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शुक्रवार, 7 जून 2013

doha geet: jitanee aankhen... sanjiv

दोहा गीत:
जितनी आँखें...
संजीव
*
मूंदीं आँखें देखे सपने,
हुए पराये पल में अपने…
*
चाहे निष्क्रिय कर-कमल, तजकर सक्रिय हाथ।
शीश झुका अभिमान का, उठा विनय का माथ।।
प्राणप्रिया जिसको कहा, बना उसीका नाथ-
हरजाई हो चाहता, जनम-जनम का साथ।।
चुने बेतुके-बेढब नपने,
सोच लगी है टाँगें कंपने...
*
घड़ियाली आँसू बहा, किया आत्म-संतोष।
अश्रु न पोछे दर्द के, अनदेखा कर रोष।।
टोटा जिसमें टकों का, लेकर ऐसा कोष-
अपने मुँह से कर रहा, खुद अपना जयघोष।।
पैर लगे पापों में गपने,
साथ न देते भगने-छिपने...
*
येन-केन पद पा किया, जी भर भ्रष्टाचार।
मूल्यहीनता-नग्नता, ठगी हुई व्यापार।।
शत्रु  देश की धरा पर, भले करे अधिकार-
मात्र यही है कामना, बनी रहे सरकार।।
चल पद-मद की माला जपने
चन्दन लगा भले जल-तपने...
*


1 टिप्पणी:

S.P.Shrivastava ने कहा…

S. P. Srivastava
Very Very good.