रविवार, 29 नवंबर 2015

vinokti alankar

अलंकार सलिला ३५
 विनोक्ति अलंकार
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बिना वस्तु उपमेय को, जहाँ दिखाएँ हीन.

है 'विनोक्ति' मानें 'सलिल', सारे काव्य प्रवीण..

जहाँ उपमेय या प्रस्तुत को किसी वस्तु के बिना हीन या रम्य वर्णित किया जाता है वहाँ विनोक्ति अलंकार होता है.

१. देखि जिन्हें हँसि धावत हैं लरिकापन धूर के बीच बकैयां.
    लै जिन्हें संग चरावत हैं रघुनाथ सयाने भए चहुँ बैयां.
    कीन्हें बली बहुभाँतिन ते जिनको नित दूध पियाय कै मैया.
    पैयाँ परों इतनी कहियो ते दुखी हैं गोपाल तुम्हें बिन गैयां.

२. है कै महाराज हय हाथी पै चढे तो कहा जो पै बाहुबल निज प्रजनि रखायो ना.
    पढि-पढि पंडित प्रवीणहु भयो तो कहा विनय-विवेक युक्त जो पै ज्ञान गायो ना.
    अम्बुज कहत धन धनिक भये तो कहा दान करि हाथ निज जाको यश छायो ना.
    गरजि-गरजि घन घोरनि कियो तो कहा चातक के चोंच में जो रंच नीर नायो ना.

३. घन आये घनघोर पर, 'सलिल' न लाये नीर.
    जनप्रतिनिधि हरते नहीं, ज्यों जनगण की पीर..

४. चंद्रमुखी है / किन्तु चाँदनी शुभ्र / नदारद है.

५. लछमीपति हैं नाम के / दान-धर्म जानें नहीं / नहीं किसी के काम के  

६. समुद भरा जल से मगर, बुझा न सकता प्यास
    मीठापन जल में नहीं, 'सलिल' न करना आस

७. जनसेवा की भावना, बिना सियासत कर रहे
    मिटी न मन से वासना, जनप्रतिनिधि कैसे कहें?

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