मंगलवार, 12 फ़रवरी 2019

त्रिपदि / माहिया

कुछ त्रिपदियाँ
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वादे मत बिसराना,
तुम हारो या जीतो-
ठेंगा मत दिखलाना।
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जनता भी सयानी है,
नेता यदि चतुर तो
यान उनकी नानी है।
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कर सेवा का वादा,
सत्ता-खातिर लड़ते-
झूठा है हर दावा।
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पप्पू का था ठप्पा,
कोशिश रंग लाई है
निकला सबका बप्पा।
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औंधे मुँह गर्व गिरा,
जुमला कह वादों को
नज़रों से आज गिरा।
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रचना न चुराएँ हम,
लिखकर मौलिक रचना
निज नाम कमाएँ हम।
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गागर में सागर सी
क्षणिका लघु, अर्थ बड़े-
ब्रज के नटनागर सी।
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मन ने मन से मिलकर
उन्मन हो कुछ न कहा-
धीरज का बाँध ढहा।
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है किसका कौन सगा,
खुद से खुद ने पूछा?
उत्तर जो नेह-पगा।
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तन से तन जब रूठा,
मन, मन ही मन रोया-
सुनकर झूठी-झूठा।
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तन्मय होकर तन ने,
मन-मृण्मय जान कहा-
क्षण भंगुर है दुनिया।
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