सोमवार, 8 अप्रैल 2019

सामयिक दोहे

सामायिक दोहे
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बेचो घोड़े-गधे भी, सोओ होकर मस्त।
खर्राटे ऊँचे भरो, करो सभी को त्रस्त।।
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दूर रहो उससे सदा, जो धोता हो हाथ।
झट पीछे पड़ गया तो, पीटोगे निज माथ।।
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टाँग अड़ाना है 'सलिल', जन्म सिद्ध अधिकार।
समझ सको कुछ या नहीं, दो सलाह हर बार।।
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देवी दर्शन कीजिए, भंडारे के रोज।
देवी खुश हो जब मिले, बिना पकाए भोज।।
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हर ऊँची दूकान के, फीके हैं पकवान।
भाषण सुनकर हो गया, बच्चों को भी ज्ञान।।
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नोट वोट नोटा मिलें, जब हों आम चुनाव।
फिर वोटर भूखा मरे, कहीं न मिलता भाव।।
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देवी खड़ीं चुनाव में, नित रखती नौ रूप।
कहें भिखारी से हुई, मैं भिक्षुक तुम भूप।।
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कौन किसी का सगा है, कहो पराया कौन?
प्रश्न किया जब भी मिला, उत्तर केवल मौन।।
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ठिठुर रहा था तुम मिलीं, जीवन बना बसंत।
दूर गईं पतझड़ हुआ, मन बैरागी संत।।
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तुम मैके मैं सासरे, हों तो हो आनंद।
मैं मैके तुम सासरे, हों तो गूँजे छंद।।
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तू-तू मैं-मैं तभी तक, जब तक मन थे दूर।
तू-मैं मिल ज्यों हम हुए, साँस हुई संतूर।।
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दो हाथों में हाथ या, लो हाथों में हाथ।
हँसें अधर मिल-लज नयन, कहें सार्थक साथ।।
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नयन मिला छवि कैद कर, मूँदे नयन कपाट।
हुए चार दो रह गए, नयना खुद को हार।।
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