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सोमवार, 12 जून 2017

hasya kavita

एक रचना 
ठेंगा
*
ठेंगे में 'ठ', ठाकुर में 'ठ', ठठा हँसा जो वह ही जीता 
कौन ठठेरा?, कौन जुलाहा?, कौन कहाँ कब जूते सीता? 
बिन ठेंगे कब काम चला है?, लगा, दिखा, चूसो या पकड़ो
चार अँगुलियों पर भारी है ठेंगा एक, न उससे अकड़ो
ठेंगे की महिमा भारी है, पूछो ठकुरानी से जाकर
ठेंगे के संग जीभ चिढ़ा दें, हो जाते बेबस करुणाकर
ठेंगा हाथों-लट्ठ थामता, पैरों में हो तो बेनामी
ठेंगा लगता, इसकी दौलत उसको दे देता है दामी
लोक देखता आया ठेंगा, नेता दिखा-दिखा है जीता
सीता-गीता हैं संसद में, लोकतंत्र को लगा पलीता
राम बाग़ में लंका जैसा दृश्य हुआ अभिनीत, ध्वंस भी
कान्हा गायब, यादव करनी देख अचंभित हुआ कंस भी
ठेंगा नितीश मुलायम लालू, ममता माया उमा सोनिया
मौनी बाबा गुमसुम-अण्णा, आप बने तो मिले ना ठिया
चाय बेचकर छप्पन इंची, सीना बन जाता है ठेंगा
वादों को जुमला कहता है, अंधे को कहता है भेंगा
लोकतंत्र को लोभतंत्र कर, ठगता ठेंगा खुद अपने को
ढपली-राग हो गया ठेंगा, बेच रहा जन के सपने को
नहीं किसी से एक सम्हलती, चार-चार को विहँस सम्हाले
ठेंगे का पुरुषार्थ गज़ब है, चारों हो हँस साथ दबा ले
'ही' हो या 'शी' रूप न बदले ठेंगा कभी न ठेंगी होता
है समाजवादी पक्का यह, कभी ना अपना धीरज खोता
बाप-चचा रह गए देखते, पूत-भतीजे के ठेंगे को
पंजे ने पंचर की सैकिल, सैकिल ने पटका पंजे को
 अन्शंबाज मुख्यमंत्री ने कृषकों को ठेंगा दिखलाया
आश्वासन से करी आरती, नव वादों का भोग लगाया
 ठेंगे के आगे नतमस्तक, चतुर अँगुलियाँ चले न कुछ बस
ठेंगे ठाकुर को अर्पित कर भोग लगाओ, 'सलिल' मिले जस
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