मंगलवार, 11 जून 2013

bundeli, muktika, sanjiv

बुन्देली मुक्तिका:
बखत बदल गओ
संजीव
*
बखत बदल गओ, आँख चुरा रए।
सगे पीठ में भोंक छुरा रए।।
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लतियाउत तें कल लों जिनखों
बे नेतन सें हात जुरा रए।।
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पाँव  कबर मां लटकाए हैं
कुर्सी पा खें चना मुरा रए।।
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पान तमाखू गुटका खा खें
भरी जवानी गाल झुरा रए।।
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झूठ प्रसंसा सुन जी हुमसें
सांच कई तेन अश्रु ढुरा रए।।
*

1 टिप्पणी:

kusum vir ने कहा…

Kusum Vir via yahoogroups.com

आदरणीय आचार्य जी,
बहुत - बहुत सुन्दर, सटीक, सशक्त और सामयिक बुन्देली मुक्तिका l
सच में समय बदल गया है l
सभी छंद एक से बढकर एक हैं l
मन को बहुत ही भाये l
सादर,
कुसुम वीर