शिव को बाहर खोज मत,
मन के भीतर झाँक.
सत्-सुंदर ही शिवा हैं,
आँक सके तो आँक.
.
शिवा कार्य-कारण बनें,
शिव हों सहज निमित्त.
परि-सम्पूरक जानिए,
जैसे हों तन-चित्त.
.
शिव तो देहातीत हैं,
उन्हें देह मत मान.
शिव से सच कब छिप सका?
तुरत हरें अभिमान.
.
शिव भोले भाले दिखें,
किंतु चतुर हैं खूब.
हैं भोले भाले लिए,
सजग ध्यान में डूब.
.
अहंकार गिरि पर बसें,
शिव रखकर निज पैर,
अहं गला ममता बना,
शिवा रहें निर्वैर.
...
18.12.2017
दिव्य नर्मदा : हिंदी तथा अन्य भाषाओँ के मध्य साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक संपर्क हेतु रचना सेतु A plateform for literal, social, cultural and spiritual creative works. Bridges gap between HINDI and other languages, literature and other forms of expression.
कुल पेज दृश्य
सोमवार, 18 दिसंबर 2017
दोहा दुनिया-
रविवार, 17 दिसंबर 2017
geet
geet
samiksha
samiksha
एक और अरण्य काल : समकालिक नवगीतों का कलश
[कृति विवरण: एक और अरण्य काल, नवगीत संग्रह, निर्मल शुक्ल, आकार डिमाई, आवरण बहुरंगी लैमिनेटेड जैकेटयुक्त सजिल्द, पृष्ठ ७२, १५०/-, उत्तरायण प्रकाशन लखनऊ]
*
हर युग का साहित्य अपने काल की व्यथा-कथाओं, प्रयासों, परिवर्तनों और उपलब्धियों का दर्पण होता है. गद्य में विस्तार और पद्य में संकेत में मानव की जिजीविषा स्थान पाती है. टकसाली हिंदी ने अभिव्यक्ति को खरापन और स्पष्टता दी है. नवगीत में कहन को सरस, सरल, बोधगम्य, संप्रेषणीय, मारक और बेधक बनाया है. वर्तमान नवगीत के शिखर हस्ताक्षर निर्मल शुक्ल का विवेच्य नवगीत संग्रह एक और अरण्य काल संग्रह मात्र नहीं अपितु दस्तावेज है जिसका वैशिष्ट्य उसका युगबोध है. स्तवन, प्रथा, कथा तथा व्यथा शीर्षक चार खण्डों में विभक्त यह संग्रह विरासत ग्रहण करने से विरासत सौंपने तक की शब्द-यात्रा है.
शुभ्र करिए देश की युग-बोध विग्रह-चेतना
परिष्कृत, शिव हो समय की कुल मलिन संवेदना
.
शब्द के अनुराग में बसिये उतरिए रंध्र में
नव-सृजन का मांगलिक उल्लास भरिए छंद में
संग्रह का प्रथा खंड चौदह नवगीत समाहित किये है. अंधानुकरण वृत्ति पर कवि की सटीक टिप्पणी कम शब्दों में बहुत कुछ कहती है. 'बस प्रथाओं में रहो उलझे / यहाँ ऐसी प्रथा है'.
पुतलियाँ कितना कहाँ / इंगित करेंगी यह व्यथा है
सिलसिले / स्वीकार-अस्वीकार के / गुनते हुए ही
उंगलियाँ घिसती रही हैं / उम्र भर / इतना हुआ बस
अंततः / है एक लम्बे मौन की / बस जी हुजूरी
काठ होते स्वर / अचानक / खीझकर कुछ बड़बड़ाये
आँधियाँ आने को हैं'
सूद गिनाकर छीन ले गया / सारा साज-सिंगार
मान-मनौव्वल / टोना-टुटका / सब विपरीत हुआ'
निर्लज्जों की सांठ-गांठ में / डूबा कुल का नाम
मंजरियों ने करतल / आँचल से ढाँके
शीतलता पल-छीन में / होती अनिकेत
.
लपटों में सनी-बुझी / सन-सन बयारें
जीव-जन्तु. पादप, जल / प्राकृत से हारे
सोख गये अधरों के / स्वर कुल समवेत'
श्रेष्ठ-ज्येष्ठ नवगीतकार कुमार रवीन्द्र ने ठीक ही लिखा है: 'समग्रतः निर्मल शुक्ल का यह संग्रह गीत की उन भंगिमाओं को प्रस्तुत करता है जिन्हें नवगीत की संज्ञा से परिभाषित किया जाता रहा है। प्रयोगधर्मी बिम्बों का संयोजन भी इन गीतों को नवगीत बनाता है। अस्तु, इन्हें नवगीत मानने में मुझे कोई संकोच नहीं है। जैसा मैं पहले भी कह चुका हूँ कि इनकी जटिल संरचना एवं भाषिक वैशिष्ट्य इन्हें तमाम अन्य नवगीतकारों की रचनाओं से अलगाते हैं। निर्मल शुक्ल का यह रचना संसार हमे उलझाता है, मथता है और अंततः विचलित कर जाता है। यही इनकी विशिष्ट उपलब्धि है।'
navgeet
भूमि मन में बसी
*
भूमि मन में बसी ही हमेशा रहे
*
पाँच माताएँ हैं
एक पैदा करे
दूसरी भूमि पर
पैर मैंने धरे
दूध गौ का पिया
पुष्ट तन तब वरे
बोल भाषा बढ़े
मूल्य गहकर खरे
वंदना भारती माँ
न ओझल करे
धन्य सन्तान
शीश पर कर वरद यदि रहे
भूमि मन में बसी ही हमेशा रहे
*
माँ नदी है न भूलें
बुझा प्यास दे
माँ बने बुद्धि तो
नित नयी आस दे
माँ जो सपना बने
होंठ को हास दे
भाभी-बहिना बने
स्नेह-परिहास दे
हो सखी-संगिनी
साथ तब खास दे
मान उपकार
मन !क्यों करद तू रहे?
भूमि मन में बसी ही हमेशा रहे
*
भूमि भावों की
रस घोलती है सदा
भूमि चाहों की
बनती नयी ही अदा
धन्य वह भूमि पर
जो हुआ हो फ़िदा
भूमि कुरुक्षेत्र में
हो धनुष औ' गदा
भूमि कहती
झुके वृक्ष फल से लदा
रह सहज-स्वच्छ
सबको सहायक रहे
भूमि मन में बसी ही हमेशा रहे
***
१७-१२-२०१५
navgeet
आँगन टेढ़ा
नाच न आये
*
अपनी-अपनी
चाल चल रहे
खुद को खुद ही
अरे! छल रहे
जो सोये ही नहीं
जान लो
उन नयनों में
स्वप्न पल रहे
सच वह ही
जो हमें सुहाये
आँगन टेढ़ा
नाच न आये
*
हिम-पर्वत ही
आज जल रहे
अग्नि-पुंज
आहत पिघल रहे
जो नितांत
अपने हैं वे ही
छाती-बैठे
दाल दल रहे
ले जाओ वह
जो थे लाये
आँगन टेढ़ा
नाच न आये
*
नित उगना था
मगर ढल रहे
हुए विकल पर
चाह कल रहे
कल होता जाता
क्यों मानव?
चाह आज की
कल भी कल रहे
अंधे दौड़े
गूँगे गाये
आँगन टेढ़ा
नाच न आये
*
१७-१२-२०१५
navgeet
परीक्षा
*
किसकी कौन
परीक्षा लेता?
*
यह सोचे मैं पढ़कर आया
वह कहता है गलत बताया
दोनों हैं पुस्तक के कैदी
क्या जानें क्या खोया-पाया?
उसका ही जीवन है सार्थक
बिन माँगे भी
जो कुछ देता
किसकी कौन
परीक्षा लेता?
*
सोच रहा यह नित कुछ देता
लेकिन क्या वह सचमुच लेता?
कौन बताएं?, किससे पूछें??
सुप्त रहा क्यों मनस न चेता?
तज पतवारें
नौका खेता
किसकी कौन
परीक्षा लेता?
*
मिलता अक्षर ज्ञान लपक लो
समझ न लेकिन उसे समझ लो
जो नासमझ रहा है अब तक
रहो न चिपके, नहीं विलग हो
सच न विजित हो
और न जेता
किसकी कौन
परीक्षा लेता?
*
१७-१२-२०१५
navgeet
अपनी ढपली
*
अपनी ढपली
अपना राग
*
ये दो दूनी तीन बतायें
पाँच कहें वे बाँह चढ़ायें
चार न मानें ये, वे कोई
पार किसी से कैसे पायें?
कोयल प्रबंधित हारी है
कागा गाये
बेसुर फाग
अपनी ढपली
अपना राग
*
अचल न पर्वत, सचल हुआ है
तजे न पिंजरा, अचल सुआ है
समता रही विषमता बोती
खेलें कहकर व्यर्थ जुंआ है
पाल रहे
बाँहों में नाग
अपनी ढपली
अपना राग
*
चाहें खा लें बिना उगाये
सत्य न मानें हैं बौराये
पाल रहे तम कर उजियारा
बनते दाता, कर फैलाये
खुद सो जग से
कहते जाग
अपनी ढपली
अपना राग
*
१७-१२.२०१५
navgeet
सुनीता सिंह

देहरी पर
प्रीत की नक्काशियाँ
पवन साज पर
संगीत की धुन,
गुनगुनाता
है पपीहा
सुर मधुर चुन।
बाद बरसों,
गूँजती किलकारियाँ।।
रूह से मिल
अकीदतों की बारिशें
क्या पता मिले
कब अनावृष्टियाँ
बूंद को भी गुजारिशें।।
घिरे बदरा
सुनामियाँ दुश्वारियाँ।।
व्यथित नयना
टूटते जलभार से,
हाय! चिंदी
हो गया उर
याद के गलहार से।।
पसरा
बर्फ सी रुसवाईयाँ।।
सूर्य तपता
मन गगन पर,
पर्ण पीले पतझड़ो के
सज गए
अंतर -चमन पर।।
बीज आस से
रोप दी हैं क्यारियाँ।।
muktika
सुनीता सिंह

* सर्दी की आहट से घर में निकले कंबल।
२२ २ २११ २ ११ २ ११२ २११ कुहरे की आमद से कम हो सबकी हलचल।। शबनम के मोती की झीनी चादर सजती। मग्न हुई कुदरत भी बज्म अनोखी बेकल।। धीमी-धीमी पुरवाई जैसे हो सुखकर । सूरज ऊगे तो पुलकित होता गुल हर पल।। धूप गुनगुनी भाने लगी सभी को अब तो।* रुखसत दिल की तपिश हुई लख गम के बादल।। पीली सरसों के गुल की रानाई बेहद। पतझड़ के पीले पत्ते बनते बीता पल।।
***
bal dohe
*
आर्युश को अच्छा लगा, गौरैया का साथ
गया पकड़ने उड़ गई, फुर्र न आई हाथ
*
तितली बैठी फूल पर, आर्यन खींचे चित्र
पेन्सिल से रंग भर रहा, देख सराहें मित्र
*
पापा अँगुली पकड़कर, ले जाते बाज़ार
नदी गोमती घुमाकर, आ पढ़ते अखबार
*
मम्मी चुम्मी ले कहे, लड़ो न, रहना एक
पाठ आज का आज ही, याद करो बन नेक
*
आर्युष-आर्यन खेलते, हैं पढ़ने के बाद
कक्षा में आते प्रथम, पाठ सभी कर याद
*
bal geet
------
आर्युष के घर आया सूरज
आर्यन के मन भाया सूरज
पापा सा मुस्काया सूरज
ब्रश कर, खूब नहाया सूरज
खेल-कूद इठलाया सूरज
पहला नंबर आया सूरज
दोहा दुनिया-शिव
शिव देवों के देव हैं,
झुकते किन्नर-यक्ष.
मनु-दनु, नभ-जलचर नमित,
पूजें भूत सुदक्ष.
.
देव वही जो दे सके,
याचक को कुछ दान.
महादेव सर्वस्व दें,
हो प्रसन्न वरदान.
.
रास-लास-परिहास शिव,
क्रोध, नाश, निर्माण.
प्राण फ़ूँकते सदाशिव,
शिव करते निष्प्राण.
.
नाद-ताल, स्वर लय-विलय,
गति-यति, धुन-आलाप.
अक्षर-शब्द, निशब्द शिव,
रव-नीरव, वर-शाप.
.
शिव की सत्ता सनातन,
काल-व्याल निरपेक्ष.
शिवा अमिट शिव-शक्ति हैं,
शंका-अरि सापेक्ष.
...
17.12.2017
शनिवार, 16 दिसंबर 2017
दोहा दुनिया- शिव
शिव हैं हर्षित चंद्र से,
सज्जित कर निज शीश.
विकल पूर्णिमा मोहनी,
कहाँ जाऊँ हे ईश!
.
मुदित चंद्र शिव शीश चढ़,
आभा रहा बिखेर.
देख सोम भूषण उमा,
हर्षित हुईं अबेर.
.
सुधा लिए शशि, नाग विष,
शिव को दोनों काम्य.
विरति और रति में रखें,
आशुतोष नित साम्य.
.
जगत्पिता जंगल बसे,
मनुज मूढ़ मत काट.
जगजननी पर्वतसुता,
खोद न पर्वत-घाट.
.
शिव को प्रिय जलधार है,
जल से उमा प्रसन्न.
जो जल को गंदा किया,
समझ विपद आसन्न.
.
शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017
दोहा दुनिया- शिव
शिव भोले सब जानते,
किंतु दिखें अनजान.
जो शिव से छल कर रहा,
वह दुर्मति नादान.
.
विनत वंदना कर रहा,
कर जोड़े लंकेश.
कर प्रसन्न चाहे बसें,
लंका उमा-उमेश.
.
मातु-पिता कह रमण का,
वर्णन करता मूढ़.
मर्यादा अति सरल सी,
हुई विषय अति गूढ़.
.
शिवा संकुचित, शिव हँसे,
समझा हुए प्रसन्न.
समझ न पाया विपद-पल,
हैं उसके आसन्न.
.
अहंकारवश भक्त ने,
ठाना शक्ति-प्रयोग.
भक्ति रहित लख शक्ति ने,
किया दंड-विनियोग.
.
चाह रहा कैलाश को,
उठा ले चले साथ.
दबा बाँह शिव ने दिया,
झुका दर्प का माथ.
.
भोले प्रति भोले रहें,
छल को छल से मात.
देते शिव, हे छली मन!
निर्मल रह दिन-रात.
...
15.12.2017
गुरुवार, 14 दिसंबर 2017
दोहा कार्यशाला
तोड़ें मत जोड़ें सदा, पाएं सुयश अपार
* घिर अंधेरा आए तो, अंतस दीप जलाय। मिल झरोखा जायेगा, मन में आस जगाय।। लय दोष, दोनों पंक्तियों के कथ्य में तालमेल कम है.
*
पीर इंतिहा तक जाए, सोच बनी जंजीर।
औरन से मिलता रहे, खुद क्यों पीर अधीर।। पीर इंतिहा हो अगर, सोच बने जंजीर
करे परीक्षा धैर्य की, हो क्यों पीर अधीर?
* ठहरकर जरा तो देखिए, अपने चारों ओर। मिली नियामत विचारिए, चमत्कार चहुँओर।। जरा ठहरकर देखिए, अपने चारों ओर
मिली नियामत अनगिनत, बिखरी है चहुँ ओर
*
सागर बादल बारिशें, काँकर पाथर घास। बना मीत मन गुजारिए,न रहिए बैठ उदास।।
सागर बादल बारिशें, काँकर पाथर घास बना मीत हँस-बोलिए,रहें न बैठ उदास * शिव गौरी आराधना,अन्तर्मन कर लीन। भवसागर की ताड़ना, पार बिना गमगीन ।।
शिव गौरी आराधना, कर अन्तर्मन लीन भवसागर को पारकर, हुए बिना गमगीन * नारी मनभावन लगे, बिना हुवे गम्भीर । जो दिया सम्मान नहीं, व्यर्थ हुई तदबीर।।
अर्थ अस्पष्ट
नारी मनभावन लगे, अगर धीर गम्भीर मिला नहीं सम्मान यदि, व्यर्थ हुई तदबीर * काम धरम सा होत है, पूजन की तासीर। पावन नीयत राखिये, कमतर होगी पीर।। अर्थ अस्पष्ट
* ऐसा काम न कीजिये, पछताना अंजाम। पहले ही गुन लीजिये, हो सकार परिणाम।।
ऐसा काम न कीजिये, पछताना अंजाम पहले गुन लें हो तभी, मनमाफिक परिणाम * भरोसा बड़ा विचारिए, तब कीजै अविराम। भीतर किसके क्या पले, बाहर शहद तमाम।।
करें भरोसा बाद में, पहले सोच-विचार किसके भीतर क्या पले, जानें भली प्रकार * उबरन नामुमकिन नहीं, चाहे जो अंधेर। कोशिश तो कर देखिए, मिटै तमस का घेर।।
उबरन नामुमकिन नहीं, चाहे जो अंधेर। कोशिश तो कर देखिए, मिटै तमस का घेर।।
कुछ भी नामुमकिन नहीं, अमर नहीं अंधेर नित कोशिश कर देखिए, मिटे तमस का घेर।। @सुनीता सिंह (14-13-2017)
टीप- एक विचार पर ४-५ बार भन्न-भिन्न तरह से दोहा कहें, श्रेष्ठ को रखें।
लय गुनगुनाते हुए लिखें, कहीं अटकन न हो .
vyangya lekh
हाथ पाकिस्तान का
*