शनिवार, 30 जून 2012

एक गीत जिंदगी के नाम .. महेन्द्र कुमार शर्मा


एक गीत जिंदगी के नाम
 
                                        .. महेन्द्र कुमार शर्मा
 
 
माया के इस मोह-जाल मे, उलझ गयी तो दुख पायेगी,
चाहों के इस चक्रव्यूह से निकल गयी तो सुख पायेगी.
जीने की दो ही राहें हैं, बाकी सभी छ्लावा केवल
गलत चुना तो पछ्तायेगी, बोल जिन्दगी, किधर जायेगी.
 
लोगों की नादानी देखो, ज्ञानी हो कर भी, अज्ञानी 
गंगाजल की बातें करते, व्यवहारों में खारा पानी,                                 
दुनिया के मायादर्पण में, आडम्बर ही आडम्बर है,                                       सच का दर्पण साथ रखेगी, संवर जायेगी,निखर जायेगी. 
बोल जिन्दगी.........
 
मन का नट, नटखट होता है, बिना लिखा नाटक होता है,
सपनों के झीने घूंघट मे, यादों का पनघट होता है,
इधर खनक है मधुकलशो की, उधर आरती का गुन्जन है,
इधर गई तो बहक जायेगी, उधर महक से भर जायेगी.
बोल जिन्दगी.....
 
स्वर्णमृगों की हर चाहत पर लक्ष्मण रेखाएं होती है,
नैतिक पतन पुरुष क हो तो,पीडित अबलायें होती हैं.
सीता हरण प्रसंग इधर है,चीरहरण के दृश्य उधर हैं.
इधर बन्दिनी बन जायेगी,उधर शर्म सें मर जायेगी.
बोल जिन्दगी..
 
अन्त नहीं तृष्णा का कोई, साक्षी हो इतिहास रहा है,
पीडा क पुश्तैनी घर तो, सुख के घर के पास रहा है,
इन्द्रासन के चित्र इधर है,मन का विश्वामित्र उधर है,
वही मेनका फ़िर आई तो भंग तपस्या कर जायेगी.
 
बोल जिन्दगी..
mahendra sharma <mks_141@yahoo.co.in>
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