रविवार, 7 जुलाई 2019

doha shatak sahiblal dasharie 'saral

ॐ 
दोहा शतक 
साहेबलाल दशरिये 'सरल'
















जन्म: ४.११.१९६५ 
आत्मज: श्री पन्नालाल दशरिये।
शिक्षा- एम.ए. (English, History.अंगरेजी, इतिहास), बी. एड.।
संप्रति: व्याख्याता।
प्रकाशन: काव्य संकलन अभिव्यक्ति भावों की, ये बेटियाँ, रानी अवंतीबाई की बलिदानगाथा। 
उपलब्धि: अनेक सम्मान, कविता पाठ।
संपर्क: वार्ड नम्बर ४, सुषमा नगर, बालाघाट म. प्र.।
चलभाष: ८९८९८००५००, ७०००४३२१६७,  ईमेल: sdsaral45@gmail.com
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ॐ 
दोहा शतक 

कलम प्रखर पाषाण को, करदे चकनाचूर।
अभिमानी के दम्भ को, पल में चूराचूर।।
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धीरे धीरे पर सतत, करते रहना यत्न।
गहरे पानी में मिले, बेशकीमती रत्न।।
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विकृत पर्यावरण ही, दूषण कारण एक।
हरी-भरी धरती बने, कार्य कराओ नेक।।
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स्वार्थ साधने लिए, जंगल रहे उजाड़।
पेड़ काटकर कर दिया, पत्थर भरा पहाड़।।
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धरतीवालो जागिए, धरती करे पुकार।
वरना कल को मानिये, होगा हाहाकार।।
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एक पौध प्रतिवर्ष ही, जन्मदिवस पर रोप।
ताप-दाब संताप के, गर करना कम कोप।।
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आँगन में शहनाइयाँ, बजे नगाड़ा रोज।
खुशहाली आँगन रहे, हो जाने दो खोज।।
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जंगल में मंगल भरा, भरा रहे माहौल।
धरती को उपचार दो, धरा रही है ख़ौल।।
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चिंतन में हरदम अगर, स्वार्ध-साधना सिद्ध।
लुप्त प्रजाति की तरह, बन जाओगे गिद्ध।।
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धरा बचाने के लिए, सुंदर करें उपाय।
वरना जीवन का लगे, खतम हुआ अध्याय।।
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हरी-भरी धरती करो, हरियाली में जान। 
पेड़ों को ही मानिए, धरती का भगवान।।
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पास आपके है पड़ा, रुपया लाख करोड़।
धरा बने विकराल तो, प्राण जाएगा छोड़।।
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धरा गाय सम मानिए, दुग्ध दिलाए  स्वास्थ।
मारामारी गर करो, जमकर मारे लात।।
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गर्मी के दिन आ गये, ठंडी अब तो गोल।
चलो सँभलकर कह रहे, सोल पीटकर ढोल।।
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तीरथ माँ के चरण से, हो जाता है पूर्ण।
माँ ही बच्चों के लिये, दुआ -वा का चूर्ण।।
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माँ है वेदों की ऋचा, माँ है सकल पुराण।
माँ को बाईबिल कहो, माँ है ग्रंथ कुरान।।
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भूतल नभ पाताल में, माँ का है साम्राज्य।
माँ है संख्या एक से, होने वाली भाज्य।।
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मन को मंदिर मान के, माँ का कर लो ध्यान।
ईश्वर-अल्लाह की मिले, माँ से ही पहचान।।
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माँ पूजा की आरती, रोली चंदन धूप।
माँ नाना पकवान है, माँ अमृत सी सूप।।
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माँ की हो आराधना, माँ ही है आराध्य।
भवसागर से तारने, माँ इकलौती साध्य।।
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रहमतकर मौला सदा, सर हो माँ के पाँव। 
हरदम बरगद सी मिले, ठंडी-ठंडी छाँव।।
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माँ बचपन की लेखनी, अक्षर सुंदर गोल।
कान खींचकर बोलती, मीठे-मीठे बोल।।
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बातें माँ की जब चले, बातें बड़ी अथाह।
इसीलिये माँ की करें, सब बच्चे परवाह।।
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माँ सौ दो सौ पाँच सौ, माँगे नहीं हजार।
माँ को केवल चाहिये, निज बच्चों का प्यार।।
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माँ का जो संसार है, बच्चों का संसार।।
तत्पर करने ही रहे, बच्चों पर उपकार।।
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बच्चों को खुशियाँ मिले, माँ को है दरकार।
बच्चों से मिलकर बने, माता की सरकार।।
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दानी दुनिया में बड़ी, माँ है वो करतार।
जो कुछ उसके पास में, सब देने तैयार।।
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माँ जब आँखें मूँद ले, जग में हो अँधियार।।
गर माँ आँखें खोल दे, हो जाए उजियार।
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जब तक घर में माँ रहे, घर में भरी उजास।
माँ बिन ऐसा मानिये, तन है पर बिन श्वास।।
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माँ है घर में मान लो, घर में बहे बयार।
माँ के बिन सूना लगे, जग का कारोबार।।
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माँ निधि मानों जगत में, सबसे है अनमोल।
भीषण संकट में कहे, हे माँ बरबस बोल।।
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माँ का मतलब पूछिए, माँ बिन जो है लाल।
सब सूना-सूना लगे, जग का मायाजाल।।
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'माँ माँ माँ माँ माँ' कहे, हो जब रुदन पुकार।
माँ के दर्शन मात्र से, खुले बंद जो द्वार।।
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पूजा आजीवन करूँ, माँ देना वरदान।
हाथ सदा सर पर रहे, है मेरा अरमान।।
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हाव-भाव को देखकर, मन को लेती जान।
माँ ही जाने भावना, बच्चे की भगवान।।
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जिद्दी बच्चों से सदा, माँ हो जाती बाध्य।
माँ के ही हाथों कहे, मीठा लगता स्वाद।।
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माँ को दुःख देना नहीं, प्रभु होंगे नाराज।
सर पर माँ के हाथ से, सर पे होगा ताज।।
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सेवा जो माँ की नहीं, करता वो नादान।
जीते जी मुर्दा कहो, ऐसी जो संतान।।
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करना तुझको चाहिये, अदा दूध का कर्ज।
माँ ने पूरा कर दिया, माँ का जो था फर्ज।।
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माँ मत रोटी बेलकर, होने देना गोल।
बहुतेरे इस देश में, रोटी करते गोल।।
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खर्चीली शादी नहीं, करना तुम श्रीमान।
कम खर्चीला ब्याह कर, जग में बनो महान।।
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देना भी चाहे अगर, कोई तुम्हें दहेज।
लेना ही हमको नहीं, कहकर कर परहेज।।
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कितनी बेटी आज तक, लालच ने लीं लील।
घोड़े को थोड़ा कभी, भी मत देना ढील।।
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पारित संसद में करो, ऐसा अध्यादेश।
जो दहेज़ माँगे मिले, फाँसी का आदेश।।
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कलम सतत चलती रहे, करती रहे विरोध।
एक दिवस तो जगत को, आ जाएगा बोध।।
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हिंदुओं के दहेज पर, ठोकर करो कठोर।
आजीवन कारा मिले, उसे मिले न ठौर।।
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कौन कहाँ किसने यहाँ, लाया है दस्तूर।
खुद ही खुद से पूछते, खुद खुद से मजबूर।।
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बाबुल से बिटिया कहे, कैसी जग की रीत।
झरते आँसू कह रहे, बिलख-बिलख कर प्रीत।।
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जब मन कीजे आइये, पापा के घर-द्वार।
बढ़ा हमेशा ही मिले, कभी न कम हो प्यार।।
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बेटी के मन में सदा, चलता रहता द्वंद।।
दर पापा का हो रहा, धीरे-धीरे बंद।
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जिसके आगे सोचने, की ही बची न राह।
केवल जीवित चेतना, करती रहे कराह।।
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बिदा करे बेटी पिता, पल कितना गमगीन।
जैसे व्याकुल ही रहे, जल के बाहर मीन।।
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नहा दूध फल पूत हो, घर भी करे किलोल।
देह-देहरी दे सदा, सुख-समृद्धि माहौल।।
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जग- जुग फैले नाम की, जग में प्यारी गंध। 
ऐसा कुछ कर जाइये, दुनिया से संबंध।।
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खाने के लाले पड़े, रोजी बिन मजबूर।
खुद भूखा रह खिलाए, औरों को मजदूर।।
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दिन भर अपना कामकर, थककर सोया चूर।
बाँध सिदोरी चल पड़ा, निश्चित वो मजदूर।।
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लेना आता ही नहीं, अपने हक से दूर।
शोषित सबसे जो रहे, वो बनते मजदूर।।
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रहे लालसा ही मिले, खाने को भरपूर।
भूखा आधे पेट ही, सो जाता मजदूर।।
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भरवाना है माँग में, बेटी के सिंदूर।
बेबस हो घर बेचता, सिसक-सिसक मजदूर।।
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मानवता की बात को, मैं भी करूँ प्रणाम।
जो मन आया बोल लो, बातों का क्या दाम?
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मानवता संसार में, अगर बची तो बोल।
वरना हम सब साथ मिल, पीट रहे हैं ढोल।।
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मानवता की बात पर, मचा बड़ा कुहराम।
दानवता को मारने, आ जाना श्रीराम।।
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दीन दुखी के दर्द पर, करते वज्र प्रहार।
मानवीय उनको कहा, जग ने बारंबार।।
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नेता को बोलो: कहे, मानवता के बोल।
कथनी सुनकर आप-हम, चक्कर खाएँ गोल।।
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चिंता छोड़ो, हँस करो, अपने सारे काम।
अगर काम को चाहते, देना तुम अंजाम।।
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सबको अब मैदान में, करना है प्रस्थान।
अपनी यदि इस देश में, बनवाना पहिचान।।
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मिले कड़ी से जब कड़ी, बन जाए जंजीर।
जगा रहे जमीर तो, हम भी बनें कबीर।।
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सदियों तक सबको तभी, रखे जमाना याद।
खुद का खुद भगवान बन, खुद से कर फरियाद।।
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रख लो निर्मल भावना, जैसे निर्मल नीर।
अपनों को अपना कहो, तभी मिटेगी पीर।।
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साथ सभी का चाहिये, करना अगर विकास।
खींचा-तानी से मिले, सामाजिक संत्रास।।
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चलना है चलते चलो, कछुआवाली चाल।
बैठे से तंगी बढ़े, हो जाओ कंगाल।।
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खड़ा ऊँट- नीचे पड़ा, ऊँचा बड़ा पहाड़।
बार-बार की हार को, देना बड़ी पछाड़।।
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चार दिनों की चाँदनी, चार दिनों का खेल।
पाल जीत-संभावना, मत हो जाना फेल।।
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मीठे-मीठे वचन से, कटते मन के जाल।
कह-कह तुम पर नाज सब, करते ऊँचा भाल।।
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मित्र इत्र सम चाहिये, पावन परम पवित्र।
महके जिसके चित्र से, चंदन भरा चरित्र।।
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रक्षाबंधन को करो, रक्षा का त्यौहार।
बहनों पर कोई कभी, करे न अत्याचार।।
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दया-भाव जिंदा रहे, दया-धरम का मूल।
जाति-धरम के नाम पर, पापी बोते शूल।।
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दुनिया भर की भीड़ में, ढूंढ रहे अस्तित्व।
हर इंसां को चाहिये, शानदार व्यक्तित्व।।

इस प्रतियोगी दौर में, कीचड़ सबके हाथ।
उजले को धुँधला करे, होती मिथ्या बात।।

साथ सभी का चाहिये, करना अगर विकास।
खींचा-तानी से मिले, सामाजिक संत्रास।।
*
सबका अपना दायरा, सबकी अपनी सोच।
करते स्वारथ साधने, तूतू-मैंमैं रोज।।
*
सत्य बड़ा खामोश है, झूठ रहा चिंघाड़।
सत्य बोल दिखला दिया, जिंदा दूँगा गाड़।।
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आज राज जाने बिना, मत मढ़ना आरोप।
सरे जमाने से हुआ, सच्चाई का लोप।
*
सुबक-सुबक कर रो रहा, आज बिचारा सत्य।
झूठ आज जमकर करे, ठुमक-ठुमक कर नृत्य।।
*
सरकारी थैला भरा, करते बंदरबाँट।
अगर बीच में आ गए, खड़ी करेंगे खाट।।
*
चुप्पी का माहौल है, सबके सब खामोश।
चलते फिरते जागते, लगते सब बेहोश।।
*
ढोंगी पाखण्ड़ी रचे, बहुविधि नाना स्वाँग।
पण्डे डंडे ले करे, डरा डरा कर माँग।।
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ज्ञान बाँटना ध्येय है, ज्ञान बाँटते नित्य।
करनी में अंतर रखे, कथनी के आदित्य।।
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मंदिर-मस्जिद के लिये, करते लोग विवाद।
शिक्षा-मंदिर बनाकर, बंद करो प्रतिवाद।।
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दारू पीकर दे रहे, दारू पर उपदेश।
पीने से घर टूटता, पैदा होता क्लेश।।
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मारा-मारी से अगर, मिलजाएँ प्रभु राम।
मंत्रों से ज्यादा करे, फिर तो लाठी काम।।
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राम नाम जपते रहो, मन मे हो विश्वास।
जूते लातों के बिना, पूर्ण न होगी आस।।
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मंदिर बनने से बढ़े, यदि तकनीकी ज्ञान।
उन्नत भारत के लिये, फिर हो वह वरदान।।
*
मस्जिद से संसार में, यदि होता कल्याण।
निज मन में करते नहीं, क्यों उसका निर्माण।।
*
मंदिर-मस्जिद की लगी, चारों कतार।
नाहक ही लड़ते रहे, लेकर हाथ कटार।।
*
धर्माडंबर मानना, हमें नहीं स्वीकार।
लूटपाट पाखंड को, कहना है धिक्कार।।
*
तकनीकी के ज्ञान पर, करना मनन-विचार।
तर्कहीन सिद्धांत से, कर देना इनकार।।
*
धर्म सिखाता है सदा, कैसे पाए सत्य।
सत्यमार्ग को धारिये, जो आधारित तथ्य।।
*
बार-बार की हार को, बार-बार तू मार।
मार-मार कर हार को, देना बड़ी पछाड़।।
*
घूम-घूम पाते रहो, मधुकर सा आनंद।
वरना घर भीतर रहो, कर दरवाजा बंद।।
*
अच्छा करना-बोलना, अच्छाई का मंत्र।
बुरा भुला अच्छा कहे, जनगण टीव्ही तंत्र।। १०१ 
***

अक्सर रावण ही कहे, रावण को दो मार।
आशा राम रहीम पे, करते नहीं विचार।।
*
देवदासियों से भरी, डेरों की सरकार।
आज रामजी से कहो, कर इनका उद्धार।।

भक्तों की दौलत इन्हें, बना रही अय्यास।
बन्द चढ़ावे के लिये, शुरू करो अभ्यास।।

दर दर में लंका यहाँ, दर दर में लंकेश।
कामी क्रोधी ने धरा, सन्यासी दरवेश।।

रावण का षड्यंत्र है, भारी अत्याचार।
षड्यंत्रों को चीरना, रावण का संहार।।

अंतर में गर भरा हुआ, रावण तत्व निकाल।
सजा स्वयं देकर उसे, खुद को करो बहाल।।

संयम से भरपूर था, रावण का किरदार।
सीता को माता कहा, क्यूँ आखिर धिक्कार।।

त्राहिमाम अब कर रहें, बच्चे और किसान।
ऊपर वाले से कहो, बचा मिरे भगवान।।

मन से बानी बोलिये, आपा अपना खोल।
अक्षर जनमन पर लिखो, सुंदर गोल मटोल।।

दिन अच्छे बुलवाइए, जनता की दरकार।
वरना जुमलों से नहीं, चलती है सरकार।।



हिन्दू मुस्लिम ही कहो, बरस बिताओ पांच।
फिर पछतावा ही करो, उलझ चुकी जब आंच।।

अभी समय थोड़ा बचा, कर डालो कुछ खास।
वरना पछतावा मिले, रहे अधूरी आस।।

बड़े बड़े बोले बड़े, बड़बोले बन बोल।
शब्द व्यर्थ के अर्थ से, व्यर्थ अर्थ अनमोल।।

सबके मन में बात है, मन में सबकी चाह।
चेनल पर चेटिंग करे, पर अंधियारी राह।।

आसमान में देखते, लिए हाथ दुर्बीन।
मोदी जी दिखते नहीं, इसीलिये गमगीन।।

बुलेट ट्रेन ही चाहिये, लगता बड़ा अजीब।
खाने के लाले पड़े, जनता पड़ी गरीब।।

कौन कहां कैसे यहां, क्या करना उपयोग।
प्रथम जरूरत देखके, कर डालो परयोग।।

अवसर में ईश्वर बसे, अवसर को मत चूक।
रो रो कर बच्चा कहे, भूख लगी है भूख।।

केवल नुक्स निकाल के, करते जाया उम्र।
खुद में खुदा उकेरते, गर हो जाते नम्र।।

कविता से मतलब नहीं, जुमलों का ही काम।
अल्टी पल्टी चाहिए, पाना अगर मुकाम।।

मंच मिलेगा मंच से, मंचो का परपंच।
मंच बनाएगा तुम्हे, कवियों का सरपंच।।

कुछ कविता भी चाहिये, नौटंकी के संग।
रोना गाना चीखना, कविताई का रंग।।

कैसे छीने मंच को, चलता है षड्यंत्र।
प्रतियोगी करने लगे, तंत्र मंत्र अरु यंत्र।।

नहीं जानते आप गर, साम दाम अरु दंड।
कविता फिर तो हो गई, लगा लगा कर फंड।।

लाखों का करते कई, कविता का व्यापार।
और सुनाने के लिये, एक चीज हर बार।।

कवियों को भी चाहिए, अच्छा वाला वक्त।
सुनने वाले जो मिले, गली गली में भक्त।।

अच्छी कविता पर मिले, अच्छा सा प्रतिसाद।
जीवन भर मस्तिष्क में, बनी रहे जो याद।।

कविता अब तो बन गई, फूहड़ का पर्याय।
कविता जीवित रह सके, करना मगर उपाय।।

सत्यवचन स्वीकार्य हो, सत्य तथ्य की जीत।
झूठ दम्भ पाखण्ड से, मत कर लेना प्रीत।।

प्राणिमात्र समभाव हो, सभी जीव से प्यार।
ऊंच नीच में ही छिपी, मानवता की हार।।

मूर्खों को उपदेश दो, श्रम हो जाये व्यर्थ।
तर्क निरर्थक ही रहे, ज्यूँ ज्यूँ ढूंढो अर्थ।।

भला बुरा कहते रहे, राजा बने फकीर।
कड़ी कड़ी से मिल बनी, जोरदार जंजीर।।

सहयोगी वर्ताव से, मिलता है सहयोग।
गुना भाग करते रहे, घटते रहे सुयोग।।

जारी करने में रहे, अपना ही वक्तव्य।
सुनना भी कर्तव्य था, गुनना भी कर्तव्य।।

मन की मन में ही रखो, हल होते तक साध्य।
इक दिन अवसर ही कहे, बनकर के आराध्य।।

कलम हाथ में आ गई, पागल बना कबीर।
कलम दिखाता चीखता, कहता दूंगा चीर।।

सतत चलो चलते रहो, ले कर के संकल्प।
कहते हैं संकल्प का, कोई नहीं विकल्प।।

नमस्कार श्रीमान जी, नमस्कार श्रीमान।
दिन मंगलकारी रहे, दिल का है अरमान।।

रोज सबेरे बोलिये, सुंदर मीठा बोल।
दुनिया भर से फिर जुड़े, रिश्ते भी अनमोल।।

झूठे की स्वीकार्यता, को कर नामंजूर।
सत्य तथ्य को जान के, बहुमत दो भरपूर।।

मुख में मिसरी राखिए, गेह बढ़ेगा नेह।
पर अतिशय वर्जित कहो, वरन बढ़े मधुमेह।।

तुम जो कहते हो वही, ही हो सकता सत्य।
नहीं नहीं ऐसा नहीं, सत्य आपका कथ्य।।

चले कलम जिस ओर को, राह बने उस ओर।
सतत कलम जमकर करे, जोर जोर से शोर।।

बड़ी गलतफहमी हुई, खड़ी हुई दीवार।
मनभेदों मतभेद का, समय करे उपचार।।

अपने मन से मान के, बोला मैं ही नेक।
दूर सदा फहमी करो,  फिर अंतर में देख।।

सतत जोड़ते ही चलो, आपस में संपर्क।
अपनों को अपना कहो, किये बिना ही तर्क।।

मुश्किल से ही जोड़ते, पल में देते तोड़।
जोड़ जोड़िये ज्यूँ लगे, फेविकॉल का जोड़।।

सही सही होता नहीं, सही गलत सापेक्ष।
सही गलत जाने बिना, लगा नहीं आक्षेप।।

जिस रिश्ते की डोर ही, बिल्कुल हो कमजोर।
उस रिश्ते को तोड़ने, कर कोशिश पुरजोर।।

बड़ा लड़ाका कह रहा, लड़का जो नादान।
जिसके भीतर ज्ञान नहीं, बांट रहा है ज्ञान।।

खटरपटर करते रहे, चिल्लापों ही काम।
बकरबकर करते रहे, बिगड़े जग में नाम।।

शुभचिंतक से ही करो, हरदम सुलह सलाह।
उनकी भी परवाह हो, करते जो परवाह।।

ठोकर पत्थर तोड़ दे, शीशे की दीवार।
कच्चे रिश्तों से गुथी, नाजुक सी सलवार।।

बहुत सरल है बोलना, बहुत कठिन है मौन।
बात करेंगे हम नहीं, बात करेगा कौन।।
फेसबुकों पर फेस को, रखना बिल्कुल साफ। ०
बन जाये पहचान भी, अगर चाहते आप।।
*
लूंगा न लेने दूंगा, कसम खाइये आज।
फेंकू से पाला पड़े, सिर से खींचो ताज।। ०
*
लेना-देना ही नहीं, दहेज पिशाच है पाप।
जीते जी खुद्दार ही, बन ही जाना आप।। ०
*
करुण रुदन चलता रहा, मुख से कहे न बोल।
अंतर्मन करता रहा, अनबोले अनमोल।।
*
चाहे मस्जिद ही बने, या मंदिर बन जाय।
इनसे तो अच्छा रहे, वृद्धाश्रम बन पाय।।
धर्म नाम की चीज का, है ही नहीं न ज्ञान।
वही बाटते ज्ञान को, हो कर के विद्वान।।
*
मानवीय संवेदना, जग में हुई है शून्य।
पूस कड़ाके को कहे, आज भेड़िये जून।।

तीन बार मत बोलना, तलाक तलाक तलाक।
मजिस्ट्रेट अब बोलता, सटाक सटाक सटाक।।

दीनदुःखी पर हो दया,  मिल जाये भगवान।
दिल में मंदिर ले बना, कहलाओ इंसान।।

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