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सोमवार, 18 दिसंबर 2017

दोहा दुनिया-

शिव को बाहर खोज मत,
मन के भीतर झाँक.
सत्-सुंदर ही शिवा हैं,
आँक सके तो आँक.
.
शिवा कार्य-कारण बनें,
शिव हों सहज निमित्त.
परि-सम्पूरक जानिए,
जैसे हों तन-चित्त.
.
शिव तो देहातीत हैं,
उन्हें देह मत मान.
शिव से सच कब छिप सका?
तुरत हरें अभिमान.
.
शिव भोले भाले दिखें,
किंतु चतुर हैं खूब.
हैं भोले भाले लिए,
सजग ध्यान में डूब.
.
अहंकार गिरि पर बसें,
शिव रखकर निज पैर,
अहं गला ममता बना,
शिवा रहें निर्वैर.
...
18.12.2017

रविवार, 17 दिसंबर 2017

geet

त्रिपदिक गीत "झरोखा"
सुनीता सिंह अँधेरे से उजाले की ओर, १७ स्याह से हरियाली की ओर, १६ आस का एक झरोखा खुलता है ।। १९ ५२ मन - तमस के उस पार ही, १४ कालिमा यदि हजार भी, १३ उम्मीद का सवेरा मिलता है।। १८ ४५
खुद ही चमकना सूरज सा, १५ घोर अँधेरा धीरज का, १४
बस यही फ़लसफ़ा चलता है ।। १६ ४४ लाखों आँधियाँ दिया बुझाएँ १७ आग जलाकर भस्म बनाएँ, १६ हर हाल अंतस दीप जलता है।। १८ ५१ उड़ान हौसलों की रखकर १५ पहाड़ मुश्किलों के चढ़कर १५ उपलब्धि का गुल खिलता है।। १५
४५ दिल ख्वाब खोकर आहत हो, १५ जड़ पत्थर सी चाहत हो, १४ वक्त नहीं किसको छलता है।। १६ ४५ ताश की तरह पत्तों का घर १६ या आग के कुछ ऊपर कागज १७ जीवन प्रतिकूल ही में पलता है। १९ ५२ दम घुटता धुआँ हटाओ, १४ खोल झरोखा नूर बुलाओ, १६ एक बार जीवन मिलता है।। १६
४६ छल-कपट का तोहफा लिए, १५ जो झूठा फ़लसफ़ा कहे, १५ इक दिन वो हाथ मलता है।। १५ ४५ गिरने पर जो हाथ बढ़ाए, १६ मन बदले तो साथ न आए, १६ कैसे बयां भी हो कितना खलता है।। २१ ५३ अतिशय पीड़ा सहकर, १२ राह भरोसे ठोकर खाकर, १६ नूर दिल में छुपा निकलता है। १७
४५ घाव जहांँ से रिसे अधिक १४ चोट जहाँ पर सर्वाधिक १४ प्रकाश वहीं प्रवेश करता है।। १७ ४५ उगता सूरज समां सजाये १६ किरणें बंद कोपलें खुलवायें १८ पर चढ़ता सूरज भी ढलता है।। १८
५२

geet

राष्ट्र निर्माता सरदार पटेल
जन्म- ३१.१०.१८७५, नाडियाद, बंबई रेसीड़ेंसी (अब गुजरात), आत्मज- लाड बाई-झबेर भाई पटेल, पत्नी- झबेर बा, भाई- विट्ठल भाई पटेल, शिक्षा- विधि स्नातक १९१३, पुत्री- मणि बेन पटेल, पुत्र- दया भाई पटेल, निधन- १५ दिसंबर १९५०। १९१७- सेक्रेटरी गुजरात सभा, १९१८- कैरा बाढ़ के बाद 'कर नहीं' किसान आन्दोलन, असहयोग आन्दोलन हेतु ३ लाख सदस्य बनाये, १.५० लाख रूपए एकत्र किए, १९२८ कर वृद्धि विरोध बारडोली सत्याग्रह, १९३० नमक सत्याग्रह कारावास, १९३१ गाँधी-इरविन समझौता मुक्ति, कोंग्रेस अध्यक्ष कराची अधिवेशन, १९३४ विधायिका चुनाव, नहीं लदे, दल को जयी बनाया, १९४२ भारत छोडो, गिरफ्तार, १९४५ रिहा, १९४७ गृह मंत्री भारत सरकार, ५६२ रियासतों का एकीकरण, १९९१ भारत रत्न। 
गीत- 
राजनीति के 
रंगमंच पर 
अपनी आप मिसाल थे.
गोरी सत्ता 
रौंद अस्मिता भारत की मदमाती थी.
लौह पुरुष की 
राष्ट्र भक्ति से डर जाती, झुक जाती थी.
भारत माँ के 
कंठ सुशोभित 
माणिक-मुक्त माल थे. 
.  
पैर जमीं पर जमा 
हाथ से छू पाए आकाश को.
भारत माँ की 
पराधीनता के, तोड़ा हर पाश को.
तिमित गुलामी 
दूर हटाया 
जलती हुई मशाल थे.
आम आदमी की 
पीड़ा को सके मिटा सरदार बन.
आततायियों से 
जूझे निर्भीक सबक किरदार बन. 
भारतवासी 
तुम सा नेता  
पाकर हुए निहाल थे.
१५-१२-२०१७ 

samiksha

कृति चर्चा: 
बाँसों के झुरमुट से : मर्मस्पर्शी नवगीत संग्रह 
चर्चाकार: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
*
[कृति विवरण: बाँसों के झुरमुट से, नवगीत संग्रह, ब्रजेश श्रीवास्तव, आकार डिमाई, आवरण बहुरंगी लैमिनेटेड जैकेटयुक्त सजिल्द, पृष्ठ ११२, २५०/-, उत्तरायण प्रकाशन लखनऊ]
*
हिंदी साहित्य का वैशिष्ट्य आम और खास के मध्य सेतु बनकर भाव सरिता की रस लहरियों में अवगाहन का सुख सुलभ कराना है. पाषाण नगरी ग्वालियर के नवनीत हृदयी वरिष्ठ नवगीतकार श्री ब्रजेश श्रीवास्तव का यह नवगीत संग्रह एक घाट की तरह है जहाँ बैठकर पाठक-श्रोता न केवल अपने बोझिल मन को शांति दे पाता है अपितु व्यथा बिसराकर आनंद भी पाता है. ब्रजेश जी की वाणी का मखमली स्पर्श उनके नवगीतों में भी है.

बाँसों के झुरमुट से आती चिरैया के कलरव से मन को जैसी शांति मिलती है, वैसी ही प्रतीति ये नवगीत कराते हैं. राग-विराग के दो तटों के मध्य प्रवहित गीतोर्मियाँ बिम्बों की ताज़गी से मन मोह लेती हैं:
नीड़ है पर स्वत्व से हम / बेदखल से हैं 
मूल होकर दिख रहे / बरबस नकल से हैं 
रास्ता है साफ़ फ्रूटी, कोक / कॉफी का 
भीगकर फूटे बताशे / खूब देखे हैं

पारिस्थितिक विसंगतियों को इंगित करते हुए गीतकार की सौम्यता छीजती नहीं। सामान्य जन ही नहीं नेताओं और अधिकारियों की संवेदनहीनता और पाषाण हृदयता पर एक व्यंग्य देखें:
सियाचिन की ठंड में / पग गल गये 
पाक -भारत वार्ता पर / मिल गये
एक का सिंदूर / सीमा पर पुछा 
चाय पीते पढ़ लिया / अखबार में

ब्रजेश जी पर्यावरण और नदियों के प्रदूषण से विशेष चिंतित और आहत हैं. यह अजूबा है शीर्षक नवगीत में उनकी चिंता प्रदूषणजनित रोगों को लेकर व्यक्त हुई है:
कौन कहता बह रही गंगो-यमुन
बह रहा उनमें रसायन गंदगी भी 
उग रही हैं सब्जियाँ भी इसी जल से 
पोषते हम आ रहे बीमारियाँ भी

नारी उत्पीड़न को लेकर ब्रजेश जी तथाकथित सुधारवादियों की तरह सतही नारेबाजी नहीं करते, वे संग्रह के प्रथम दो नवगीतों 'आज अभी बिटिया आई है' और 'देखते ही देखते बिटिया' में एक पिता के ममत्व, चिंता और पीड़ा के मनोभावों को अभिव्यक्त कर सन्देश देते हैं. इस नवगीत के मुखड़े और अंतरांत की चार पंक्तियों से ही व्यथा-कथा स्पष्ट हो जाती है:
बिटिया सयानी हो गई 
बिटिया भवानी हो गई 
बिटिया कहानी हो गई 
बिटिया निशानी हो गई

ये चार पंक्तियाँ सीधे मर्म को स्पर्श करती हैं, शेष गीत पंक्तियाँ तो इनके मध्य सोपान की तरह हैं. किसी नवगीत में एक बिम्ब अन्तरा दर अन्तरा किस तरह विकसित होकर पूर्णता पाता है, यह नवगीत उसका उदहारण है. 'सरल सरिता सी समंदर / से गले मिलने चली' जैसा रूपक मन में बस जाता है. कतिपय आलोचक अलंकार को नवगीत हेतु अनावश्यक मानते हैं कि इससे कथ्य कमजोर होता है किन्तु ब्रजेश जी अलंकारों से कथ्य को स्पष्टा और ग्राह्यता प्रदान कर इस मत को निरर्थक सिद्ध कर देते हैं.
ब्रजेश जी के पास सिक्त कंठ से इस नवगीत को सुनते हुए भद्र और सुशिक्षित श्रोताओं की आँखों से अश्रुपात होते मैंने देखा है. यह प्रमाण है कि गीतिकाव्य का जादू समाप्त नहीं हुआ है.
ब्रजेश जी के नवगीतों का शिल्प कथ्य के अनुरूप परिवर्तित होता है. वे मुखड़े में सामान्यतः दो, अधिकतम सात पंक्तियों का तथा अँतरे में छ: से अठारह पंक्तियों का प्रयोग करते हैं. वस्तुतः वे अपनी बात कहते जाते हैं और अंतरे अपने आप आकारित होते हैं. उनकी भाषिक सामर्थ्य और शब्द भण्डार स्वतः अंतरों की पंक्ति संख्या और पदभार को संतुलित कर लेते हैं.कहीं भी ऐसा प्रतीत नहीं होता कि सायास संतुलन स्थापित किया गया है. 'आज लिखी है घर को चिट्ठी' नवगीत में अभिव्यक्ति की सहजता देखें:
माँ अब भी रोटी-पानी में / ही खटती होगी
साँझ समय बापू के संग / मुझको रटती होगी 
उनका मौन बुलावा आया / बहुत दिनों के बाद

यहाँ 'रटती' शब्द का प्रयोग सामान्य से हटकर किन्तु पूरी तरह स्वभाविक है. नव रचनाकारों को किसी शब्द का सामान्य अर्थ से हटकर प्रयोग कैसे किया जाए और बात में अपना रंग भरा जाए- ऐसे प्रयोगों से सीखा जा सकता है. 'मौन बुलावा' भी ऐसा ही प्रयोग है जो सतही दृष्टि से अंतर्विरोधी प्रतीत होते हुए भी गहन अभिव्यंजना में समर्थ है.
ब्रजेश जी की भाषा आम पाठक-श्रोता के आस-पास की है. वे क्लिष्ट संस्कृत या अरबी-फ़ारसी या अप्रचलित देशज शब्द नहीं लेते, इसके सर्वथा विपरीत जनसामान्य के दैनंदिन जीवन में प्रचलित शब्दों के विशिष्ट उपयोग से अपनी बात कहते हैं. उनके इन नवगीतों में आंग्ल शब्द: फ्रॉक, सर्कस, ड्राइंग रूम, वाटर बॉटल, ऑटो, टा टा, पेरेंट्स, होमवर्क, कार्टून, चैनल, वाशिंग मशीन, ट्रैक्टर, ट्रॉली, रैंप, फ्रूटी, कोक, कॉफी, बाइक, मोबाइल, कॉलों, सिंथेटिक, फीस, डिस्कवरी, जियोग्राफिक, पैनल, सुपरवाइजर, वेंटिलेटर, हॉकर आदि, देशज शब्द: रनिया, ददिया, दँतुली, दिपती, तलक, जेवना, गरबीला, हिरना, बतकन, पतिया, पुरवाई, बतियाहट, दुपहरी, चिरइया, बिरचन, खटती, बतियाना, तुहुकन, कहन, मड़िया, बाँचा, पहड़ौत, पहुँनोर, हड़काते, अरजौ, पुरबिया, छवना, बतरस, बुड़की, तिरे, भरका, आखर, तुमख, लोरा, लड़याते आदि तथा संस्कृत निष्ठ शब्द भदृट, पादप, अंबर, वाक्जाल, अधुना-युग, अंतस, संवेदन, वणिक, सूचकांक, स्वेदित, अनुनाद, मातृ, उत्ताल, नवाचार आदि नित्य प्रचलित शब्दों के साथ गलबहियाँ डाले मिलते हैं.
इन नवगीतों में शब्द-युग्मों का प्रयोग पूरी स्वाभाविकता से हुआ है जो सरसता में वृद्धि करता है. कमल-नाल, मकड़-जाल, जेठ-दुपहरी, बात-बेबात, सरिता-धार, झूठ-साँच, जंतर-मंतर, लीप-पोत, घर-आँगन, राजा-राव, घर-आँगन-दीवाल, रोटी-पानी, कपड़े-लत्ते, सावन-कजरी, भादों-आल्हा, ताने-बाने, लाग-ठेल, धमा-चौकड़ी, पोथी-पत्रा, उट्टी-कुट्टी, सीरा-पाटी, चूल्हा-चकिया, बासन-भाड़े जैसे शब्द युग्म एक ओर नवगीतकार के परिवेश और जन-जीवन से जुड़ाव इंगित करते हैं तो दूसरी ओर भिन्न परिवेश या हिंदीतर पाठकों के लिये कुछ कठिनाई उपस्थित करते हैं. शब्द-युग्मों और देशज शब्दों के भावार्थ सामान्य शब्द कोषों में नहीं मिलते किन्तु यह नवगीत और नवगीतकार का वैशिष्ट्य स्थापित करते हैं तथा पाठक-श्रोता को ज्ञात से कुछ अधिक जानने का अवसर देकर सांस्कृतिक जुड़ाव में सहायक अस्तु श्लाघ्य हैं.
ब्रजेश जी ने कुछ विशिष्ट शब्द-प्रयोगों से नवबिम्ब स्थापित किये हैं. बर्फीला ताला, जलहीना मिट्टी, अभिसारी नयन, वासंतिक कोयल, नयन-झरोखा, मौन बुलावा, फूटे-बताशे, शब्द-निवेश, बर्फीला बर्ताव, आकाशी भटकाव आदि उल्लेख्य हैं.
'बांसों के झुरमुट से' को पढ़ना किसी नवगीतकार के लिए एक सुखद यात्रा है जिसमें नयनाभिराम शब्द दृश्य तथा भाव तरंगें हैं किन्तु जेठ की धूप या शीत की जकड़न नहीं है. नवगीतकारों के लिए स्वाभाविकता को शैल्पिक जटिलता पर वरीयता देता यह संग्रह अपने गीतों को प्रवाहमयी बनाने का सन्देश अनकहे ही दे देता है. ब्रजेश जी के अगले नवगीत संग्रह की प्रतीक्षा करने का पाठकीय मन ही इस संग्रह की सफलता है. 
- समन्वयम, २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१ 
९४२५१ ८३२४४ / ०७६१ २४११३१, salil.sanjiv@gmail.com

१७-१२-२०१४ 

samiksha

कृति चर्चा:
एक और अरण्य काल : समकालिक नवगीतों का कलश
[कृति विवरण: एक और अरण्य काल, नवगीत संग्रह, निर्मल शुक्ल, आकार डिमाई, आवरण बहुरंगी लैमिनेटेड जैकेटयुक्त सजिल्द, पृष्ठ ७२, १५०/-, उत्तरायण प्रकाशन लखनऊ]
*
हर युग का साहित्य अपने काल की व्यथा-कथाओं, प्रयासों, परिवर्तनों और उपलब्धियों का दर्पण होता है. गद्य में विस्तार और पद्य में संकेत में मानव की जिजीविषा स्थान पाती है. टकसाली हिंदी ने अभिव्यक्ति को खरापन और स्पष्टता दी है. नवगीत में कहन को सरस, सरल, बोधगम्य, संप्रेषणीय, मारक और बेधक बनाया है. वर्तमान नवगीत के शिखर हस्ताक्षर निर्मल शुक्ल का विवेच्य नवगीत संग्रह एक और अरण्य काल संग्रह मात्र नहीं अपितु दस्तावेज है जिसका वैशिष्ट्य उसका युगबोध है. स्तवन, प्रथा, कथा तथा व्यथा शीर्षक चार खण्डों में विभक्त यह संग्रह विरासत ग्रहण करने से विरासत सौंपने तक की शब्द-यात्रा है.
स्तवन के अंतर्गत शारद वंदना में नवगीतकार अपने नाम के अनुरूप निर्मलता और शुक्लता पाने की आकांक्षा 'मनुजता की धर्मिता को / विश्वजयनी कीजिए' तथा 'शिल्पिता की संहिता को / दिक्विजयिनी कीजिए' कहकर व्यक्त करता है. आत्मशोधी-उत्सवधर्मी भारतीय संस्कृति के पारम्परिक मूल्यों के अनुरूप कवि युग में शिवत्व और गौरता की कामना करता है. नवगीत को विसंगति और वैषम्य तक सीमित मानने की अवधारणा के पोषक यहाँ एक गुरु-गंभीर सूत्र ग्रहण कर सकते हैं:
शुभ्र करिए देश की युग-बोध विग्रह-चेतना
परिष्कृत, शिव हो समय की कुल मलिन संवेदना
.
शब्द के अनुराग में बसिये उतरिए रंध्र में
नव-सृजन का मांगलिक उल्लास भरिए छंद में
संग्रह का प्रथा खंड चौदह नवगीत समाहित किये है. अंधानुकरण वृत्ति पर कवि की सटीक टिप्पणी कम शब्दों में बहुत कुछ कहती है. 'बस प्रथाओं में रहो उलझे / यहाँ ऐसी प्रथा है'.
जनगणना में लड़कों की तुलना में कम लड़कियाँ होने और सुदूर से लड़कियाँ लाकर ब्याह करने की ख़बरों के बीच सजग कवि अपना भिन्न आकलन प्रस्तुत करता है: 'बेटियाँ हैं वर नहीं हैं / श्याम को नेकर नहीं है / योग से संयोग से भी / बस गुजर है घर नहीं है.'
शुक्ल जी पारिस्थितिक औपनिषदिक परम्परानुसार वैषम्य को इंगित मात्र करते हैं, विस्तार में नहीं जाते. इससे नवगीतीय आकारगत संक्षिप्तता के साथ पाठक / श्रोता को अपने अनुसार सोचने - व्याख्या करने का अवसर मिलता है और उसकी रुचि बनी रहती है. 'रेत की भाषा / नहीं समझी लहर' में संवादहीनता, 'पूछकर किस्सा सुनहरा / उठ गया आयोग बहरा' में अनिर्णय, 'घिसे हुए तलुओं से / दिखते हैं घाव' में आम जन की व्यथा, 'पाला है बन्दर-बाँटों से / ऐसे में प्रतिवाद करें क्या ' में अनुदान देने की कुनीति, 'सुर्ख हो गयी धवल चाँदनी / लेकिन चीख-पुकार नहीं है' में एक के प्रताड़ित होने पर अन्यों का मौन, 'आज दबे हैं कोरों में ही / छींटे छलके नीर के' में निशब्द व्यथा, 'कौंधते खोते रहे / संवाद स्वर' में असफल जनांदोलन, 'मीठी नींद सुला देने के / मंतर सब बेकार' में आश्वासनों-वायदों के बाद भी चुनावी पराजय, 'ठूंठ सा बैठा / निसुग्गा / पोथियों का संविधान' में संवैधानिक प्रावधानों की लगातार अनदेखी और व्यर्थता, 'छाँव रहे माँगते / अलसाये खेत' में राहत चाहता दीन जन, 'प्यास तो है ही / मगर, उल्लास / बहुतेरा पड़ा है' में अभावों के बाद भी जन-मन में व्याप्त आशावाद, 'जाने कब तक पढ़ी जाएगी / बंद लिफाफा बनी ज़िंदगी' में अब तक न सुधरने के बाद भी कभी न कभी परिस्थितियाँ सुधरने का आशावाद, 'हो गया मुश्किल बहुत / अब पक्षियों से बात करना' में प्रकृति से दूर होता मनुष्य जीवन, 'चेतना के नवल / अनुसंधान जोड़ो / हो सके तो' में नव निर्माण का सन्देश, 'वटवृक्षों की जिम्मेदारी / कुल रह गयी धरी' में अनुत्तरदायित्वपूर्ण नेतृत्व के इंगित सहज ही दृष्टव्य हैं.
शुक्ल जी ने इस संग्रह के गीतों में कुछ नवीन, कुछ अप्रचलित भाषिक प्रयोग किये हैं. ऐसे प्रयोग अटपटे प्रतीत होते हैं किन्तु इनसे ही भाषिक विकास की पगडंडियां बनती हैं. 'दाना-पानी / सारा तीत हुआ', 'ठूंठ सा बैठा निसुग्गा', ''बच्चों के संग धौल-धकेला आदि ऐसे ही प्रयोग हैं. इनसे भाषा में लालित्य वृद्धि हुई है. 'छीन लिया मेघों की / वर्षायी प्यास' और 'बीन लिया दानों की / दूधिया मिठास' में 'लिया' के स्थान पर 'ली' का प्रयोग संभवतः अधिक उपयुक्त होता। 'दीवारों के कान होते हैं' लोकोक्ति को शुक्ल जी ने परिवर्तित कर 'दरवाजों के कान' प्रयोग किया है. विचारणीय है की दीवार ठोस होती है जिससे सामान्यतः कोई चीज पार नहीं हो पाती किन्तु आवाज एक और से दूसरी ओर चली जाती है. मज़रूह सुल्तानपुरी कहते हैं: 'रोक सकता है हमें ज़िन्दाने बला क्या मज़रुह / हम तो आवाज़ हैं दीवार से भी छन जाते हैं'. इसलिए दीवारों के कान होने की लोकोक्ति बनी किन्तु दरवाज़े से तो कोई भी इस पार से उस पार जा सकता है. अतः, 'दरवाजों के कान' प्रयोग सही प्रतीत नहीं होता।
ऐसी ही एक त्रुटि 'पेड़ कटे क्या, सपने टूटे / जंगल हो गये रेत' में है. नदी के जल प्रवाह में लुढ़कते-टकराते-टूटते पत्थरों से रेत के कण बनते हैं, जंगल कभी रेत नहीं होता. जंगल कटने पर बची लकड़ी या जड़ें मिट्टी बन जाती हैं.उत्तम कागज़ और बँधाई, आकर्षक आवरण, स्पष्ट मुद्रण और उत्तम रचनाओं की इस केसरी खीर में कुछ मुद्रण त्रुटियाँ हुये (हुए), ढूढ़ते (ढूँढ़ते), तस्में (तस्मे), सुनों (सुनो), कौतुहल (कौतूहल) कंकर की तरह हैं.
शुक्ल जी के ये नवगीत परंपरा से प्राप्त मूल्यों के प्रति संघर्ष की सनातन भावना को पोषित करते हैं: 'मैं गगन में भी / धरा का / घर बसाना चाहता हूँ' का उद्घोष करने के पूर्व पारिस्थितिक वैषम्य को सामने लाते हैं. वे प्रकृति के विरूपण से चिंतित हैं: 'धुंआ मन्त्र सा उगल रही है / चिमनी पीकर आग / भटक गया है चौराहे पर / प्राण वायु का राग / रहे खाँसते ऋतुएँ, मौसम / दमा करे हलकान' में कवि प्रदूषण ही नहीं उसका कारण और दुष्प्रभाव भी इंगित करता है.
लोक प्रचलित रीतियों के प्रति अंधे-विश्वास को पलटा हुआ ठगा ही नहीं जाता, मिट भी जाता है. शुक्ल जी इस त्रासदी को अपने ही अंदाज़ में बयान करते हैं:
'बस प्रथाओं में रहो उलझे / यहाँ ऐसी प्रथा है
पुतलियाँ कितना कहाँ / इंगित करेंगी यह व्यथा है
सिलसिले / स्वीकार-अस्वीकार के / गुनते हुए ही
उंगलियाँ घिसती रही हैं / उम्र भर / इतना हुआ बस
'इतना हुआ बस' का प्रयोग कर कवि ने विसंगति वर्णन में चुटीले व्यंग्य को घोल दिया है.
'आँधियाँ आने को हैं' शीर्षक नवगीत में शुक्ल जी व्यवस्थापकों को स्पष्ट चेतावनी देते हैं:
'मस्तकों पर बल खिंचे हैं / मुट्ठियों के तल भिंचे हैं
अंततः / है एक लम्बे मौन की / बस जी हुजूरी
काठ होते स्वर / अचानक / खीझकर कुछ बड़बड़ाये
आँधियाँ आने को हैं'
क़र्ज़ की मार झेलते और आत्महत्या करने अटक को विवश होते गरीबों की व्यथा कथा 'अन्नपूर्णा की किरपा' में वर्णित है:
'बिटिया भर का दो ठो छल्ला / उस पर साहूकार
सूद गिनाकर छीन ले गया / सारा साज-सिंगार
मान-मनौव्वल / टोना-टुटका / सब विपरीत हुआ'
विश्व की प्राचीनतम संस्कृति से समृद्ध देश के सबसे बड़ा बाज़ार बन जाने की त्रासदी पर शुक्ल जी की प्रतिक्रिया 'बड़ा गर्म बाज़ार' शीर्षक नवगीत में अपने हो अंदाज़ में व्यक्त हुई है:
बड़ा गर्म बाज़ार लगे बस / औने-पौने दाम
निर्लज्जों की सांठ-गांठ में / डूबा कुल का नाम
'अलसाये खेत'शीर्षक नवगीत में प्रकृति के सौंदर्य से अभिभूत नवगीतकार की शब्द सामर्थ्य और शब्द चित्रण और चिंता असाधारण है:
'सूर्य उत्तरायण की / बेसर से झाँके
मंजरियों ने करतल / आँचल से ढाँके
शीतलता पल-छीन में / होती अनिकेत
.
लपटों में सनी-बुझी / सन-सन बयारें
जीव-जन्तु. पादप, जल / प्राकृत से हारे
सोख गये अधरों के / स्वर कुल समवेत'
सारतः इन नवगीतों का बैम्बिक विधान, शैल्पिक चारुत्व, भाषिक सम्प्रेषणीयता, सटीक शब्द-चयन और लयात्मक प्रवाह इन्हें बारम्बार पढ़ने प्रेरित करता है.
श्रेष्ठ-ज्येष्ठ नवगीतकार कुमार रवीन्द्र ने ठीक ही लिखा है: 'समग्रतः निर्मल शुक्ल का यह संग्रह गीत की उन भंगिमाओं को प्रस्तुत करता है जिन्हें नवगीत की संज्ञा से परिभाषित किया जाता रहा है। प्रयोगधर्मी बिम्बों का संयोजन भी इन गीतों को नवगीत बनाता है। अस्तु, इन्हें नवगीत मानने में मुझे कोई संकोच नहीं है। जैसा मैं पहले भी कह चुका हूँ कि इनकी जटिल संरचना एवं भाषिक वैशिष्ट्य इन्हें तमाम अन्य नवगीतकारों की रचनाओं से अलगाते हैं। निर्मल शुक्ल का यह रचना संसार हमे उलझाता है, मथता है और अंततः विचलित कर जाता है। यही इनकी विशिष्ट उपलब्धि है।'
वस्तुतः यह नवगीत संग्रह नव रचनाकारों के लिए पाठ्यपुस्तक की तरह है. इसे पढ़-समझ कर नवगीत की समस्त विशेषताओं को आत्मसात किया जा सकता है.
१७-१२-२०१४ 

navgeet

एक रचना -
भूमि मन में बसी 
*
भूमि मन में बसी ही हमेशा रहे 
*
पाँच माताएँ हैं
एक पैदा करे
दूसरी भूमि पर
पैर मैंने धरे
दूध गौ का पिया
पुष्ट तन तब वरे
बोल भाषा बढ़े
मूल्य गहकर खरे
वंदना भारती माँ
न ओझल करे
धन्य सन्तान
शीश पर कर वरद यदि रहे
भूमि मन में बसी ही हमेशा रहे
*
माँ नदी है न भूलें
बुझा प्यास दे
माँ बने बुद्धि तो
नित नयी आस दे
माँ जो सपना बने
होंठ को हास दे
भाभी-बहिना बने
स्नेह-परिहास दे
हो सखी-संगिनी
साथ तब खास दे
मान उपकार
मन !क्यों करद तू रहे?
भूमि मन में बसी ही हमेशा रहे
*
भूमि भावों की
रस घोलती है सदा
भूमि चाहों की
बनती नयी ही अदा
धन्य वह भूमि पर
जो हुआ हो फ़िदा
भूमि कुरुक्षेत्र में
हो धनुष औ' गदा
भूमि कहती
झुके वृक्ष फल से लदा
रह सहज-स्वच्छ
सबको सहायक रहे
भूमि मन में बसी ही हमेशा रहे
***

१७-१२-२०१५ 

navgeet

नवगीत-
आँगन टेढ़ा 
नाच न आये 
*
अपनी-अपनी 
चाल चल रहे
खुद को खुद ही
अरे! छल रहे
जो सोये ही नहीं
जान लो
उन नयनों में
स्वप्न पल रहे
सच वह ही
जो हमें सुहाये
आँगन टेढ़ा
नाच न आये
*
हिम-पर्वत ही
आज जल रहे
अग्नि-पुंज
आहत पिघल रहे
जो नितांत
अपने हैं वे ही
छाती-बैठे
दाल दल रहे
ले जाओ वह
जो थे लाये
आँगन टेढ़ा
नाच न आये
*
नित उगना था
मगर ढल रहे
हुए विकल पर
चाह कल रहे
कल होता जाता
क्यों मानव?
चाह आज की
कल भी कल रहे
अंधे दौड़े
गूँगे गाये
आँगन टेढ़ा
नाच न आये
*

१७-१२-२०१५ 

navgeet

नवगीत:
परीक्षा 
*
किसकी कौन 
परीक्षा लेता?
*
यह सोचे मैं पढ़कर आया
वह कहता है गलत बताया
दोनों हैं पुस्तक के कैदी
क्या जानें क्या खोया-पाया?
उसका ही जीवन है सार्थक
बिन माँगे भी
जो कुछ देता
किसकी कौन
परीक्षा लेता?
*
सोच रहा यह नित कुछ देता
लेकिन क्या वह सचमुच लेता?
कौन बताएं?, किससे पूछें??
सुप्त रहा क्यों मनस न चेता?
तज पतवारें
नौका खेता
किसकी कौन
परीक्षा लेता?
*
मिलता अक्षर ज्ञान लपक लो
समझ न लेकिन उसे समझ लो
जो नासमझ रहा है अब तक
रहो न चिपके, नहीं विलग हो
सच न विजित हो
और न जेता
किसकी कौन
परीक्षा लेता?
*

१७-१२-२०१५ 

navgeet

 नवगीत:
अपनी ढपली
*
अपनी ढपली
अपना राग
*
ये दो दूनी तीन बतायें
पाँच कहें वे बाँह चढ़ायें
चार न मानें ये, वे कोई
पार किसी से कैसे पायें?
कोयल प्रबंधित हारी है
कागा गाये
बेसुर फाग
अपनी ढपली
अपना राग
*
अचल न पर्वत, सचल हुआ है
तजे न पिंजरा, अचल सुआ है
समता रही विषमता बोती
खेलें कहकर व्यर्थ जुंआ है
पाल रहे
बाँहों में नाग
अपनी ढपली
अपना राग
*
चाहें खा लें बिना उगाये
सत्य न मानें हैं बौराये
पाल रहे तम कर उजियारा
बनते दाता, कर फैलाये
खुद सो जग से
कहते जाग
अपनी ढपली
अपना राग
*

१७-१२.२०१५ 

navgeet

नवगीत नए हस्ताक्षर: १.
सुनीता सिंह

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, बैठे हैं और अंदर


"नक्काशियाँ"
[सुनीता सिंह नवगीत में प्रवेश कर रही हैं. उनके इस नवगीत पर मार्गदर्शन उन्हें आगे बढ़ने में सहायक होगा. उनका कथ्य और कहन उंकी अपनी है. किसी अन्य की नकल न करने के प्रति वे सजग हैं। } 
*
मन भवन की
देहरी पर 
प्रीत की नक्काशियाँ
छेड़े मौसम
पवन साज पर
संगीत की धुन,
गुनगुनाता
है पपीहा
सुर मधुर चुन।
जैसे राजमहल में,
बाद बरसों,
गूँजती किलकारियाँ।।
रूह करती
रूह से मिल
अकीदतों की बारिशें
क्या पता मिले
कब अनावृष्टियाँ
बूंद को भी गुजारिशें।।
घनघोर कारे
घिरे बदरा
सुनामियाँ दुश्वारियाँ।।
नीर भरकर
व्यथित नयना
टूटते जलभार से,
हाय! चिंदी
हो गया उर
याद के गलहार से।।
दर्द का कोहसार
पसरा
बर्फ सी रुसवाईयाँ।।
प्रेम सोता सूखता,
सूर्य तपता
मन गगन पर,
पर्ण पीले पतझड़ो के
सज गए
अंतर -चमन पर।।
उगे अंतराल पर
बीज आस से
रोप दी हैं क्यारियाँ।।
(अकीदत --लगाव, कोहसार --पहाड़)
@सुनीता सिंह (15-12-2017)

muktika

कार्य शाला - नए हस्ताक्षर
मुक्र्तिका
सुनीता सिंह

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, बैठे हैं और अंदर

*
सर्दी की आहट से घर में निकले कंबल। कुहरे की आमद से कम सांझ सुबह हलचल।। शबनम के मोती की झीनी चादर सजती। मग्न हुई कुदरत भी बज्म अनोखी बेकल।। मंद मंद पुरवाई जैसे हो ठंडाई। शरद आगमन से पुलकित होता गुल हर पल।। गुनगुनी धूप अब तो भाने लगी सभी को। रुखसत दिल की तपिश हुई गम के तल से निकल।। पीली सरसों के गुल की रानाई बेहद। पतझड़ के पीले पत्ते बनते बीता पल।।
* सर्दी की आहट से घर में निकले कंबल।
२२ २ २११ २ ११ २ ११२ २११ कुहरे की आमद से कम हो सबकी हलचल।। शबनम के मोती की झीनी चादर सजती। मग्न हुई कुदरत भी बज्म अनोखी बेकल।। धीमी-धीमी पुरवाई जैसे हो सुखकर । सूरज ऊगे तो पुलकित होता गुल हर पल।। धूप गुनगुनी भाने लगी सभी को अब तो।* रुखसत दिल की तपिश हुई लख गम के बादल।। पीली सरसों के गुल की रानाई बेहद। पतझड़ के पीले पत्ते बनते बीता पल।।
***

bal dohe

बाल दोहे:
*
आर्युश को अच्छा लगा, गौरैया का साथ
गया पकड़ने उड़ गई, फुर्र न आई हाथ
*
तितली बैठी फूल पर, आर्यन खींचे चित्र
पेन्सिल से रंग भर रहा, देख सराहें मित्र
*
पापा अँगुली पकड़कर, ले जाते बाज़ार
नदी गोमती घुमाकर, आ पढ़ते अखबार
*
मम्मी चुम्मी ले कहे, लड़ो न, रहना एक
पाठ आज का आज ही, याद करो बन नेक
*
आर्युष-आर्यन खेलते, हैं पढ़ने के बाद
कक्षा में आते प्रथम, पाठ सभी कर याद
*

bal geet

बाल गीत   
सूरज
------
आर्युष के घर आया सूरज
आर्यन के मन भाया सूरज 
*
सुबह हुई जग जाओ भाई
पापा सा  मुस्काया सूरज 
*
मम्मी धूप उठाती जल्दी
ब्रश कर, खूब नहाया सूरज 
*
आसमान पर बादल के संग 
खेल-कूद इठलाया सूरज 
*
करे प्रार्थना हाथ जोड़कर 
पहला नंबर आया सूरज 
*** 

दोहा दुनिया-शिव

शिव देवों के देव हैं,
झुकते किन्नर-यक्ष.
मनु-दनु, नभ-जलचर नमित,
पूजें भूत सुदक्ष.
.
देव वही जो दे सके,
याचक को कुछ दान.
महादेव सर्वस्व दें,
हो प्रसन्न वरदान.
.
रास-लास-परिहास शिव,
क्रोध, नाश, निर्माण.
प्राण फ़ूँकते सदाशिव,
शिव करते निष्प्राण.
.
नाद-ताल, स्वर लय-विलय,
गति-यति, धुन-आलाप.
अक्षर-शब्द, निशब्द शिव,
रव-नीरव, वर-शाप.
.
शिव की सत्ता सनातन,
काल-व्याल निरपेक्ष.
शिवा अमिट शिव-शक्ति हैं,
शंका-अरि सापेक्ष.
...
17.12.2017

शनिवार, 16 दिसंबर 2017

दोहा दुनिया- शिव

शिव हैं हर्षित चंद्र से,
सज्जित कर निज शीश.
विकल पूर्णिमा मोहनी,
कहाँ जाऊँ हे ईश!
.
मुदित चंद्र शिव शीश चढ़,
आभा रहा बिखेर.
देख सोम भूषण उमा,
हर्षित हुईं अबेर.
.
सुधा लिए शशि, नाग विष,
शिव को दोनों काम्य.
विरति और रति में रखें,
आशुतोष नित साम्य.
.
जगत्पिता जंगल बसे,
मनुज मूढ़ मत काट.
जगजननी पर्वतसुता,
खोद न पर्वत-घाट.
.
शिव को प्रिय जलधार है,
जल से उमा प्रसन्न.
जो जल को गंदा किया,
समझ विपद आसन्न.
.

शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

नवगीत

दोहा दुनिया- शिव

शिव भोले सब जानते,
किंतु दिखें अनजान.
जो शिव से छल कर रहा,
वह दुर्मति नादान.
.
विनत वंदना कर रहा,
कर जोड़े लंकेश.
कर प्रसन्न चाहे बसें,
लंका उमा-उमेश.
.

मातु-पिता कह रमण का,
वर्णन करता मूढ़.
मर्यादा अति सरल सी,
हुई विषय अति गूढ़.
.
शिवा संकुचित, शिव हँसे,
समझा हुए प्रसन्न.
समझ न पाया विपद-पल,
हैं उसके आसन्न.
.
अहंकारवश भक्त ने,
ठाना शक्ति-प्रयोग.
भक्ति रहित लख शक्ति ने,
किया दंड-विनियोग.
.
चाह रहा कैलाश को,
उठा ले चले साथ.
दबा बाँह शिव ने दिया,
झुका दर्प का माथ.
.
भोले प्रति भोले रहें,
छल को छल से मात.
देते शिव, हे छली मन!
निर्मल रह दिन-रात.
...
15.12.2017

जबलपुर, मध्य प्रदेश, भारत

गुरुवार, 14 दिसंबर 2017

दोहा कार्यशाला

11-- दोहे मोती फिर-फिर पोइये, जब-जब टूटे हार । तोड़न से जोड़न बड़ा, महिमा सृजन अपार ।। तोड़न, जोड़न अशुद्ध
तोड़ें मत जोड़ें सदा, पाएं सुयश अपार
* घिर अंधेरा आए तो, अंतस दीप जलाय। मिल झरोखा जायेगा, मन में आस जगाय।। लय दोष, दोनों पंक्तियों के कथ्य में तालमेल कम है.
*
पीर इंतिहा तक जाए, सोच बनी जंजीर।
औरन से मिलता रहे, खुद क्यों पीर अधीर।। पीर इंतिहा हो अगर, सोच बने जंजीर
करे परीक्षा धैर्य की, हो क्यों पीर अधीर?
* ठहरकर जरा तो देखिए, अपने चारों ओर। मिली नियामत विचारिए, चमत्कार चहुँओर।। जरा ठहरकर देखिए, अपने चारों ओर
मिली नियामत अनगिनत, बिखरी है चहुँ ओर
*
सागर बादल बारिशें, काँकर पाथर घास। बना मीत मन गुजारिए,न रहिए बैठ उदास।।
सागर बादल बारिशें, काँकर पाथर घास बना मीत हँस-बोलिए,रहें न बैठ उदास * शिव गौरी आराधना,अन्तर्मन कर लीन। भवसागर की ताड़ना, पार बिना गमगीन ।।
शिव गौरी आराधना, कर अन्तर्मन लीन भवसागर को पारकर, हुए बिना गमगीन * नारी मनभावन लगे, बिना हुवे गम्भीर । जो दिया सम्मान नहीं, व्यर्थ हुई तदबीर।।
अर्थ अस्पष्ट
नारी मनभावन लगे, अगर धीर गम्भीर मिला नहीं सम्मान यदि, व्यर्थ हुई तदबीर * काम धरम सा होत है, पूजन की तासीर। पावन नीयत राखिये, कमतर होगी पीर।। अर्थ अस्पष्ट
* ऐसा काम न कीजिये, पछताना अंजाम। पहले ही गुन लीजिये, हो सकार परिणाम।।
ऐसा काम न कीजिये, पछताना अंजाम पहले गुन लें हो तभी, मनमाफिक परिणाम * भरोसा बड़ा विचारिए, तब कीजै अविराम। भीतर किसके क्या पले, बाहर शहद तमाम।।
करें भरोसा बाद में, पहले सोच-विचार किसके भीतर क्या पले, जानें भली प्रकार * उबरन नामुमकिन नहीं, चाहे जो अंधेर। कोशिश तो कर देखिए, मिटै तमस का घेर।।
उबरन नामुमकिन नहीं, चाहे जो अंधेर। कोशिश तो कर देखिए, मिटै तमस का घेर।।
कुछ भी नामुमकिन नहीं, अमर नहीं अंधेर नित कोशिश कर देखिए, मिटे तमस का घेर।। @सुनीता सिंह (14-13-2017)
टीप- एक विचार पर ४-५ बार भन्न-भिन्न तरह से दोहा कहें, श्रेष्ठ को रखें
लय गुनगुनाते हुए लिखें, कहीं अटकन न हो .

vyangya lekh

व्यंग्य लेख:
हाथ पाकिस्तान का 
*
ये ससुरा पकिस्तान भी गजब किये जा रहा है। 'घर में नईयां दाने और अम्मा चली भुनाने' खुद से अपना घर सम्हाले नहीं सम्हल रहा और चला है 'न भूतो न भविष्यति' का उदाहरण प्रस्तुत कर रहे स्वयंभू महामानव, महानायक, महानेता और ना जाने कितने-कितने महा के घर के चुनाव में बाजी पलटने के लिए उन्हीं की राजधानी में, उन्हीं के प्रमुख विपक्षी दल के साथ बैठक करने। 
कमबख्त को इतनी भी तमीज नहीं कि किसी के विरुद्ध षड्यंत्र करना हो तो अपने देश में बैठक करे, कुछ समय पहले से योजना बनाये। यह क्या बात हुई कि 'हथेली पर सरसों उगाने चले', जब चुनाव सिर पर आ गए तब शतरंज की बिसात बिछाने का विमर्श कर रहे हैं? इससे तो हमारी काम वाली बाई ही अच्छी है कि जिस्स्की इज्जत उतारनी होती है उसके काम में कुछ न कुछ 'खुआ' (कमी) निकाल लेती है और फिर दे तेरी की.... ऐसा गजब का तमाशा होता है कि सारे खानों की सारी फ़िल्में फ्लॉप और फ़ेल। 
भैया पाकिस्तान! इतना तो लिहाज करो कि जो तुम्हारे वजीरे-आज़म (तत्कालीन) को उनके समकक्ष पद की शपथ ग्रहण करने के पहले ही समारोह में बुला सकता है और उनकी दुख्तर के निकाह में बिना पूर्व सूचना अचानक आसमान से टपक सकता है उसके खिलाफ अलादीन का चराग रगड़कर हैरान न करो। सोचो जो सात फेरे लेने के बाद भी बिना किसी अपराध अपनी पत्नी को छोड़ सकता है, वह तुम्हारे वजीरे आजम (पूर्व) के साथ हाथ मिलाने का रिवाज़ भी तोड़ ही सकता है।   
पाकी चचा! चौराहे पर बैठ रही सब्जीवाली को शक है कि तुम उसके पति और प्रेमी के बीच भाँजी मार रहे हो। तुम्हें लव ज़िहाद के लिए ६ बच्चों की यह कमसिन हसीना ही मिली जिसके भव्य रंग के आगे कोयला भी शरमा जाए और जिसके स्वर को सुनकर भूकंप की भी बोलती बंद हो जाए। 
हमें बखूबी मालूम है कि बेसिर-पैर की बातें करना तुम्हारा शौक ही नहीं मजहब भी है मगर इतना तो सोच लेते कि प्राथमिक कक्षा के विद्यार्थी को प्रोफ़ेसर से पंगा नहीं लेना चाहिए। 
हमने एक दस हाथवाले की व्यथा-कथा दूरदर्शन पर देखी है। वह कमबख्त भी इस देश के नरेश के चुनाव में कुछ न कर सका,  बहुत जुगाड़ के बाद चोरी से उसकी सती-सावित्री को ही ले जा पाया जिसने कभी उसकी तरफ देखा भी नहीं, और बेचारा बेमौत मारा गया। 
तुम्हारा इतना दुस्साहस कि तुम उसी देश के शहंशाह के सिंहासन को डुलाने के लिए एक छोटे से प्रान्त की सरकार के चुनाव पर नज़र डालो, वह भी तब जब कि उसके पीछे-पीछे शह दुम हिलाता घूम रहा हो। 
देखो भैये! अच्छे से समझ लो यह सत्यवादी हरिश्चंद्र का देश है। इस देश का नरेश या नरेंद्र झूठ भी कह दे तो सच ही समझा जाएगा। इसलिए तुम या और कोई सफाई देने की कोशिश ही न करे तो बेहतर है। 
सर्जिकल स्ट्राइक में सेना की कुशलता को ढाल बनाकर अपनी पीठ खुद ही ठोंकने की कला देखकर भी तुम यह नहीं समझ पाए कि जबान पर लगाम न रखनेवाले के घर से दूर रहना चाहिए। 
कल को तुम्हारा हाथ हमारी रसोई में रोटी जलने में भी  मिलने लगेगा। ऐसे कितने हाथ है दुश्मनेआला आपके पास जो हर लल्लू-कल्लू के काम में अड़ा देते हो। कुछ तो सोचो-समझो तुम्हें चुनाव प्रचार का हिस्सा बनना है तो अपने वजीरे आजम को भेजते वैसे ही जैसे हमारे गए थे, तब तुम्हारा रोल विश्व शांति में सहायक होता। 
हमने सुना है 'बिल्ली को ख्वाब में छिछ्ड़े ही दिखते हैं, वैसे ही तुमको भी एक प्रदेश ही दिखता है। तुम लाख कहो कि तुम्हारा नाम हमारे अंदरूनी मामलात में न घसीटा जाए मगर हमारे सरकार तो घसीटेंगे ही क्योंकि अपना उल्लू सीधा करना हर नेता का जन्म सिद्ध अधिकार है। 
बांग्ला देश में अड़ी टांग तुड़वा चुकने के बाद  अब तुम्हारा हाथ हमारे वजीरे आला की पशेमानी पर सलवट का कारण बन रहा है, यह नाकाबिले बर्दाश्त है। ऐसा करो कि जब-जब हमारे हुजूर चुनाव के मैदान में तशरीफ़ का टोकरा ले जाएँ तुम अपना हाथ उनके हाथ से मिलाए रखा करो।  तुम्हें क्या हक़ कि उनके घर में हो रहे चुनाव के समय तुम कहीं, किसी के साथ उठो-बैठो। तुम्हें तो मन की बात समझना चाहिए, ण समझ पाओ तो अपने यार चीन से कुछ सीख लो जो सरहद पर तमाशा करता है, गुर्राता है, फिर दुम हिलाता है, फिर घर बुलाकर स्वागत करता है और चुपके से जो करना है कर लेता है। तुम तो धोबी के गधे ही रह गए, न घर के हुए न घाट के... 
चलो जो हुआ सो हुआ, अब मत खोदो कुआ... एक सबक सीख लो कि अपना हाथ उसी से मिलाना जो न मिलाने पर गैर के साथ मिलाने की बात इतनी बार कह सकता हो कि तुम्हें भी भरोसा हो जाए। 
***