मंगलवार, 9 अप्रैल 2019

द्विपदी

द्विपदी 
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परवाने जां निसार कर देंगे. 
हम चराग-ए-रौशनी तो बन जाएँ..
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तितलियों की चाह में भटको न तुम. 
फूल बन महको चली आएँगी ये..
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जब तलक जिन्दा था रोटी न मुहैया थी.
मर गया तो तेरहीं में दावतें हुईं..
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बाप की दो बात सह नहीं पाते 
अफसरों की लात भी परसाद है..
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पत्थर से हर शहर में मिलते मकां हजारों.
मैं ढूँढ-ढूँढ हारा, घर एक नहीं मिलता..
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संवस

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