सोमवार, 11 मई 2015

navgeet: sanjiv

नवगीत:
मैं नहीं मैं 
संजीव 
*
मैं,
नहीं मैं
माँ तुम्हारा अक्स हूँ.
.
ख्वाब तुमने देखकर ताबीर की
गृहस्थी की मूर्तित तस्वीर की
आई जब भी कोई मुश्किल डट गयीं
कोशिशें अनथक करीं, तदबीर की
अमरकंटक मनोबल से जीत पा
नीति को संबल किया, नित गीत गा
जानता हूँ
तुम्हारा ही
नक्श हूँ.
मैं,
नहीं मैं
माँ तुम्हारा अक्स हूँ.
.
कलम मेरे हाथ में हो भाव तुम
शब्द मैं अन्तर्निहित हो चाव तुम
जिंदगी यह नर्मदा है नेह की
धार में पतवार पापा, नाव तुम
बन लहर बच्चे तुम्हारे साथ हों
रहें यूँ निर्मल कि ऊँचे माथ हों
नहीं
तुम सा
हो सका मैं दक्ष हूँ?
मैं,
नहीं मैं
माँ तुम्हारा अक्स हूँ.
.
सृजन-पथ पर दे रहीं तुम हौसला
तुम्हीं से आबाद है घर-घोंसला
सुधि तुम्हारी जिंदगी की प्रेरणा
दुआ बन तुम संग हुईं, सपना पला
छवि तुम्हारी मन-बसी अहसास है
तिमिर में शशिकिरण का आभास है
दृष्टि
बन जिसमें बसीं
वह अक्ष हूँ
मैं,
नहीं मैं
माँ तुम्हारा अक्स हूँ.
*

कोई टिप्पणी नहीं: