर हम सबको आइना दिखाने के लिए लेकिन ये इतना मार्मिक चुटकुला था कि इसे पढ़कर मैं खुद अपराधबोध में चला गया। चुटकुला इस तरह है-
एक छोटे से बच्चे ने सुबह अपनी दादी मां से पूछा, "दादी दादी कल रात जब मैं सोने गया था तो एक औरत और एक मर्द जो हमारे घर में आए थे, वो कौन थे? मैंने देखा कि वो चुपचाप भीतर आए और उस कमरे में चले गए थे। फिर सुबह वो दोनों चले भी गए।"
दादी ने कहा, "ओह! तो तूने उन्हें देख ही लिया?"
बच्चे ने कहा, "हां, सोते-सोते मेरी नींद खुल गई थी, और मैंने जरा सी झलक देख ली थी।"
दादी ने कहा, "मेरे बच्चे वो तेरे माता-पिता हैं, दोनों नौकरी करते हैं न! "
अब है तो ये चुटकुला ही। लेकिन मेरे मन में ये बात कुछ ऐसे समा गई कि क्या मेरे बच्चे ने भी बहुत छोटे होते हुए ऐसा सोचा होगा कि रोज रात में घर आने वाला ये आदमी कौन है?
मैंने पुरानी यादों में जाने की जरा सी कोशिश की तो मुझे इतना याद आया कि ये सच है कि अपनी बहुत व्यस्त नौकरी में कई बार मैं अपने घर वालों की एक झलक देखने के लिए सचमुच बहुत तरसा हूं। सुबह जल्दी दफ्तर चले जाना, फिर देर रात तक दफ्तर में रहना, यकीनन मेरे बेटे ने भी कभी न कभी ऐसा सोचा होगा कि रोज रात में घर आने वाला ये है कौन?।
मैं तो जब छोटा था तब बहुत सी कहानियां अपनी मां से सुनी थीं। लेकिन जब मेरा बेटा छोटा था तब मैं उसके लिए बच्चों की कहानियों के कई कैसेट और एक टेपरिकॉर्डर खरीद लाया था। उसे मैंने चंदा मामा की, चिड़िया और दाना की, खरगोश और कछुए की कहानियां उसी कैसेट से सुनाई हैं।
शुरू-शुरू में तो मेरी पत्नी या मैं, उस कैसेट को टेपरिकॉर्डर में लगा कर उसे ऑन कर देते और उसे बिस्तर पर लिटा कर कहते कि ये कहानी सुनो। लेकिन जल्दी ही उसने खुद ही कैसेट लगाना सीख लिया और मुझे याद है कि एक बार मैं घर आया तो वो चुपचाप बिस्तर पर जाकर लेट गया और अपने आप कहानी सुनने लगा। मैंने उसे बुलाने की कोशिश की तो उसने कहा कि ये कहानी टाइम है। वो कहानियां सुनते-सुनते सो जाता।
शुरू-शुरू में हम अपने घर और परिवार में फख्र से बताते कि कल सुबह की फ्लाइट से मैं मुंबई जा रहा हूं। वहां मीटिंग है। देर शाम मैं वहीं से कोलकाता के लिए निकलूंगा।
जिस दिन सिंगापुर, हांगकांग, मलेशिया निकलना होता उस दिन तो ऐसे इतराते हुए भाव में रहता कि पूछिए मत। अड़ोसी-पड़ोसी हैरत भरी निगाहों से देखते और सोचते कि मिस्टर सिन्हा कितने भाग्यशाली हैं जो रोज-रोज हवाई जहाज में जाते हैं, फिर आते हैं। मैं भी खुद को हाई फ्लायर कहता। दिल्ली एयरपोर्ट पर नाश्ता करता, मुंबई में खाना खाता। कभी फोन करता कि बस अभी-अभी चेन्नई पहुंचा हूं, अभी कल सुबह लंदन के लिए निकलना है।
ये सब नौकरी के हिस्सा हुआ करते थे। संसार के सभी अति व्यस्त पिताओं की तरह मैं भी व्यस्त रहने को अपनी खूबी मानता था। शायद पहले भी कभी लिखा है कि एक समय ऐसा भी आया था जब मेरी पत्नी एक सूटकेस मेरी कार में रख दिया करती थी, कि पता नहीं मुझे कब कहां जाना पड़ जाए?
एक दिन जब मैं घर आया तो मैंने देखा कि मेरे बेटे के बाल काफी बढ़ गए हैं। वो बहुत छोटा था और पास के उस सैलून में मैं नहीं चाहता था कि पत्नी जाए, इसलिए उसके बाल नहीं कट पाए थे। उसके बढ़े हुए बाल देख कर मैं बहुत दुखी हुआ।
सोचने लगा कि भला ऐसी नौकरी का क्या फायदा, जिसमें अपने बेटे के बाल भी महीने में एकदिन उसे साथ ले जाकर नहीं कटवा सकता?
उस दिन मैं सचमुच बहुत िवचलित हुआ। मुझे याद आने लगा कि जब मैं छोटा था, महीने के आखिरी रविवार को आमतौर पर पिताजी की उंगली पकड़ कर मैं उस सैलून में जाया करता था, जहां बाल काटने वाले को पता होता था कि आज संजू आएगा, और उसके समझाने के बाद भी वो अपने सिर को कभी इधर हिलाएगा, कभी उधर हिलाएगा और फिर पकड़-पकड़ कर वो उसके बाल काटेगा।
मेरे लिए बाल कटवाना उत्सव जैसा होता था। बाल काटने वाला कहता कि इधर देखो नहीं तो कान कट जाएंगे। मैं अपने दोनों हाथों से कानों को पकड़ लेता। फिर शुरू होता मान मनव्वल और धमकाने का दौर। और मैं आखिर में तब मानता जब पिताजी मुंह में एक टॉफी रख देते।
बाल कटने के बाद पिताजी सब्जी खरीदते, मेरे लिए चंपक खरीदते, एक दो टॉफियां एक्स्ट्रा खरीदते जैसे कि मैंने बाल कटवा कर उन पर अहसान किया हो।
कभी-कभी बाटा की दुकान पर ले जाकर जूते खरीदवाते। मतलब ये कि उस रविवार मैं और पिताजी भाई-भाई हो जाते। फिर जब हम घर आते तो मां बहुत देर तक प्यार करती। पिताजी को दुलार से डपटती कि इतने छोटे बाल क्यों करा दिए। पहले एकदम कन्हैया जैसा लगता था मेरा बेटा, और आपने इतने छोटे करा दिए।
फिर मां मुझे खुद नहलाती, बालों में खूब साबुन लगाती, कहती कि बाल कटा कर बिना नहाए कुछ और नहीं करना चाहिए।
ऐसे दोपहर होते होते खाना लगता। पिताजी अखबार पढ़ते उतनी देर में खाना लग जाता।
रविवार का दिन, मतलब अलग तरह का व्यंजन। चावल, दाल, रोटी, आलू की भुंजिया, सब्जी, दही, पापड़, चटनी, कभी-कभी पकौड़े… न जाने कितनी सारी चीजें।
मन में आता कि काश रोज ये रविवार होता। मैं और पिताजी साथ-साथ यूं ही रोज खाना खाते। पिताजी खाना खाते-खाते मेरी ओर देखते और कहते कि दही तो खा ही नहीं रहे तुम। मैं कहता कि आखिर में चीनी डाल कर खाउंगा। पिताजी मुस्कुराते और कहते चीनी ज्यादा नहीं खानी चाहिए, तुमने वैेसे भी दो-दो टॉफियां खाई हैं।
और तब तक मां वहां आ जाती, कहती कि बच्चे चीनी नहीं खाएंगे तो भला कौन खाएगा?
और ऐसे ही हम सारा दिन मस्ती करते।
रविवार के अलावा दो अक्तूबर, पंद्रह अगस्त, दशहरा जैसी छुट्टियों की तो बात ही निराली होती।
दशहरा मेें आस-पास बजने वाले लाउड स्पीकर माहौल के ऐसा खुशनुमा बना देते कि लगता घर में किसी की शादी है। पिताजी हर बार दशहरे पर पास के मेेले में ले जाते। मां खूब सुंदर सी साड़ी पहन कर तैयार होती। मेरे लिए भी हर दशहरे पर नए कपड़े आते।
पर मुझे नहीं याद कि किस दो अक्तूबर और किस दशहरे पर मैं अपने बेटे के लिए घर रहा हूं। मुझे नहीं याद कि कब आखिरी बार मैं अपने बेटे की उंगली पकड़ कर उसे पार्क ले गया हूं। अब बेटा बड़ा हो गया है, उसे शायद याद हो या न हो, लेिकन मुझे उस चुटकुले को पढ़ कर सबकुछ याद आ रहा है।
उन मां-बाप के बारे में याद आ रहा है जो मजाक में ही कहते हैं कि अरे वो तो बहुत व्यस्त हैं, बहुत ज्यादा व्यस्त हैं और वो जब घर आते हैं, तो उनका संजू सो चुका होता है।
पर मेरा यकीन कीजिए कई संजू सोए नहीं होते। वो चुपचार आंखें खोल कर ये जानने की कोशिश करते हैं कि उसके घर आने वाले ये दोनों लोग कौन हैं, जो रोज रात में आते हैं, और सुबह-सुबह चले जाते हैं?
अगर आपका संजू भी छोटा हो तो इस चुटकुले को चुटकुला मत समझिएगा। इस पर हंसिएगा भी मत।
सोचिएगा और सिर्फ सोचिएगा कि क्या सचमुच हर सुबह हम जो घर से निकल पड़ते हैं अपनी खुशियों की तलाश में, वो खुशियां ही हैं?

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