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बुधवार, 6 मई 2015

navgeet: sanjiv

एक रचना:
संजीव 
. 
जैसा किया है तूने 
वैसा ही तू भरेगा
. 
कभी किसी को धमकाता है 
कुचल किसी को मुस्काता है 
दुर्व्यवहार नायिकाओं से 
करता, दानव बन जाता है 
मार निरीह जानवर हँसता  

​कभी न किंचित शर्माता है 

बख्शा नहीं किसी को 

कब तक बोल बचेगा 

. 

​सौ सुनार की भले सुहाये  

एक लुहार जयी हो जाए  

अगर झूठ पर सच भारी हो 

बददिमाग रस्ते पर आये 

चक्की पीस जेल में जाकर 

ज्ञान-चक्षु शायद खुल जाए 

साये से अपने खुद ही 

रातों में तू डरेगा 

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